मनुस्मृति पर मिथ्या विवाद इतिहास नहीं, राजनीति कटघरे में

राजेन्द्र  नाथ तिवारी, सम्पादक 

मनुस्मृति पर व्यर्थ का विवाद : इतिहास को कटघरे में खड़ा करने की राजनीति


मनुस्मृति पर होने वाले विवादों को देखकर कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों ने इतिहास को समझने के बजाय उसे राजनीतिक हथियार बना लिया है। हजारों वर्ष पुरानी एक स्मृति को वर्तमान समय के चश्मे से देखकर उस पर अभियोग चलाना न तो बौद्धिकता का प्रमाण है और न ही निष्पक्षता का। यह केवल वैचारिक पूर्वाग्रह का प्रदर्शन है। सत्य यह है कि मनुस्मृति भारतीय सभ्यता की विधि, समाज और नैतिक चिंतन की एक ऐतिहासिक धरोहर है। उससे असहमति हो सकती है, उसकी अनेक बातों पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं, किंतु उसे बिना पढ़े, बिना समझे और बिना उसके कालखंड का अध्ययन किए केवल राजनीतिक नारों के आधार पर खारिज कर देना ज्ञान नहीं, बल्कि अज्ञान का उत्सव है।

विडंबना यह है कि जो लोग मनुस्मृति को कोसते नहीं थकते, वे अक्सर उन विदेशी विचारधाराओं की आलोचना करने का साहस नहीं जुटा पाते जिनके नाम पर विश्वभर में करोड़ों लोगों का दमन हुआ। भारत की परंपराओं पर प्रहार करना उन्हें प्रगतिशीलता लगता है, किंतु अपने वैचारिक प्रतीकों की समीक्षा उन्हें असुविधाजनक प्रतीत होती है। मनुस्मृति को लेकर दशकों से ऐसा वातावरण बनाया गया मानो भारत की समस्त समस्याओं की जड़ यही एक ग्रंथ हो। यह दृष्टिकोण न केवल ऐतिहासिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, बल्कि बौद्धिक रूप से भी दुर्बल है। कोई भी गंभीर इतिहासकार जानता है कि समाज का विकास अनेक आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारकों से होता है; उसे किसी एक ग्रंथ में समेट देना तथ्य नहीं, प्रचार है।

भारतीय परंपरा स्वयं कहती है—

“धर्मो रक्षति रक्षितः।”

अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यहाँ धर्म का अर्थ न्याय, मर्यादा और कर्तव्य है। यदि किसी व्यवस्था में अन्याय है तो उसका सुधार भी भारतीय चिंतन की परंपरा का ही अंग है। यही कारण है कि भारत में एक नहीं, अनेक स्मृतियाँ रची गईं और समयानुसार नई व्याख्याएँ सामने आईं।आज भारत का सर्वोच्च विधिक ग्रंथ संविधान है। संविधान हमारे राष्ट्रीय जीवन का मार्गदर्शक है और प्रत्येक नागरिक के लिए सर्वोपरि है। किंतु संविधान का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी ऐतिहासिक विरासत का अपमान करें। सभ्य समाज अपनी धरोहरों की समीक्षा करता है, उन्हें गाली नहीं देता।

दुर्भाग्य से कुछ राजनीतिक प्रवृत्तियों ने इतिहास को अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि ध्रुवीकरण का साधन बना दिया है। जब वर्तमान की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करना कठिन हो जाता है, तब अतीत के प्रतीकों को खलनायक बनाकर जनभावनाओं को भटकाने का प्रयास किया जाता है। इससे न समाज का कल्याण होता है और न ही लोकतंत्र मजबूत होता है। भारत का भविष्य उन लोगों के हाथों में सुरक्षित नहीं होगा जो अपनी जड़ों से घृणा करना सिखाते हैं। भविष्य उनका होगा जो इतिहास का अध्ययन करेंगे, उसकी उपलब्धियों को स्वीकार करेंगे, उसकी त्रुटियों से सीखेंगे और संविधान के आदर्शों के अनुरूप आगे बढ़ेंगे।

मनुस्मृति पर विमर्श हो, अवश्य हो; आलोचना हो, अवश्य हो; परंतु वह तथ्यों पर आधारित हो, नारों पर नहीं। इतिहास को समझने के लिए अध्ययन चाहिए, क्रोध नहीं; और राष्ट्र निर्माण के लिए आत्मविश्वास चाहिए, आत्मद्वेष नहीं। भारत की सभ्यता किसी एक ग्रंथ, एक व्यक्ति या एक युग से नहीं बनी। यह हजारों वर्षों की साधना, संघर्ष, चिंतन और आत्मसुधार का परिणाम है। इसलिए आवश्यकता विवादों को भड़काने की नहीं, बल्कि सत्य को समझने की है। जो समाज अपने अतीत को केवल कटघरे में खड़ा करता है, वह भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता; और जो समाज अपने अतीत से सीखकर आगे बढ़ता है, वही इतिहास रचता है।

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