राम का व्यक्ति नहीं राम की मर्यादा में बचाइए
राम की अयोध्या में व्यक्ति नहीं, मर्यादा बचे
राजेंद्र तिवारी 272 001"रामो विग्रहवान् धर्मः।" अर्थात् श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं। उनके जीवन का प्रत्येक निर्णय इस सत्य की पुष्टि करता है कि सत्ता का सर्वोच्च उद्देश्य स्वयं को बचाना नहीं, बल्कि लोकविश्वास की रक्षा करना है। यही कारण है कि श्रीराम ने वनवास स्वीकार किया, राजसुख त्याग दिया और अंततः लोकापवाद के कारण अपनी प्राणप्रिय जानकी से भी वियोग सहा। इतिहास उनके निर्णयों पर विमर्श कर सकता है, किंतु उनके त्याग और लोकमर्यादा के प्रति समर्पण पर प्रश्न नहीं उठा सकता।
आज अयोध्या एक बार फिर इतिहास के ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। करोड़ों रामभक्तों की आस्था से निर्मित यह धाम केवल भव्य मंदिरों का नगर नहीं, बल्कि नैतिकता और मर्यादा की राजधानी है। इसलिए यहाँ किसी भी संस्था, ट्रस्ट या पदाधिकारी से जुड़ा विवाद केवल एक व्यक्ति का विषय नहीं रहता; वह पूरे समाज के विश्वास का विषय बन जाता है।
यदि किसी सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति पर प्रश्न उठते हैं, तो उन प्रश्नों का उत्तर भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और तथ्यों से दिया जाना चाहिए। किसी के पक्ष में समर्थन जुटाना उसका अधिकार है और किसी के कार्यों पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार। किंतु अंतिम कसौटी केवल सत्य और निष्पक्ष प्रक्रिया होनी चाहिए।
धर्म की सबसे बड़ी शक्ति सत्य है। यदि कोई निर्दोष है, तो निष्पक्ष जांच उसके सम्मान को और मजबूत करेगी। यदि कोई दोषी है, तो उसका पद, प्रतिष्ठा या प्रभाव उसे जवाबदेही से ऊपर नहीं रख सकता। यही रामराज्य की भावना है।
यह भी स्मरण रखना चाहिए कि अयोध्या किसी व्यक्ति की जागीर नहीं है। वह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ का प्रत्येक निर्णय इस दृष्टि से होना चाहिए कि उससे राम के नाम की प्रतिष्ठा बढ़े, न कि किसी व्यक्ति की छवि बचाने का प्रयास दिखाई दे। राम ने कभी स्वयं को व्यवस्था से ऊपर नहीं माना। उन्होंने स्वयं को भी लोकमत के अधीन रखा। यदि राम अपने लिए विशेष छूट नहीं चाहते थे, तो राम के नाम पर कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति को भी विशेष छूट की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
आज आवश्यकता है कि अयोध्या से एक स्पष्ट संदेश जाय, सत्य से मत डरिए, प्रश्नों से मत भागिए और पारदर्शिता को अपनाइए। यही मर्यादा है, यही धर्म है और यही रामराज्य की आत्मा है राम का नाम किसी व्यक्ति से बड़ा है। मंदिर किसी पदाधिकारी से बड़ा है। और लोकविश्वास हर संस्था की सबसे बड़ी पूँजी है। यदि अयोध्या को युगों तक विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाए रखना है, तो व्यक्ति नहीं, मर्यादा को बचाना होगा। यही श्रीराम की शिक्षा है, यही सनातन का संदेश है और यही भारत की आत्मा का आह्वान है।
