सीतायण
जनकपुर से जगद्गुरु भारत @2047
सीतायण की आत्मा - सीता: जनक-नन्दिनी से भौमिक तक, एक सम्पूर्ण जीवन!
एक नाम, अनेक रूप। एक जीवन, अनंत अध्याय।
सीता -जनक-नन्दिनी, राजकुमारी, भावी साम्राज्ञी,दंडकारण्य-निवासिनी, अशोक वाटिका की बंदिनी, अग्नि से शुद्ध हुई जानकी, रावण के दंभ की विनाशिनी शक्ति, अयोध्या से दो बार त्यागी गई, लव-कुश की निर्मात्री, और अंततः भूमि में लौटी भौमिक कन्या। यह कोई एक कथा नहीं - यह अनेक कथाओं का संगम है, अनेक कवियों की आँखों से देखी गई एक ही अडिग आत्मा।हम सीता के प्रत्येक रूप को, एक-एक कर, श्रद्धा से स्पर्श करेंगे - न इतिहास के रूप में, न केवल साहित्य के रूप में, अपितु उस जीवंत, धड़कते प्राण के रूप में जो सहस्रों वर्षों से भारत की आत्मा में बसा है। यह सीतायण की जान है - इसका हृदय, इसकी साँस, इसका अंतिम, अटल उद्घोष।
जनक-नन्दिनी: भूमि से जन्मी कन्या::मिथिला की धरती, हल की रेखा से जन्मी एक कन्या - यह सीता का प्रथम, मूल रूप है। जनक ने उन्हें केवल पुत्री नहीं, अपितु उस दार्शनिक-आध्यात्मिक विरासत की उत्तराधिकारिणी बनाया जिसने मिथिला को भारत का बौद्धिक-केंद्र बनाया था। जनक-नन्दिनी होना केवल जन्म-परिचय नहीं - यह एक चेतना है, एक दृष्टि है, जो सीता को आजीवन एक विचारशील, आत्म-निर्भर स्त्री के रूप में गढ़ती रही। यह वही मूल शक्ति है जो आगे उनके प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक संकट में पुनः-पुनः प्रकट होती रही।
भावी साम्राज्ञी: एक अधूरा स्वप्न::
स्वयंवर में शिव-धनुष का भंजन, राम के साथ विवाह - यह वह क्षण था जब सीता भावी साम्राज्ञी के स्वप्न के साथ अयोध्या की देहरी पर आईं। परंतु नियति ने यह स्वप्न कभी पूर्ण होने नहीं दिया - राजतिलक की तैयारी के मध्य ही वनवास की घोषणा हुई, और वह मुकुट, जो सीता के सिर पर सजना था, कभी नहीं सजा। यह अधूरा स्वप्न, यह छीना गया साम्राज्ञी-पद, सीतायण की सबसे गहरी विडंबनाओं में से एक है - एक स्त्री जो साम्राज्ञी बनने के सर्वाधिक निकट पहुँचकर भी, कभी सिंहासन पर नहीं बैठ पाई।
मुकुट सिर पर नहीं सजा, परंतु जो गरिमा सीता ने वन में, बंधन में, अकेलेपन में प्रदर्शित की, वह किसी भी स्वर्ण-मुकुट से अधिक मूल्यवान थी - वह गरिमा जो कभी छीनी नहीं जा सकी।
विलासिनी से वनवासिनी: वैभव का त्याग::अयोध्या के राजभवन में, विवाह के पश्चात संक्षिप्त समय में, सीता एक 'विलासिनी' के रूप में जी सकती थीं - रेशमी वस्त्र, स्वर्ण-आभूषण, राजसी सुख-सुविधाएँ, यह सब उनकी नियति हो सकती थी। परंतु जब राम को वनवास मिला, सीता ने इस समस्त वैभव को क्षण-भर में त्याग दिया - बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना किसी शर्त के। यह त्याग स्वयं इस बात का प्रमाण है कि सीता के लिए वैभव कभी उनकी पहचान का केंद्र नहीं था - उनकी पहचान का केंद्र सदैव उनका धर्म, उनका प्रेम, उनका आत्म-निर्णय रहा।
