मौन का अपराध::वशिष्ठ सहित किसी ने राम के निर्णय का विरोध क्यों नहीं किया?
. इतिहास साक्षी है कि अन्याय कभी अकेला नहीं चलता। वह सदा मौन के कंधे पर सवार होकर आता है उस मौन के, जो जानते हुए भी नहीं बोलता, समझते हुए भी सहमति नहीं तोड़ता। कहा गया है कि जब अपराध होता है तो अपराधी से अधिक दोषी वह मौन समाज होता है, जो देखकर भी चुप रह जाता है। यह प्रश्न केवल नैतिक दर्शन का प्रश्न नहीं, भारतीय सभ्यता के सबसे गौरवशाली अध्याय रामकथा के भीतर से उठने वाला प्रश्न है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जब सीता के परित्याग का निर्णय लिया, तो अयोध्या की उस सभा में , जहाँ राजगुरु वशिष्ठ थे, भ्राता लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे, मंत्रिमंडल था , कोई क्यों नहीं बोला? यह मौन आदर का था, विवशता का था, अथवा स्वयं धर्म-व्यवस्था की सीमाओं का परिणाम था? इस में हम इसी अनुत्तरित प्रश्न को उठाते हैं।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह विवेचन राम की भक्ति अथवा मर्यादा-पुरुषोत्तम स्वरूप को चुनौती देने के लिए नहीं, अपितु उस सम्पूर्ण व्यवस्था को समझने के लिए किया जा रहा है, जिसके भीतर वह निर्णय लिया गया। भारतीय चिंतन-परंपरा की यही विशेषता रही है कि उसने अपने सबसे पूज्य चरित्रों को भी प्रश्नों से परे नहीं रखा , उपनिषदों से लेकर महाभारत तक, स्वयं वेदव्यास ने युधिष्ठिर जैसे धर्मराज के निर्णयों पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। यही परंपरा है, जो हमें आज भी राम के चरित्र को श्रद्धा सहित, परंतु विवेक के साथ देखने की अनुमति देती है , और यही इस सम्पादकीय की मूल भावना है।
प्रसंग — सीता-परित्याग की घटना;;वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार, राज्याभिषेक के पश्चात् अयोध्या में जब एक प्रजाजन द्वारा सीता के शुचित्व पर लोकापवाद (जनश्रुति में संदेह) की बात राम तक पहुँची, तो राजधर्म के मानदंड पर स्वयं को कसते हुए राम ने अत्यंत कठोर निर्णय लिया — गर्भवती सीता का वन में परित्याग। यह घटना रामकथा की सबसे विवादास्पद और सर्वाधिक विचारोत्तेजक घटनाओं में से एक रही है, जिस पर सदियों से भारतीय चिंतकों, कवियों और समाज-सुधारकों ने प्रश्न उठाए हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि इससे पूर्व लंका-विजय के अवसर पर भी राम ने सीता की अग्निपरीक्षा द्वारा उनके शुचित्व की सार्वजनिक परीक्षा ली थी, और स्वयं अग्निदेव तथा देवताओं ने सीता के पातिव्रत्य की पुष्टि की थी। इसके पश्चात् पुनः अयोध्या में उसी प्रश्न का उठना, और राम द्वारा पुनः उसी कसौटी पर सीता को कसा जाना, यह दर्शाता है कि लोकापवाद की माँग व्यक्तिगत प्रमाण से संतुष्ट नहीं होती , उसे बारम्बार, प्रत्येक पीढ़ी और प्रत्येक संदर्भ में, नए सिरे से सिद्ध करना पड़ता है। यही वह चक्र है, जिसकी ओर यह तथ्य तथ्य और कथ्य ध्यान आकर्षित करना चाहता है।प्रश्न यह नहीं कि राम ने क्या किया — प्रश्न यह है कि उस निर्णय के समय अयोध्या की सभा मौन क्यों रही।
वशिष्ठ का मौन — गुरु होकर भी प्रतिवाद क्यों नहीं?::महर्षि वशिष्ठ इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु थे — वही वशिष्ठ, जिन्होंने वन गमन के समय राम को नीतिशास्त्र का उपदेश दिया था, जिनकी वाणी राजा दशरथ तक के लिए अंतिम प्रमाण मानी जाती थी। फिर भी उत्तरकाण्ड के आख्यान में सीता-परित्याग के निर्णय पर वशिष्ठ का कोई स्पष्ट प्रतिवाद अभिलिखित नहीं मिलता। इसका एक कारण यह हो सकता है कि राजधर्म की तत्कालीन मान्यता में राजा को प्रजा के अपवाद के समक्ष स्वयं ही मानदंड स्थापित करना होता था, और गुरु की भूमिका मार्गदर्शन तक सीमित थी, आदेश देने तक नहीं। परंतु इससे यह प्रश्न शांत नहीं होता — क्या मौन रहना ही एकमात्र विकल्प था? क्या गुरु-तुल्य व्यक्ति के लिए धर्मसंकट में तटस्थता ही सर्वोच्च कर्तव्य थी, या यह भी एक प्रकार की स्वीकृति थी?
