कौटिल्य दृष्टि, संपादकीय
मुख्यमंत्री के गृह जनपद में राज्यपाल की तल्ख टिप्पणी: क्या यह केवल विश्वविद्यालय का प्रश्न है या पूरे तंत्र का आईना?
गोरखपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के 45वें दीक्षांत समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता से विश्वविद्यालय की छात्रावास एवं मेस व्यवस्था पर असंतोष व्यक्त किया, वह केवल एक औपचारिक टिप्पणी नहीं थी। छात्रावास का निरीक्षण, भोजन की गुणवत्ता पर प्रश्न, खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को मौके पर बुलाकर नमूने जांचने के निर्देश तथा तीन माह में सुधार की समय-सीमा देना इस बात का संकेत है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यवस्थागत कमियों को अब केवल कागजी रिपोर्टों से नहीं छिपाया जा सकता।
विशेष रूप से तब, जब यह घटना प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जनपद गोरखपुर में घटित हुई, राज्यपाल की टिप्पणी का राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। उनका यह प्रश्न कि यदि मुख्यमंत्री के गृह जनपद में यह स्थिति है, तो अन्य जनपदों का क्या हाल होगा, पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय है।
हालाँकि, इस प्रकरण का दूसरा पक्ष भी है। किसी विश्वविद्यालय की अव्यवस्था का उत्तरदायित्व केवल स्थानीय प्रशासन पर नहीं डाला जा सकता। विश्वविद्यालय प्रशासन, वित्तीय संसाधन, निगरानी तंत्र तथा शासन स्तर पर नियमित समीक्षा-सभी समान रूप से उत्तरदायी हैं। यदि छात्रावासों और मेस की स्थिति लंबे समय से खराब थी, तो प्रश्न यह भी उठता है कि नियमित निरीक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था पहले क्यों प्रभावी नहीं रही।
राज्यपाल ने छात्राओं के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान को भी प्रोत्साहित किया, जो उनके सामाजिक सरोकारों का सकारात्मक पक्ष है। शिक्षा संस्थानों में स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए।
यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों का स्वतंत्र एवं नियमित गुणवत्ता परीक्षण होना चाहिए। विद्यार्थियों को सम्मानजनक भोजन, स्वच्छ आवास और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना किसी उपकार का नहीं, बल्कि उनका अधिकार है।
राज्यपाल की टिप्पणी यदि प्रशासन को केवल असहज करने के बजाय सुधार की दिशा में प्रेरित करती है, तो यही इस निरीक्षण की वास्तविक सफलता होगी। तीन माह बाद केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाला परिवर्तन ही इस हस्तक्षेप की कसौटी बनेगा।
राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001