दंडकारण्य-निवासिनी: वन को घर बनाने वाली::दंडकारण्य में सीता ने जो किया, वह केवल सहन करना नहीं था - उन्होंने वन को घर बनाया, पंचवटी को अपनत्व से भरा, ऋषियों की सेवा की, प्रकृति से संवाद स्थापित किया। यह वह सीता है जिसने असंभव परिस्थितियों में भी सौंदर्य और व्यवस्था रची - एक ऐसी स्त्री जो विस्थापन को भी अर्थपूर्ण जीवन में बदल सकती थी। दंडकारण्य-निवासिनी सीता, सीतायण की दृष्टि में, नारी की उस अद्भुत क्षमता की प्रतीक हैं जो किसी भी परिस्थिति में जड़ें जमा सकती है, किसी भी मिट्टी में खिल सकती है।
अशोक वाटिका की सीता: बंधन में भी अजेय::अशोक वाटिका के वृक्षों तले, राक्षसियों के पहरे में, महीनों तक बंदिनी - यह सीता का सबसे कठोर, सबसे दीर्घकालिक परीक्षा-काल है। परंतु इस बंधन में भी सीता कभी मानसिक रूप से बंदी नहीं बनीं। रावण के प्रत्येक प्रलोभन, प्रत्येक धमकी के समक्ष उनका आत्म-सम्मान अडिग रहा। यह वह सीता है जो सिखाती है - शरीर बंधन में हो सकता है, परंतु आत्मा, यदि दृढ़ हो, तो सदैव मुक्त रहती है। अशोक वाटिका की सीता, नारी-शक्ति के उस चरम रूप की प्रतीक हैं जो सबसे अंधकारमय परिस्थिति में भी अपना प्रकाश नहीं खोती। अशोक वाटिका के वृक्ष झुके, पत्ते सूखे, ऋतुएँ बदलीं - परंतु सीता का संकल्प, उनकी निष्ठा, कभी नहीं झुकी। यही अजेयता है - शरीर की नहीं, आत्मा की।
प्रथम अग्नि-परीक्षा की सीता: शुद्धता नहीं, गरिमा का प्रमाण::जब रावण-वध के पश्चात सीता को अग्नि में प्रवेश करना पड़ा, यह क्षण भारतीय साहित्य के सर्वाधिक विवादास्पद, सर्वाधिक चर्चित क्षणों में से एक बना। परंतु सीतायण की दृष्टि में इस क्षण को केवल पीड़ा और अन्याय के रूप में नहीं, अपितु सीता के अद्वितीय साहस के रूप में भी देखा जाना चाहिए - वे भयभीत नहीं हुईं, वे स्वयं अग्नि की ओर बढ़ीं, दृढ़ कदमों से, यह जानते हुए कि उनकी सत्य-निष्ठा उन्हें रक्षा देगी। यह किसी दंडित स्त्री का कृत्य नहीं - यह एक ऐसी स्त्री का कृत्य है जो अपने सत्य पर इतना अटूट विश्वास रखती है कि वह स्वयं परीक्षा को आमंत्रित करने से नहीं डरती.
सहस्र-मुख रावण-विनाशिनी शक्ति: अदृश्य योद्धा::यह कहना कि सीता ने रावण को नहीं मारा, केवल आधा सत्य है - प्रत्यक्ष युद्ध राम ने लड़ा, परंतु वह संपूर्ण युद्ध, वह संपूर्ण सेना, वह संपूर्ण संकल्प, किसके लिए था? सीता के अपहरण के बिना, सीता की गरिमा-रक्षा के संकल्प के बिना, वह युद्ध कभी होता ही नहीं। इस अर्थ में, सीता स्वयं उस युद्ध की अदृश्य, मूल प्रेरणा-शक्ति हैं -रावण का दस-मुख अहंकार, उसका सहस्र-मुख दंभ, अंततः जिस एक स्त्री की अडिग निष्ठा के समक्ष चूर-चूर हुआ, वह सीता ही थीं। वे स्वयं शस्त्र नहीं उठातीं, परंतु उनकी निष्ठा ही वह अदृश्य शस्त्र थी जिसने रावण के संपूर्ण साम्राज्य को खोखला कर दिया।रावण के सहस्र मुख उसके अहंकार के प्रतीक थे - और उस अहंकार को चूर करने वाली शक्ति किसी धनुष-बाण से नहीं, एक स्त्री की अटूट, अविचल निष्ठा से आई। सीता शस्त्रधारिणी नहीं थीं, वे स्वयं शस्त्र की आत्मा थीं।
