राजेन्द्र नाथ तिवारी ,272001
अयोध्या से बाबा भदेश्वरनाथ तक 70 किलोमीटर की कावड़ यात्रा: आस्था, अनुशासन और लोकसेवा का विराट महापर्व
"श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।"
भगवद्गीता (4.39)
"नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।"
शिवस्तोत्र
भारत की आत्मा उसकी सनातन संस्कृति में बसती है, और सनातन संस्कृति की आत्मा उसकी तीर्थयात्राओं में। इन्हीं दिव्य परंपराओं में पूर्वांचल की अयोध्या से बस्ती जनपद स्थित बाबा भदेश्वरनाथ धाम तक लगभग 70 किलोमीटर की. कावड यात्रा एक अद्वितीय धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन है। यह केवल जल लेकर चलने की यात्रा नहीं, बल्कि श्रद्धा, तप, अनुशासन, सेवा और लोकमंगल का विराट अभियान है। प्रतिवर्ष सावन मास में लगभग दस लाख श्रद्धालु सरयू की पावन धारा से जल लेकर बाबा भदेश्वरनाथ का जलाभिषेक करने के लिए पैदल निकलते हैं। नंगे पाँव, कंधों पर कामड़, मुख पर "बोल बम" का उद्घोष और हृदय में शिव के प्रति अटूट विश्वास—यह दृश्य भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है। यहाँ कष्ट, थकान, वर्षा और कठिन मार्ग भी आस्था के सामने गौण हो जाते हैं।
कामड़ यात्रा की पौराणिक उत्पत्ति::कामड़ यात्रा का मूल स्रोत समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा माना जाता है। जब समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए ग्रहण किया, तब देवताओं ने विभिन्न पवित्र नदियों का जल अर्पित कर उनके कंठ की ज्वाला शांत की। तभी से शिव को पवित्र जल अर्पित करने की परंपरा प्रारंभ हुई।
"गङ्गाजलं समानीय यो ददाति महेश्वरे।
तस्य पुण्यफलं देवाः कथयितुं न शक्नुवन्ति॥"
अयोध्या की सरयू, भगवान श्रीराम की पावन नगरी की साक्षी है। उसी सरयू का जल लेकर बाबा भदेश्वरनाथ का अभिषेक करना राम और शिव—दोनों महान आध्यात्मिक परंपराओं के संगम का प्रतीक है।
सेवा और सामाजिक समरसता का महाकुंभ::इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरा समाज शिवभक्तों की सेवा में जुट जाता है। मार्ग में हजारों भंडारे, चिकित्सा शिविर, पेयजल केंद्र, विश्राम स्थल और सेवा शिविर स्थापित किए जाते हैं। जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के सभी भेद मिट जाते हैं। केवल एक पहचान रह जाती है-शिवभक्त। बस्ती मुख्यालय के समीप फुटहिया क्षेत्र तीन दिनों तक सेवा और समर्पण का अद्भुत केंद्र बन जाता है। यहाँ दिन-रात निरंतर भंडारे चलते हैं। हजारों स्वयंसेवक बिना किसी भेदभाव के श्रद्धालुओं की सेवा करते हैं। यह दृश्य भारतीय लोकसंस्कृति की उस परंपरा का जीवंत प्रमाण है जिसमें "नर सेवा ही नारायण सेवा" मानी गई है।
सुडू सिंह की सेवा-साधना:: फुटहिया क्षेत्र में वर्षों से। सुडू सिंह के नेतृत्व में संचालित सेवा शिविर इस यात्रा की विशेष पहचान बन चुका है। करोड़ों रुपये के संसाधनों, हजारों स्वयंसेवकों, विशाल भंडारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा प्रशासनिक समन्वय के माध्यम से वे लाखों श्रद्धालुओं की सेवा का दायित्व निभाते हैं। यह केवल आयोजन नहीं, बल्कि सेवा का महायज्ञ है।उनकी व्यवस्था यह सिद्ध करती है कि जब समाज और प्रशासन मिलकर कार्य करते हैं, तब विशाल से विशाल आयोजन भी अनुशासन और शांति के साथ संपन्न हो सकता है। यह वास्तव में "न भूतो न भविष्यति" जैसी व्यवस्थागत क्षमता का उदाहरण है आज बाबा भदेश्वरनाथ की कामड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है। यह भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, लोकसेवा, प्रशासनिक दक्षता और जनसहयोग का ऐसा जीवंत विश्वविद्यालय है, जहाँ बिना किसी औपचारिक शिक्षा के करोड़ों लोगों को अनुशासन, सेवा और सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाया जाता है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि और सनातन भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।सुडू सिंह का कवरियो प्रती सेवा, सहयोग और बृहद भंडारा बस्ती के स्मृति पटल की अदम्य सामाजिक, साहसिक इच्छा शक्ति का प्रणाम है!