युवा शक्ति नहीं, राष्ट्र शक्ति बनें: हिंसा किसी आंदोलन का समाधान नहीं
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ असहमति का सम्मान है, विरोध का अधिकार है और सरकारों से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता भी है। किंतु जब विरोध की आड़ में आगजनी, पथराव, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश, यातायात अवरुद्ध करना और समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास होने लगे, तब यह लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी मर्यादा पर आघात बन जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का युवा किसी भी विचारधारा का समर्थक बने, परंतु सबसे पहले राष्ट्र का समर्थक बने। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि रहता है। किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे देश मजबूत हुआ या कमजोर।
यदि कोई आंदोलन शांतिपूर्ण, अनुशासित और संवैधानिक है, तो वह लोकतंत्र की सुंदरता है। परंतु यदि उसके नाम पर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और कानून-व्यवस्था को चुनौती दी जाती है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक और राष्ट्र को होता है। सार्वजनिक संपत्ति किसी सरकार की नहीं, जनता के कर से बनी राष्ट्रीय संपत्ति होती है। उसे जलाना या नष्ट करना अंततः देश की ही हानि है।
भारत का इतिहास बताता है कि महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर विश्व की सबसे बड़ी सत्ता को चुनौती दी। लोकतांत्रिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी मार्ग विचार, संवाद, जनमत और संवैधानिक संघर्ष है, न कि हिंसा।
युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह सोशल मीडिया के उकसावे, अफवाहों और भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर तथ्यों का अध्ययन करे। राष्ट्र निर्माण में शिक्षा, नवाचार, सेवा, अनुशासन और सामाजिक समरसता की भूमिका कहीं अधिक बड़ी है।
आज भारत अमृतकाल की ओर अग्रसर है। ऐसे समय में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। विरोध हो, पर विवेक के साथ; संघर्ष हो, पर संविधान के दायरे में; और राजनीति हो, पर भारत की एकता, अखंडता और विकास के संकल्प के साथ।
राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में—यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।