श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर देवालय या कार्पोरेट कार्यालय!

 

आख़िर मंदिर में CEO का क्या काम?
कौटिल्य दृष्टि : धर्म का प्रबंधन या धर्म का

बाजारीकरण?
मंदिर में CEO क्यों?

यह प्रश्न सुनने में जितना सरल है, भीतर से उतना ही विस्फोटक है। क्योंकि प्रश्न किसी एक पदनाम का नहीं, उस मानसिकता का है जो मंदिर को धीरे-धीरे देवालय से प्रबंधनालय और श्रद्धा-केंद्र से कॉर्पोरेट प्रतिष्ठान में बदल देना चाहती है।मंदिर में व्यवस्था चाहिए-निस्संदेह।
मंदिर में पारदर्शिता चाहिए-अवश्य।मंदिर में भ्रष्टाचार का अंत होना चाहिए-निर्विवाद।
लेकिन क्या इन सबका अंतिम समाधान CEO है?क्या देवता अब ग्राहक-संतुष्टि के KPI (मुख्य  प्रदर्शन  संकेतक)से प्रसन्न होंगे? क्या श्रद्धा अब बैलेंस शीट में मापी जाएगी?क्या दान ‘रेवेन्यू’ और प्रसाद ‘प्रोडक्ट’ कहलाएगा? यहीं से सावधान होने की आवश्यकता है। भारत की सभ्यता ने मंदिर को केवल पूजा का स्थान नहीं माना। मंदिर समाज का सांस्कृतिक केंद्र रहा, अन्न का आश्रय रहा, ज्ञान का स्थल रहा, लोकजीवन का उत्सव रहा। उसके गर्भगृह में देवता थे और उसके बाहर समाज।
मंदिर का अर्थ था-देव से लोक तक और लोक से लोकमंगल तक की यात्रा। आज यदि मंदिर की सफलता का पैमाना यह होने लगे कि उसने कितना धन कमाया, कितनी ब्रांड वैल्यू बनाई और कितने श्रद्धालुओं को ‘मैनेज’ किया, तो हमें रुककर पूछना होगा—हम मंदिर को सुधार रहे हैं या उसकी आत्मा का कॉर्पोरेट अधिग्रहण कर रहे हैं? प्रबंधन हो, पर मालिकाना मानसिकता नहीं
कॉर्पोरेट प्रबंधन में CEO संस्था का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होता है। उसका लक्ष्य स्पष्ट होता है—प्रबंधन, परिणाम, दक्षता, संसाधन और उत्तरदायित्व। लेकिन मंदिर कंपनी नहीं है।
यहाँ आने वाला व्यक्ति ग्राहक नहीं, श्रद्धालु है। यहाँ चढ़ाया गया धन व्यापारिक निवेश नहीं, आस्था का अर्पण है। दर्शन कोई खरीदी जाने वाली सुविधा नहीं, आध्यात्मिक अनुभव है।
प्रसाद बाजार का माल नहीं, परंपरा का प्रसाद है। इसलिए मंदिर में आधुनिक प्रशासन आए तो उसका स्वागत है, पर प्रशासन मंदिर की आत्मा का स्वामी न बन बैठे।भ्रष्टाचार रोकने के लिए ऑडिट चाहिए-CEO अनिवार्य नहीं।दान में पारदर्शिता चाहिए—कॉर्पोरेटकरण अनिवार्य नहीं।
श्रद्धालुओं की सुविधा चाहिए—धर्म का बाजार बनाना अनिवार्य नहीं।व्यवस्था का आधुनिकीकरण और धर्म का व्यावसायीकरण-दो बिल्कुल अलग बातें हैं।सबसे खतरनाक परिवर्तन शब्दों से आता है
किसी सभ्यता को बदलना हो तो पहले उसकी भाषा बदल दीजिए।जब श्रद्धालु ‘कस्टमर’ बनता है, दान ‘रेवेन्यू’ बनता है, मंदिर ‘ब्रांड’ बनता है और दर्शन ‘सर्विस’ बन जाता है, तब बाजार मंदिर के भीतर प्रवेश कर चुका होता है।फिर अगला कदम बहुत सहज है-विशेष दर्शन।प्रीमियम दर्शन।
विशेष पूजा।विशेष पैकेज।विशेष सुविधा।और धीरे-धीरे एक अदृश्य विभाजन खड़ा हो जाता है
