यह लेख इतिहास, दर्शन और समकालीन राजनीति को जोड़ते हुए भारत की सभ्यतागत निरंतरता पर केंद्रित है। इसमें किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष के बजाय मूल विचार राष्ट्र की दीर्घकालिक सभ्यता है.
कौटिल्य दृष्टि
भारत पर विश्वास क्यों न करें?
सभ्यता की कसौटी पर वैदिक काल से समकालीन राजनीति तक एक सतर्क प्रतिवेदन विशेष! विश्व में अनेक साम्राज्य उठे और मिट गए। उनके पास अपार सैन्य शक्ति थी, विशाल संपदा थी और असीम महत्वाकांक्षा थी। किंतु इतिहास ने उन्हें विजेता के रूप में याद किया, विश्वगुरु के रूप में नहीं। भारत आज भी इसलिए जीवित है क्योंकि उसने साम्राज्य नहीं, सभ्यता का निर्माण किया। भारत ने वेदों में मनुष्य को देवत्व की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाया। उपनिषदों ने आत्मा की स्वतंत्रता का उद्घोष किया। राम ने सिखाया कि राज्य से बड़ा धर्म है। श्रीकृष्ण ने बताया कि शक्ति तभी पवित्र है जब वह न्याय की रक्षा करे। बुद्ध ने करुणा दी, महावीर ने अहिंसा और आचार्यों ने ज्ञान की अखंड परंपरा। यही भारत की पहचान है। भारत की तलवार कभी लूट का प्रतीक नहीं बनी। यहाँ विजय का अर्थ पराधीनता नहीं, धर्म की स्थापना रहा। लंका पर अधिकार नहीं किया गया, हस्तिनापुर पर निजी स्वामित्व स्थापित नहीं हुआ। यही भारतीय राजनीति का मूल संस्कार था। मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों ने भारत की संपदा लूटी, मंदिर तोड़े, विश्वविद्यालय जलाए और सांस्कृतिक स्मृतियों को मिटाने का प्रयास किया। परंतु भारत की आत्मा न झुकी, न बिकी। महाराणा प्रताप का स्वाभिमान, छत्रपति शिवाजी महाराज का हिंदवी स्वराज्य, गुरु गोबिन्द सिंह का बलिदान और असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों का त्याग इस राष्ट्र की अमर चेतना बन गया।
स्वतंत्रता के बाद भी भारत ने विश्व को शक्ति का संयम सिखाया। युद्ध जीते, पर विजय को विस्तारवाद का माध्यम नहीं बनाया। संकटग्रस्त देशों की सहायता की, लोकतंत्र को जीवित रखा और विविधताओं को राष्ट्र की शक्ति बनाया। यह आचरण भारत की सभ्यतागत स्मृति का प्रमाण है। परंतु आज सबसे बड़ा संकट सीमाओं पर नहीं, स्मृतियों पर है। जब इतिहास को सुविधा के अनुसार लिखा जाता है, जब राष्ट्रीय विमर्श दलगत हितों में बँट जाता है, जब वोट राष्ट्रनीति पर भारी पड़ने लगते हैं, तब सभ्यता की जड़ें कमजोर होती हैं। राष्ट्र केवल संविधान से नहीं, चरित्र से भी चलता है। भारत पर विश्वास किसी सरकार पर विश्वास नहीं है; यह उस सनातन चेतना पर विश्वास है जिसने पाँच हजार वर्षों के संघर्षों के बाद भी मानवता का हाथ नहीं छोड़ा। यही कारण है कि भारत आज भी विश्व के लिए आशा का केंद्र है। भारत पर विश्वास कीजिए, क्योंकि यह केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, कर्तव्य, करुणा और आत्मसंयम पर आधारित एक जीवित सभ्यता है। सत्ता बदलती रहती है, पर भारत की आत्मा नहीं।
