धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा: न मोदी की हार, न विपक्ष की जीत

 सम्पादकीय, कौटिल्य  दृष्टि 

धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा: न मोदी की हार, न विपक्ष की जीत

आंदोलन की आड़ में राजनीतिक अवसरवाद,धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष जिस प्रकार संसद से सड़क तक संघर्ष का वातावरण बनाने में जुटा है, उससे एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—क्या लोकतंत्र में हर विवाद का समाधान केवल इस्तीफा है, या फिर जांच, जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया भी कोई महत्व रखती हैयदि किसी मामले में गंभीर आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए। किंतु जांच पूरी होने से पहले केवल राजनीतिक दबाव बनाकर इस्तीफा मांगना न्यायिक प्रक्रिया के बजाय राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। विपक्ष को भी आत्ममंथन करना चाहिए। क्या उसके शासनकाल में हर विवाद, हर घोटाले और हर प्रशासनिक विफलता पर संबंधित मंत्री ने तत्काल पद छोड़ा था? यदि नहीं, तो आज नैतिकता की दुहाई केवल सत्ता को घेरने का माध्यम क्यों बन गई है? लोकतंत्र में नैतिकता चयनात्मक नहीं हो सकती।संसद बहस का मंदिर है। वहां तथ्यों, तर्कों और नीतियों पर संवाद होना चाहिए, न कि केवल शोर, प्रदर्शन और राजनीतिक प्रतीकवाद पर। यदि विपक्ष के पास ठोस प्रमाण हैं तो उन्हें देश के सामने रखे; यदि वैकल्पिक शिक्षा नीति है तो उसे प्रस्तुत करे। केवल इस्तीफे की मांग से शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। यह भी स्मरण रखना होगा कि किसी मंत्री का इस्तीफा अपने-आप में न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पराजय है और न ही विपक्ष की विजय। लोकतंत्र में सरकारें नारों से नहीं, जनता के विश्वास, संवैधानिक संस्थाओं और चुनावों से चलती हैं। देश आज शिक्षा सुधार, पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा चाहता है। इसलिए आवश्यक है कि राजनीति से ऊपर उठकर व्यवस्था को मजबूत किया जाए। विपक्ष यदि वास्तव में छात्रों और देश के हित की चिंता करता है, तो उसे समाधान आधारित राजनीति का मार्ग अपनाना चाहिए, केवल आंदोलन आधारित राजनीति का नहीं।

जनता अब यह तय करेगी कि कौन राष्ट्रहित में उत्तरदायित्व निभा रहा है और कौन हर मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाकर अपनी प्रासंगिकता तलाश रहा है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा निर्णायक न सत्ता होती है, न विपक्ष—सबसे बड़ा निर्णायक भारत की जागरूक जनता होती है।

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