जिसकी जेब भारी, उसका दर्शन सुगम;जिसकी श्रद्धा भारी, उसकी प्रतीक्षा लंबी!,यदि धर्म की चौखट पर आर्थिक सामर्थ्य ही अनुभव की श्रेणी तय करने लगे, तो मंदिर का वैभव भले बढ़ जाए, धर्म की गरिमा घट सकती है।
कौटिल्य की दृष्टि क्या कहती है?
कौटिल्य ने शासन में व्यवस्था, अनुशासन, लेखा, निरीक्षण और दण्ड की आवश्यकता को कभी नकारा नहीं। राज्य का कोष सुरक्षित हो, अधिकारी उत्तरदायी हों, भ्रष्टाचार पर निगरानी हो-यह सब सुशासन की अनिवार्य शर्तें हैं।लेकिन कौटिल्य की दृष्टि का मूल उद्देश्य केवल कोष बढ़ाना नहीं था।प्रजा का हित ही शासन की कसौटी था। यही सिद्धांत आज धार्मिक संस्थाओं पर भी लागू किया जा सकता है।मंदिर की आय सुरक्षित हो,पर उसका लक्ष्य लोकमंगल हो।दान पारदर्शी होपर उसका अंतिम अर्थ सेवा हो।प्रबंधन दक्ष हो-पर उसका चरम उद्देश्य श्रद्धा की गरिमा हो।कौटिल्य की दृष्टि में व्यवस्था साधन है; व्यवस्था स्वयं लक्ष्य नहीं।
आज यदि मंदिर में CEO नियुक्त किया जाता है तो उससे बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए कि उसके ऊपर कौन है? उसकी जवाबदेही किसके प्रति है? उसके निर्णयों की धार्मिक, सामाजिक और वित्तीय निगरानी कौन करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या वह मंदिर को चलाएगा या मंदिर की सेवा करेगा?क्योंकि मंदिर का CEO यदि स्वयं को मंदिर से बड़ा समझने लगे तो समस्या पद में नहीं, पद की मानसिकता में है। मंदिर को कंपनी मत बनाइए,भारत को मंदिरों की आवश्यकता है-ऐसे मंदिरों की जो समाज को जोड़ें, न कि उसकी जेब के आधार पर बाँटें। हमें ऐसे प्रबंधन की आवश्यकता है जो भ्रष्टाचार पर प्रहार करे, लेकिन श्रद्धा पर नहीं।हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें आधुनिक तकनीक हो, डिजिटल लेखा हो, स्वतंत्र ऑडिट हो, सार्वजनिक रिपोर्ट हो, सुरक्षा हो, स्वच्छता हो और प्रशासनिक दक्षता हो—लेकिन मंदिर के गर्भगृह में बाजार की मानसिकता का प्रवेश न हो।मंदिर को आधुनिक बनाइए,मॉल मत बनाइए।प्रबंधन को पेशेवर बनाइए,श्रद्धा को उत्पाद मत बनाइए।दान को पारदर्शी बनाइए,दान को राजस्व की भाषा में मत तौलिए।और सबसे बढ़कर-मंदिर की सेवा कीजिए; मंदिर को ‘मैनेज’ करने के अहंकार से बचिए।क्योंकि मंदिर मनुष्य ने बनाया हो सकता है, पर उसकी आत्मा किसी कॉर्पोरेट बोर्डरूम में नहीं बनती।
यही कौटिल्य दृष्टि का कठोर प्रश्न है-धर्म को भ्रष्टाचार से बचाने के नाम पर कहीं हम उसे बाजार के हवाले तो नहीं कर रहे?यदि उत्तर ‘हाँ’ की दिशा में जाता दिखाई दे, तो समय रहते चेतना होगा।मंदिर में CEO हो सकता है-पर CEO का मंदिर नहीं हो सकता।मंदिर व्यवस्था का केंद्र हो सकता है-व्यापार का केंद्र नहीं।और जिस दिन श्रद्धा को कारोबार की भाषा में लिखना शुरू कर दिया जाएगा, उस दिन मंदिर भले भव्य दिखाई दे, लेकिन उसकी घंटियों में उठता प्रश्न बहुत दूर तक सुनाई देगा-
“हे मनुष्य! तूने मेरे देवालय को व्यवस्थित किया है,
या मेरी आस्था का ही कारोबार कर डाला?” 
राजेन्द्र  नाथ  तिवारी 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने