सीतायण,अध्याय दसहनुमान का विध्वंस-तांडव, अक्षयकुमार-वध एवं लंका-दहन
महाकवियों के आलोक में — वाल्मीकि, तुलसीदास एवं कंबन की दृष्टि से एक तुलनात्मक अनुशीलन
शक्ति का प्रथम उद्घोष:::सीता से भेंट कर लेने मात्र से हनुमान का लंका-आगमन पूर्ण नहीं होता। दूत का धर्म केवल संदेश देना नहीं, शत्रु की शक्ति, उसकी दुर्बलता और उसके साम्राज्य की वास्तविक स्थिति का आकलन करना भी है। वाल्मीकि रामायण का सुंदरकाण्ड इस बिंदु पर एक निर्णायक मोड़ लेता है , सीता से विदा लेकर हनुमान भावुक दूत से रणनीतिक योद्धा में रूपांतरित हो जाते हैं। यह रूपांतरण आकस्मिक नहीं, सुविचारित है। हनुमान स्वयं विचार करते हैं कि केवल संदेशवाहक बनकर लौट जाना राम-कार्य के लिए अपर्याप्त होगा ::रावण की सैन्य-शक्ति, उसकी दरबारी मनोवृत्ति और लंका की सुरक्षा-व्यवस्था का प्रत्यक्ष परीक्षण आवश्यक है।
यह तांडव क्रोध का अनियंत्रित विस्फोट नहीं, अपितु सुनियोजित रणनीति है विनाश यहाँ साधन है, संदेश है, लक्ष्य नहीं। इसी विवेकपूर्ण निर्णय से आरंभ होता है वह त्रिस्तरीय तांडव जो अशोक वाटिका के विध्वंस से लेकर अक्षयकुमार-वध और अंततः लंका-दहन तक विस्तृत होता है। यह अंक इसी प्रसंग को वाल्मीकि, तुलसीदास और कंबन ,तीन महाकवियों की पृथक्-पृथक् दृष्टियों के आलोक में प्रस्तुत करता है, प्रत्येक परंपरा को उसके मौलिक स्रोत में सुरक्षित रखते हुए।
प्रमदावन (अशोक वाटिका) का विध्वंस::वाल्मीकि रामायण के सुंदरकाण्ड का ४१वाँ सर्ग हनुमान द्वारा प्रमदावन के विध्वंस का वर्णन करता है। शिंशपा वृक्ष से उतरकर हनुमान यह प्रश्न करते हैं कि साम, दान और भेद , इन तीन नीतियों से राक्षसों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला; अतः दण्ड-नीति का प्रयोग आवश्यक है। इसी विचार के साथ वे फलों से लदे वृक्षों को जड़ से उखाड़ना, लताओं को तोड़ना, सरोवरों को अस्त-व्यस्त करना और उद्यान की समस्त शोभा को विनष्ट करना आरंभ करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास इसी प्रसंग को अत्यंत संक्षिप्त किंतु सारगर्भित शब्दों में प्रस्तुत करते हैं — रावण के भवन में जब राक्षसियाँ दौड़ी-दौड़ी सूचना देती हैं कि एक विशाल वानर आया और उसने वाटिका उजाड़ डाली।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
इन दो पंक्तियों में तुलसी की काव्य-मितव्ययिता स्पष्ट है , जहाँ वाल्मीकि सर्ग-दर-सर्ग विस्तार से वाटिका के प्रत्येक भाग के विध्वंस का वर्णन करते हैं, वहीं तुलसी भक्ति-काव्य की परंपरा में घटना को संक्षेप में, किंतु प्रभावशाली ढंग से समेट देते हैं। दोनों में सामान्य तत्त्व यह है कि विध्वंस का समाचार पहले रक्षिकाओं और राक्षसों के मुख से रावण तक पहुँचता है, स्वयं रावण घटनास्थल पर नहीं जाता — यह लंकापति के दर्प और स्वयं-मूल्यांकन की चूक का प्रथम संकेत है।
किंकर-वध एवं जम्बुमाली-वध::वाल्मीकि रामायण के सर्ग ४२ में क्रुद्ध रावण अस्सी हजार किंकर नामक राक्षसों को हनुमान के दमन हेतु भेजता है, जिनका हनुमान एक वाटिका-द्वार के स्तंभ को अस्त्र बनाकर संहार कर देते हैं। सर्ग ४३ में वे चैत्य-प्रासाद को ध्वस्त करते हैं, और सर्ग ४४ में प्रहस्त-पुत्र जम्बुमाली का वध होता है। यह क्रमिक उग्रता , किंकरों से जम्बुमाली तक — रावण की सैन्य-शक्ति के स्तर-दर-स्तर परीक्षण की वाल्मीकि-कृत रणनीतिक संरचना है। प्रत्येक पराजय के पश्चात रावण अगले, अधिक सामर्थ्यवान सेनापति को भेजता है, और प्रत्येक बार हनुमान की शक्ति का नया आयाम प्रकट होता है — यह काव्य-रचना की दृष्टि से भी एक सुचिंतित आरोहण (crescendo) है, जो अंततः अक्षयकुमार के वध पर पहुँचता है।
