संपादकीय, कौटिल्य दृष्टि
राष्ट्र को सोना देने वाले गुमनाम, सत्ता के नायक महान?
भारत का इतिहास केवल राजसिंहासनों का इतिहास नहीं है, बल्कि त्याग, तपस्या और राष्ट्र समर्पण का इतिहास भी है। दुर्भाग्य यह है कि जिन लोगों ने राष्ट्रहित में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, वे धीरे-धीरे इतिहास के हाशिए पर धकेल दिए गए। सन् 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तब देश आर्थिक और सैन्य संकट से जूझ रहा था। ऐसे कठिन समय में दरभंगा राज परिवार ने लगभग 600 किलोग्राम सोना, तीन निजी विमान और अन्य बहुमूल्य संसाधन राष्ट्ररक्षा के लिए भारत सरकार को समर्पित कर दिए। यह दान केवल धन का नहीं था, बल्कि राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण था।
इसी प्रकार, भारत की प्रथम स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने आधुनिक भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव रखने में ऐतिहासिक योगदान दिया। एम्स की स्थापना के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए, विदेशी सहयोग जुटाया और अपना निजी निवास "मैनरविल" भी संस्थान के उपयोग हेतु समर्पित कर दिया। आज देश का सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान एम्स उनके दूरदर्शी नेतृत्व का साक्षी है।दूसरी ओर, जयपुर की महारानी गायत्री देवी लोकतंत्र की एक लोकप्रिय आवाज़ थीं। आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भेजा गया। यह घटना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिस पर आज भी बहस होती है।
इन घटनाओं के बीच कुछ प्रश्न आज भी समाज में उठते हैं। क्या 1962 के युद्ध के समय देशवासियों द्वारा दिया गया स्वर्ण भंडार किस प्रकार उपयोग में आया, इसका पूरा सार्वजनिक लेखा-जोखा कभी सामने आया? क्या उस राष्ट्रीय त्याग का समुचित दस्तावेजीकरण हुआ? क्या राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पित करने वाले परिवारों को वह सम्मान मिला जिसके वे अधिकारी थे?
इन प्रश्नों पर चर्चा होना लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि बिना प्रमाण किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर यह आरोप न लगाया जाए कि उसने दान में मिला सोना अपने पास रख लिया। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख ऐसे आरोप की पुष्टि नहीं करते।
राष्ट्र का दायित्व केवल स्मारक बनाना नहीं, बल्कि स्मृति को जीवित रखना भी है। दरभंगा राज परिवार का त्याग, राजकुमारी अमृत कौर की राष्ट्रसेवा और महारानी गायत्री देवी का लोकतांत्रिक संघर्षये तीनों भारत के इतिहास के ऐसे अध्याय हैं जिन्हें नई पीढ़ी तक तथ्य, संतुलन और सम्मान के साथ पहुँचाना चाहिए।
इतिहास तभी न्याय करता है जब वह प्रमाणों पर आधारित हो और राष्ट्र तभी महान बनता है जब वह अपने वास्तविक त्यागियों को सम्मान देता है।
राजेन्द्र नाथ तीसरी