श्रीराम की जानकी: प्रेम और मर्यादा का संगम::जानकी' - यह नाम सीता को उनके पिता जनक से जोड़ता है, परंतु 'श्रीराम की जानकी' कहलाना उनकी एक और पहचान है - वह पहचान जो प्रेम, निष्ठा और साझा धर्म-यात्रा से गढ़ी गई। सीता और राम का संबंध केवल विवाह-संस्था नहीं था - यह दो समान रूप से दृढ़, समान रूप से धर्मनिष्ठ आत्माओं का सहचर्य था। यद्यपि इतिहास ने अंततः इस संबंध को त्रासदी में बदल दिया, फिर भी यह स्मरण रखना आवश्यक है कि उनका प्रेम, उनकी पारस्परिक निष्ठा, संपूर्ण गाथा में कभी संदिग्ध नहीं हुई - जो टूटा, वह प्रेम नहीं, परिस्थितियों की क्रूरता थी।
अयोध्या से द्वितीय परित्याग की सीता: सबसे गहरा घाव::यदि प्रथम वनवास परिस्थितियों की माँग थी, तो द्वितीय परित्याग - लोकापवाद के कारण, गर्भवती अवस्था में, बिना किसी सूचना के - सीता के जीवन का सर्वाधिक गहरा, सर्वाधिक अन्यायपूर्ण घाव है। यह वह क्षण है जहाँ सीतायण अपनी संपूर्ण करुणा के साथ खड़ा होता है - यह स्वीकार करते हुए कि चाहे राजधर्म की कितनी भी व्याख्या की जाए, एक निर्दोष, पहले ही अग्नि में सिद्ध हो चुकी स्त्री का यह दूसरा परित्याग, न्याय की किसी भी परिभाषा में उचित नहीं ठहराया जा सकता। सीतायण इस अन्याय को छुपाता नहीं - वह इसे पूर्ण ईमानदारी से स्वीकार करता है, क्योंकि यही ईमानदारी सीता के प्रति सच्चा सम्मान है
लव-कुश निर्मात्री: एकाकी माता से इतिहास-निर्माता तक::वाल्मीकि आश्रम में, बिना किसी सहारे के, सीता ने दो ऐसे पुत्रों को गढ़ा जिन्होंने अंततः अयोध्या की समस्त सेना को परास्त किया, और जिनके कंठ से गाई गई रामायण ने स्वयं राम को अपने अतीत का सामना करने पर विवश किया। यह सीता की सबसे शांत, परंतु सबसे शक्तिशाली विजय है - उन्होंने राजनीति या युद्ध से नहीं, अपितु मातृत्व और शिक्षा से इतिहास की दिशा बदली। लव-कुश निर्मात्री सीता, प्रत्येक उस माता का प्रतीक हैं जो अकेले, बिना किसी संसाधन के, अपनी संतान में वह शक्ति भरती है जो अंततः विश्व को बदल देती है।
राम ने राज्य जीता, सीता ने भविष्य गढ़ा - और भविष्य, अंततः, राज्य से अधिक स्थायी सिद्ध हुआ।
जनक-नन्दिनी से भौमिक तक: भूमि का चक्र::और अंततः, भूमि से जन्मी वह कन्या, भूमि में ही लौट गई - भौमिक बनकर, अपनी मूल शक्ति में विलीन होकर। यह अंत पराजय नहीं -यह एक चक्र की पूर्णता है, जहाँ सीता, समाज की अंतहीन माँगों से मुक्त होकर, स्वयं अपनी नियति की अंतिम, सर्वोच्च निर्णायिका बनती हैं। जनक-नन्दिनी से भौमिक तक की यह यात्रा - जन्म से अंत तक — सीता के संपूर्ण जीवन का वह चक्रीय, दार्शनिक रूप से परिपूर्ण आकार है जो उन्हें केवल एक कथा-पात्र नहीं, अपितु एक शाश्वत, चक्रीय सत्य का प्रतीक बनाता है।
चार कवियों की सीता: तुलसी, वाल्मीकि, कम्बन, भवभूति::
एक ही सीता, चार महान कवियों की दृष्टि से - यह भारतीय साहित्य का वह चमत्कार है जो सीता को एक-आयामी नहीं रहने देता। वाल्मीकि की सीता यथार्थवादी, न्याय-प्रधान, संयत गरिमा वाली हैं। तुलसीदास की सीता भक्ति और मर्यादा के आवरण में, फिर भी आंतरिक दृढ़ता से युक्त हैं - रामचरितमानस में सीता की प्रत्येक अभिव्यक्ति राम-भक्ति के प्रकाश में रंगी है। कम्बन की तमिल सीता भावनात्मक गहराई और काव्यात्मक सौंदर्य से आर्द्र हैं - दक्षिण भारत की भक्ति-परंपरा उनमें साक्षात प्रवाहित होती है। और भवभूति की सीता, यद्यपि नाटक में प्रत्यक्ष कम उपस्थित, फिर भी वन के प्रत्येक कण में, राम के प्रत्येक स्मरण में, करुणा की पराकाष्ठा के रूप में जीवंत हैं।