अक्षयकुमार-वध:: जम्बुमाली के पश्चात रावण के सात मंत्रि-पुत्र और तदुपरांत स्वयं रावण का पुत्र अक्षयकुमार युद्ध हेतु भेजा जाता है। अक्षयकुमार अपने बाल्यकाल के बावजूद असाधारण पराक्रमी है , रथ, धनुष और दिव्यास्त्रों से सुसज्जित होकर वह हनुमान पर आक्रमण करता है। वाल्मीकि इस युद्ध का वर्णन विशेष गंभीरता से करते हैं, क्योंकि यह प्रथम अवसर है जब हनुमान का सामना किसी वास्तविक रूप से शक्तिशाली, अस्त्र-प्रशिक्षित राजकुमार से होता है, न कि साधारण सैनिकों से। युद्ध में हनुमान अक्षयकुमार के रथ को तोड़ते हैं, सारथी का वध करते हैं, और अंततः राजकुमार को दोनों भुजाओं से पकड़कर आकाश में घुमाकर भूमि पर पटक देते हैं, जिससे उसका शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है। यह वध लंका में शोक की प्रथम गंभीर लहर उत्पन्न करता है और रावण को प्रथम बार यह अनुभव कराता है कि यह वानर कोई साधारण शत्रु नहीं।
दूसरा पक्ष ::पुत्र-वध का नैतिक आयाम; यह ध्यातव्य है कि अक्षयकुमार का दोष केवल इतना था कि वह अपने पिता की आज्ञा तथा राजधर्म के पालन हेतु युद्ध में उतरा। परंपरागत व्याख्याकार इस प्रसंग को हनुमान की क्रूरता के रूप में नहीं, अपितु धर्मयुद्ध की अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत करते हैं , जहाँ अधर्म के पक्ष में खड़ा होना, चाहे वह पुत्र-कर्तव्य से प्रेरित ही क्यों न हो, युद्ध के परिणाम से मुक्त नहीं करता। यह प्रसंग पाठक को रामायण के इस मूल सिद्धांत की पुनः स्मृति कराता है कि पक्ष-चयन का दायित्व व्यक्तिगत है।
मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र-बंधन एवं रावण-संवाद::अक्षयकुमार के वध के पश्चात रावण अपने ज्येष्ठ पुत्र इन्द्रजित (मेघनाद) को भेजता है। मेघनाद यह भलीभाँति जानता है कि सामान्य अस्त्रों से हनुमान पर विजय असंभव है, अतः वह ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है। हनुमान, ब्रह्मास्त्र की मर्यादा और ब्रह्मा के वरदान का सम्मान करते हुए, स्वेच्छा से बंधन स्वीकार करते हैं ;यद्यपि वे जानते हैं कि यह अस्त्र वस्तुतः उन्हें बाँध नहीं सकता। यह स्वेच्छा-बंधन हनुमान के चरित्र की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषता उजागर करता है , बल होते हुए भी मर्यादा और लक्ष्य के प्रति सजगता। उनका वास्तविक उद्देश्य रावण की सभा तक पहुँचना और लंकापति से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना ही था, जो इस बंधन के माध्यम से सहज सिद्ध हो जाता है।
रावण-सभा में हनुमान निर्भीक होकर राम की शक्ति, सीता की मुक्ति की अनिवार्यता और रावण के लिए क्षमा-याचना के अंतिम अवसर की बात कहते हैं। रावण क्रुद्ध होकर वध का आदेश देता है, किंतु विभीषण के हस्तक्षेप से , दूत-वध अधर्म है, यह स्मरण कराने पर , रावण दंड को पुच्छ-दाह में परिवर्तित करता है। तुलसीदास इसी दंड-आदेश को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं, रावण के वाक्यों में निहित उपहास सहित।
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
— श्रीरामचरितमानस,
लंका-दहन::रावण के आदेश पर राक्षस हनुमान की पूँछ में वस्त्र और घृत-तेल लपेटकर अग्नि प्रज्वलित करते हैं। तुलसीदास के अनुसार इस कार्य में सम्पूर्ण लंका-नगर का घृत और तेल समाप्त हो जाता है — यह विवरण नगर की समृद्धि और घटना की व्यापकता दोनों को एक साथ व्यंजित करता है।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
हनुमान अपनी पूँछ को स्वेच्छा से बढ़ाकर इस प्रहसन को स्वयं एक अवसर में परिवर्तित कर देते हैं , नगरवासी ढोल बजाकर, ताली पीटकर उन्हें विजय-यात्रा की भाँति सम्पूर्ण लंका में घुमाते हैं। यह क्रीड़ा-भाव अत्यंत सूचक है , शत्रु स्वयं अनजाने में हनुमान को नगर के प्रत्येक मार्ग, भवन-रचना और सुरक्षा-व्यवस्था का सम्पूर्ण भौगोलिक ज्ञान करा देता है, इससे पूर्व कि दाह आरंभ हो।
