संपादकीय/कौटिल्य दृष्टि
गरीबों की थाली में सड़ा अनाज: आखिर किसकी मिलीभगत से चल रहा है यह घोटाला?
FCI, खाद्य विभाग, जिला प्रशासन और आपूर्ति तंत्र—सबके दामन पर सवाल
बस्ती।
जिस देश में "अन्न" को देवता का दर्जा दिया जाता है, उसी देश में गरीबों की थाली तक सड़ा-गला, कीड़े लगा और बदबूदार गेहूं पहुंचना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के साथ अपराध है। बस्ती जिले की उचित दर की दुकानों पर पहुंचे खराब गेहूं ने भारतीय खाद्य निगम (FCI), खाद्य एवं रसद विभाग, परिवहन एजेंसियों और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,यह केवल कुछ बोरियों का मामला नहीं है, बल्कि पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है। जिस गेहूं को देखकर लोग कह रहे हैं कि "इसे तो पशु भी नहीं खाएंगे", वही अनाज गरीबों, मजदूरों, विधवाओं, बुजुर्गों और अंत्योदय परिवारों को बांटा जा रहा है। आखिर गरीबों के जीवन की कीमत इतनी कम क्यों समझी जा रही है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गोदामों से गुणवत्तापूर्ण अनाज निकला था, तो रास्ते में वह सड़ा कैसे? और यदि गोदाम से ही खराब अनाज निकला, तो गुणवत्ता जांच करने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे? हर चरण में निरीक्षण की व्यवस्था है, फिर भी ऐसा अनाज लाभार्थियों तक पहुंच गया। इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं पूरी व्यवस्था ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में गंभीर चूक की है।
जिला प्रशासन भी जवाब दे,जिले का प्रशासन केवल बैठकों और समीक्षा तक सीमित नहीं रह सकता। जिलाधिकारी जन वितरण प्रणाली के सर्वोच्च जिला स्तरीय अधिकारी होते हैं। यदि जिले में हजारों कार्डधारकों तक खराब अनाज पहुंच गया, तो यह प्रशासनिक निगरानी की विफलता भी मानी जाएगी।क्या किसी अधिकारी ने गोदामों का आकस्मिक निरीक्षण किया?क्या गुणवत्ता की जांच वास्तव में हुई?क्या दोषी कर्मचारियों और एजेंसियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई होगी?यदि नहीं, तो यह मौन आखिर किसके हित में है?FCI और खाद्य विभाग की जवाबदेही तय हो भारतीय खाद्य निगम करोड़ों रुपये खर्च कर अनाज का भंडारण करता है। यदि उसी अनाज की गुणवत्ता वितरण के समय इतनी खराब मिल रही है, तो या तो भंडारण में भारी लापरवाही हुई है या फिर गुणवत्ता नियंत्रण केवल कागजों पर चल रहा है।खाद्य एवं रसद विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। यदि कोटेदार स्वयं खराब अनाज की शिकायत कर रहे हैं और कार्डधारक राशन लेने से इनकार कर रहे हैं, तो यह संकेत है कि समस्या गंभीर है और इसकी उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है।
गरीबों के साथ दोहरा अन्याय,जिस गरीब के पास बाजार से महंगा गेहूं खरीदने की क्षमता नहीं है, उसी को सरकार के नाम पर घटिया अनाज दिया जा रहा है। यह केवल भोजन की गुणवत्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि गरीबों की गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। खराब अनाज से बीमारियां फैल सकती हैं, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
क्या होगी कार्रवाई या फिर सब कुछ दब जाएगा?जनता अब यह जानना चाहती है कि दोषी कौन है। केवल जांच समिति बनाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी अधिकारी, गोदाम प्रभारी, परिवहन एजेंसी या ठेकेदार की लापरवाही सामने आती है तो उसके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
'कौटिल्य का भारत' की मांगपूरे जिले में वितरित खाद्यान्न की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए।FCI गोदामों से लेकर कोटे की दुकानों तक की पूरी आपूर्ति श्रृंखला का ऑडिट कराया जाए।दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित एजेंसियों पर एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई हो।सभी कार्डधारकों को तत्काल गुणवत्तापूर्ण नया खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाए।जिला प्रशासन जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे ताकि जनता को सच्चाई पता चल सके।
संपादकीय टिप्पणी
गरीबों को सम्मानजनक जीवन देना सरकार का संवैधानिक दायित्व है, एहसान नहीं। यदि गरीब की थाली में सड़ा हुआ अनाज परोसा जाएगा, तो यह केवल खाद्यान्न वितरण की विफलता नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रतीक माना जाएगा। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार लोग जवाब दें—आखिर गरीबों की थाली से इतना बड़ा खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा?