प्रो. संजय द्विवेदी : स्वधर्म, कर्म और राष्ट्रचेतना के आलोक में हिन्दी पत्रकारिता का एक उज्ज्वल अध्याय!
बस्ती, 272001
भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों का इतिहास नहीं है; वह राष्ट्र की चेतना, समाज की संवेदना और लोकतंत्र की आत्मा का इतिहास भी है। इस परंपरा को समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्वों ने समृद्ध किया जिन्होंने पत्रकारिता को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकमंगल का माध्यम माना। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की वैचारिक गंभीरता, बनारसीदास चतुर्वेदी की जनपक्षधरता, गणेश शंकर विद्यार्थी के निर्भीक राष्ट्रीय चरित्र और पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की सांस्कृतिक चेतना से निर्मित इस परंपरा में समकालीन समय में यदि किसी शिक्षाविद्, लेखक और पत्रकार ने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है, तो उनमें प्रो. संजय द्विवेदी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद की सांस्कृतिक और वैचारिक धरती से निकले प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने ज्ञान, श्रम, अनुशासन और सतत अध्ययन के बल पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा अर्जित की है। उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि प्रतिभा का वास्तविक मूल्य उसके कर्म, चरित्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से निर्धारित होता है। उन्होंने पत्रकारिता को बाज़ार की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठाकर राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक दायित्व के साथ जोड़ने का सतत प्रयास किया है।
प्रो. द्विवेदी केवल पत्रकारिता के अध्यापक नहीं, बल्कि विचारों के संवाहक हैं। उनके व्याख्यानों, लेखों और संवादों में भारतीय ज्ञान-परंपरा, लोकतांत्रिक मूल्यों, भाषा-सम्मान और राष्ट्रीय दृष्टि का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। वे मानते हैं कि पत्रकारिता का प्रथम धर्म सत्य, दूसरा धर्म समाज और तीसरा धर्म राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व है। यही कारण है कि उनके शिष्यों और सहकर्मियों के बीच वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि प्रेरणा-स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
हिन्दी भाषा के प्रति उनका समर्पण विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने अनेक मंचों पर यह स्थापित किया है कि भारतीय भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा हैं। उनके विचारों में हिन्दी का सम्मान किसी अन्य भाषा के विरोध का नहीं, बल्कि भारत की भाषायी समृद्धि के सम्मान का प्रतीक है। यही उदार और समन्वयी दृष्टि उन्हें समकालीन हिन्दी पत्रकारिता के प्रमुख विचारकों की श्रेणी में स्थापित करती है। आज जब मीडिया अनेक प्रकार की चुनौतियों-तकनीकी परिवर्तन, बाज़ारवाद, सूचना की तीव्र गति और विश्वसनीयता के संकट-का सामना कर रहा है, तब प्रो. संजय द्विवेदी का चिंतन पत्रकारिता को उसके मूल मूल्य याद दिलाता है। उनका आग्रह है कि पत्रकार केवल घटनाओं का दर्शक नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायी जागरूक नागरिक भी होता है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता का आधार तथ्य, विवेक, संवेदना और नैतिक साहस है।
बस्ती से आरम्भ हुई उनकी यात्रा देश के अनेक प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं पत्रकारिता संस्थानों तक पहुँची है। यह यात्रा केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय प्रतिभा, परिश्रम और आत्मविश्वास की प्रेरक गाथा है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि छोटे नगरों की धरती भी ऐसे व्यक्तित्व गढ़ सकती है जो राष्ट्रीय विमर्श को दिशा दें और नई पीढ़ी के लिए आदर्श बनें।
समकालीन हिन्दी पत्रकारिता के परिदृश्य में प्रो. संजय द्विवेदी एक ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनकी पहचान पद से नहीं, बल्कि उनके विचार, लेखन, अध्यापन, संगठन क्षमता और राष्ट्रनिष्ठ दृष्टि से निर्मित हुई है। आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें केवल एक पत्रकारिता शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के मूल्य-आधारित पुनर्जागरण के समर्थ प्रवक्ता के रूप में स्मरण करेंगी।
कौटिल्य का भारत प्रोफेसर संजय द्विवेदी के यशस्वी जीवन की कामना करता है!