जब पूँछ में अग्नि प्रज्वलित होती है, हनुमान लघु रूप त्यागकर विराट रूप धारण करते हैं और लंका के भवन-दर-भवन कूदते हुए सम्पूर्ण नगर को अग्नि के हवाले कर देते हैं — केवल विभीषण का निवास इस दाह से अछूता रहता है, जो धर्मपरायणता के प्रति काव्य की मौन किंतु सुस्पष्ट श्रद्धांजलि है।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मंझारी॥
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
दाह के पश्चात हनुमान को यह विचार उद्वेलित करता है कि कहीं इस अग्नि में सीता को कोई हानि तो नहीं पहुँची , यह क्षणिक भय उनके भीतर के सेवक-भाव और वात्सल्य दोनों को उजागर करता है। समुद्र में पूँछ बुझाकर, लघु रूप धारण कर वे पुनः शिंशपा वृक्ष के निकट सीता के समक्ष उपस्थित होते हैं।
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
जिस पूँछ को शत्रु ने अपमान का साधन बनाया, हनुमान ने उसी को विनाश का अस्त्र बना दिया , यही सच्चे बल की पहचान है, जो अपमान से भी अवसर गढ़ लेता है।
कंबन के रामावतारम् में लंका-दहन::तमिल महाकवि कंबन का रामावतारम् इस प्रसंग को अधिक नाटकीय एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करता है। कंबन-परंपरा में हनुमान का रावण-सभा में संवाद अधिक तीक्ष्ण, अधिक वाक्पटु और अधिक दीर्घ है ,यहाँ हनुमान को केवल दूत नहीं, अपितु स्वयं एक कूटनीतिज्ञ एवं तेजस्वी वक्ता के रूप में चित्रित किया गया है, जो रावण के दर्प को शब्दों से भी उतना ही आहत करता है जितना अग्नि से लंका को। तमिल काव्य-परंपरा की यह विशेषता उत्तर भारतीय परंपराओं से इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ हनुमान की बुद्धि और वाक्-शक्ति को उनके शारीरिक पराक्रम के समकक्ष महत्त्व दिया गया है।
परंपरा
प्रसंग का स्वरूप
विशिष्ट दृष्टिकोण
वाल्मीकि रामायण (सुंदरकाण्ड, सर्ग ४१–५४)
क्रमिक — वाटिका-विध्वंस, किंकर-वध, जम्बुमाली-वध, अक्षयकुमार-वध, ब्रह्मास्त्र-बंधन, रावण-संवाद, पुच्छ-दाह, लंका-दहन
नीति-प्रधान — हनुमान बल के साथ संयम और कूटनीतिक विवेक का प्रतीक; विनाश साधन है, लक्ष्य नहीं
श्रीरामचरितमानस (तुलसीदास, सुंदरकाण्ड)
भक्ति-प्रधान संक्षिप्त वर्णन — वाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध, बंधन, पुच्छ-दाह द्वारा लंका-दहन
भक्ति-प्रधान — प्रत्येक कृत्य राम-सेवा और दास्य-भाव की अभिव्यक्ति; अट्टहास एवं क्रीड़ा-भाव सहित
कंबन का तमिल रामावतारम्
हनुमान के पराक्रम का अधिक विस्तृत, नाटकीय चित्रण
तमिल काव्य-परंपरा में हनुमान अधिक उग्र एवं वाक्पटु योद्धा के रूप में चित्रित; रावण-संवाद अधिक विस्तार से
अद्भुत रामायण
मुख्यतः सीता की महाकाली/आदिशक्ति भूमिका पर केंद्रित
लंका-प्रसंग गौण; हनुमान का कृत्य सीता की अंतर्निहित शक्ति की छाया मात्र माना गया
वैचारिक निष्कर्ष : तांडव में निहित नीति:: अशोक वाटिका का विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और लंका-दहन ,यह त्रिविध तांडव केवल पराक्रम-प्रदर्शन नहीं, अपितु एक सुनियोजित सैन्य एवं मनोवैज्ञानिक रणनीति है। प्रत्येक चरण का एक स्पष्ट प्रयोजन है , वाटिका-विध्वंस से शत्रु का ध्यान आकर्षित करना, क्रमिक युद्धों से शत्रु-सेना की वास्तविक शक्ति का आकलन करना, स्वेच्छा-बंधन से रावण तक प्रत्यक्ष पहुँच बनाना, और अंततः लंका-दहन से शत्रु के मनोबल पर निर्णायक आघात करना — यह समस्त क्रम हनुमान की बुद्धि, बल और भक्ति के त्रिविध समन्वय को प्रकट करता है।
आधुनिक भारत के लिए यह प्रसंग एक कालातीत प्रतिमान प्रस्तुत करता है — शक्ति का प्रयोग तभी सार्थक है जब वह विवेक द्वारा दिशा-निर्देशित हो, और सेवा-भाव द्वारा मर्यादित। हनुमान का यह तांडव क्रोध का विस्फोट नहीं, अपितु धर्म-रक्षा हेतु सुनियोजित शक्ति-प्रदर्शन का शाश्वत आदर्श है — जो जनकपुर से जगद्गुरु भारत की ओर अग्रसर राष्ट्र के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना त्रेता युग में था।
(अगला अध्याय : हनुमान का प्रत्यागमन एवं मधुवन-लीला)