चार कवि, चार भाषाएँ, चार युग - फिर भी एक ही अडिग सत्य सबमें प्रतिध्वनित होता है: सीता कभी दुर्बल नहीं थीं। वाल्मीकि के तर्क में, तुलसी की भक्ति में, कम्बन की करुणा में, भवभूति के विरह में - सीता की आंतरिक शक्ति कभी धुंधली नहीं पड़ती। यही वह सत्य है जिसे सीतायण, इन चारों महान परंपराओं से सीखकर, एक साथ बुनकर, आज के पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।
आज की सीता: प्रत्येक संघर्षरत भारतीय नारी में जीवंत::और अंततः, सबसे महत्वपूर्ण रूप - आज की सीता। वह सीता जो आज किसी कार्यालय में अपनी योग्यता सिद्ध कर रही है। वह सीता जो अकेले अपने बच्चों का पालन कर रही है। वह सीता जो किसी अनुचित लांछन का सामना कर रही है, फिर भी अपनी गरिमा नहीं छोड़ रही। वह सीता जो अपने घर में, अपने कार्यक्षेत्र में, अपने समाज में, प्रतिदिन छोटी-छोटी अग्नि-परीक्षाओं से गुज़रती है, और हर बार, थोड़ी और मजबूत होकर निकलती है। यह सीता कोई प्राचीन स्मृति नहीं - यह आज, इसी क्षण, भारत के हर घर में जीवंत है।
सीता कभी अतीत में नहीं रहीं - वे हर उस स्त्री में जीवंत हैं जो आज, इस क्षण, अपनी गरिमा के लिए
अबला नहीं, सबला: जब भारत विश्व-गुरु बनेगा:: यह त्रासदी-पूर्ण जीवन - परित्याग, बंधन, अग्नि, पुनः परित्याग, एकाकीपन - यदि केवल पीड़ा की कथा के रूप में पढ़ा जाए, तो सीता एक अबला, एक पीड़िता मात्र बनकर रह जाती हैं। परंतु यदि यही जीवन साहस, आत्म-निर्णय, अटूट निष्ठा, और अंतिम, स्वतंत्र मुक्ति की कथा के रूप में पढ़ा जाए - तो सीता भारत की सबसे महान सबला बन जाती हैं, जिनकी शक्ति किसी शस्त्र में नहीं, उनकी अडिग आत्मा में निवास करती है।
भारत तभी सच्चे अर्थों में जगद्गुरु, विश्व-गुरु बन सकेगा, जब वह अपनी बेटियों को, अपनी नारी-शक्ति को, अबला नहीं - सबला के रूप में देखना, गढ़ना, और सम्मानित करना सीखेगा। और इस शिक्षा का सबसे प्राचीन, सबसे गहन, सबसे प्रामाणिक स्रोत और कोई नहीं -स्वयं सीता हैं। जिस दिन भारत का प्रत्येक बालक, प्रत्येक बालिका, सीता को उनकी संपूर्ण शक्ति, संपूर्ण गरिमा, संपूर्ण मानवीयता के साथ जानेगा -उस दिन नारी-शक्ति का सच्चा उत्थान होगा, और उसी दिन भारत विश्व-गुरु बनने के अपने स्वप्न के सर्वाधिक निकट पहुँचेगा।
यही सीतायण की जान है। यही इसका प्राण है। जनक-नन्दिनी से भौमिक तक, विलासिनी से वनवासिनी तक, साम्राज्ञी के अधूरे स्वप्न से लव-कुश की निर्मात्री तक - प्रत्येक रूप में, प्रत्येक क्षण में, एक ही अटल सत्य गूँजता है: सीता अबला नहीं थीं। वे कभी अबला नहीं थीं। वे सदा सबला थीं - मौन में भी, बंधन में भी, त्याग में भी, और अंततः, भूमि में अपनी स्वेच्छा-मुक्ति में भी।
जय जनक-नन्दिनी। जय भौमिक सीता। जय वह सबला, जिसे विश्व ने अबला समझने की भूल की -और सीतायण जिसे अब, सदा के लिए, उसकी सच्ची पहचान लौटाता है।
