131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पराजित: लोकतंत्र में संख्या नहीं, राष्ट्रीय सहमति सर्वोपरि
भारतीय संसद में 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त न कर पाने के कारण पारित नहीं हो सका। कुछ लोगों ने इसे सरकार की हार कहा, तो कुछ ने विपक्ष की जीत। किंतु यदि इस घटना को संविधान की दृष्टि से देखा जाए, तो यह न किसी दल की विजय है और न किसी दल की पराजय। यह भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना की पुष्टि है कि संविधान में संशोधन केवल संख्याबल से नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सहमति से होना चाहिए। भारत का संविधान कोई साधारण कानून नहीं है। यह स्वतंत्रता संग्राम की तपस्या, संविधान सभा के मनीषियों के चिंतन और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का जीवंत दस्तावेज़ है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था की कि संविधान में परिवर्तन करना कठिन हो, ताकि कोई भी सरकार अपने अल्पकालिक राजनीतिक हितों के लिए इसकी मूल संरचना से खिलवाड़ न कर सके।संविधान संशोधन के लिए संसद में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत का प्रावधान इसी उद्देश्य से रखा गया है। जब 131वें संशोधन को यह समर्थन नहीं मिला, तो उसका गिर जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक और संवैधानिक परिणाम था।यह घटना एक और महत्वपूर्ण संदेश देती है। लोकतंत्र में केवल चुनाव जीत लेना पर्याप्त नहीं होता। संवैधानिक विषयों पर संवाद, विश्वास और सहमति का निर्माण भी उतना ही आवश्यक है। संसद केवल बहुमत का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का सर्वोच्च सदन है। जब व्यापक सहमति नहीं बनती, तब संविधान स्वयं सत्ता को संयम का संदेश देता है।यह भी स्मरण रखना चाहिए कि किसी भी संविधान संशोधन पर मतभेद होना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। स्वस्थ लोकतंत्र में विचारों का टकराव होता है, बहस होती है और अंततः संविधान के निर्धारित नियमों के अनुसार निर्णय होता है। यही भारत की संसदीय परंपरा की सुंदरता है।राजनीतिक दलों को इस अवसर पर आत्ममंथन करना चाहिए। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि संवैधानिक परिवर्तन के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यापक समर्थन भी आवश्यक है। वहीं विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह केवल विरोध के लिए विरोध न करे, बल्कि राष्ट्रीय हित के प्रश्नों पर रचनात्मक भूमिका निभाए।भारत आज विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। हमारी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यहाँ संविधान सर्वोच्च है। सरकारें बदलती हैं, संसद का स्वरूप बदलता है, राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, किंतु संविधान की मर्यादा और उसकी प्रक्रिया स्थिर रहती है। यही हमारी लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है।131वें संविधान संशोधन विधेयक का पारित न होना इसी सत्य की पुनर्पुष्टि करता है कि भारत में संविधान किसी सरकार की इच्छा का नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का दस्तावेज़ है। संविधान के प्रति यह सम्मान ही भारत के लोकतंत्र को विश्व में विशिष्ट बनाता है।
अंततः—"लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति बहुमत के अहंकार में नहीं, संविधान के सम्मान में निहित होती है। संसद की सबसे बड़ी विजय वही है, जहाँ संविधान की मर्यादा सर्वोपरि बनी रहे।"