तुलना के लिए स्मरण करें कि वही वशिष्ठ अयोध्या काण्ड में राम-भरत संवाद के अवसर पर मुनि जाबालि के नास्तिक तर्कों का प्रतिवाद करने के लिए तत्काल आगे आए थे, और राम को सनातन धर्म-मर्यादा की पुनः स्थापना में सहायक बने थे। अर्थात् वशिष्ठ मौन-प्रकृति के ऋषि नहीं थे — आवश्यकता पड़ने पर वे अत्यंत मुखर भी हो सकते थे। तब उत्तरकाण्ड के इस प्रसंग में उनका मौन और भी अधिक विचारणीय बन जाता है। संभवतः इसका कारण यह भी रहा हो कि जिस मर्यादा-सिद्धांत की स्थापना में वशिष्ठ ने स्वयं राम का साथ दिया था, अब उसी सिद्धांत की चरम परिणति के विरुद्ध बोलना उन्हें अपने ही उपदेशों के विपरीत जाना प्रतीत हुआ हो। यह उस विडंबना को उजागर करता है, जो हर कठोर आदर्श के साथ जुड़ी रहती है — आदर्श गढ़ने वाला ही कभी-कभी उसकी अति के समक्ष असहाय हो जाता है।
लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न — भ्रातृ-मौन का प्रश्न:: परंपरागत आख्यानों में सीता को वन में छोड़ने का दायित्व स्वयं लक्ष्मण को सौंपा गया — वही लक्ष्मण, जिन्होंने चौदह वर्ष के वनवास में भाई और भाभी की छाया बनकर सेवा की थी। कहा जाता है कि लक्ष्मण ने आदेश का पालन किया, परंतु मार्ग में वाणी खो बैठे, अश्रुपूरित नेत्रों से लौटे। यह मौन आज्ञापालन का मौन था, सहमति का नहीं। भरत और शत्रुघ्न का आख्यानों में इस प्रसंग पर सीधा संवाद कम ही मिलता है, जो स्वयं इस बात का संकेत है कि परिवार-तंत्र में भी राजा के निर्णय के विरुद्ध खुला प्रतिवाद अत्यंत दुर्लभ था — चाहे हृदय कुछ भी कहे। लक्ष्मण का यह मौन विशेष रूप से मार्मिक है, क्योंकि यही लक्ष्मण अयोध्या काण्ड में कैकेयी के अन्यायपूर्ण वरदान के विरुद्ध क्रोध से प्रज्ज्वलित हो उठे थे, यहाँ तक कि शस्त्र उठाने तक को तत्पर हो गए थे। तब उनका क्रोध पिता के अन्याय के विरुद्ध मुखर हुआ था, परंतु यहाँ भ्राता के आदेश के समक्ष वही लक्ष्मण मौन आज्ञाकारी बन गए। यह अंतर हमें बताता है कि भारतीय पारिवारिक-राजतंत्र में विरोध की सीमा अंततः व्यक्ति के सम्बन्ध पर निर्भर करती थी, न कि निर्णय के औचित्य पर — पिता के विरुद्ध बोलना संभव था, बड़े भाई और स्वयं राजा के विरुद्ध बोलना असंभव प्राय। यही संरचनात्मक विवशता है, जिसे यह रेखांकित करना चाहता है।
भवभूति का उत्तररामचरित — राजा बनाम व्यक्ति का द्वंद्व:: संस्कृत साहित्य के महाकवि भवभूति ने अपने नाटक उत्तररामचरितम् में इसी द्वंद्व को अत्यंत मार्मिकता से चित्रित किया है राजा राम और पति-पिता राम के बीच का द्वंद्व। भवभूति के राम स्वयं स्वीकार करते हैं कि प्रजा की आराधना (संतुष्टि) के लिए वे स्नेह, दया, सुख — यहाँ तक कि जानकी तक का त्याग करने में असमर्थ नहीं हैं:
स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि ।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥
अर्थ — प्रजा की संतुष्टि के लिए स्नेह, दया, सुख — अथवा स्वयं जानकी (सीता) का भी त्याग करने में मुझे कोई पीड़ा नहीं (अर्थात् कर्तव्य के समक्ष यह त्याग अवश्यंभावी है)।
भवभूति, उत्तररामचरितम्, प्रथम अंक ,यह श्लोक अपने आप में इस लेख के केंद्रीय प्रश्न का उत्तर और प्रतिप्रश्न दोनों है। भवभूति के राम यहाँ यह घोषणा नहीं करते कि उन्हें पीड़ा नहीं होती वे यह कहते हैं कि पीड़ा को व्यथा नहीं बनने देते, क्योंकि राजधर्म की तुला पर व्यक्तिगत वेदना को तौलने का उन्हें अधिकार नहीं। यही वह मोड़ है जहाँ यह प्रश्न उठता है क्या यह स्थितप्रज्ञता है, अथवा सत्ता के प्रति एक प्रकार का अदृश्य समर्पण?
क्या सत्ता राम को स्नेह से अधिक प्रिय थी?::यह प्रश्न सतही दृष्टि से राम के चरित्र पर आक्षेप जैसा प्रतीत हो सकता है, परंतु गंभीरता से देखने पर यह राजधर्म की उस अवधारणा को उजागर करता है, जिसमें राजा व्यक्ति नहीं, संस्था होता है। भारतीय राजदर्शन में राजा का निजी सुख, निजी स्नेह सभी प्रजा-कल्याण के अधीन माने गए। रघुवंश की मर्यादा में राम स्वयं को इस परंपरा का वाहक मानते थे। परंतु यहीं एक और प्रश्न उठता है — क्या यह त्याग सचमुच प्रजाहित के लिए आवश्यक था, अथवा एक अकेले धोबी के आक्षेप को पूरी प्रजा की इच्छा मान लिया गया? यदि सत्ता को प्रिय मानकर राम ने यह निर्णय लिया, तो यह प्रश्न आज भी सत्ताधीशों से पूछा जाना चाहिए — क्या जनमत का एक स्वर ही समूचे न्याय-तंत्र को झुका देने के लिए पर्याप्त है?
यहाँ 'सत्ता' शब्द को भी सावधानी से समझना आवश्यक है। सत्ता का अर्थ यहाँ व्यक्तिगत सुखभोग या शक्ति-लिप्सा नहीं, अपितु उस सिंहासन की मर्यादा है, जिसे राम ने रघुकुल की परम्परा और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार किया था। इस अर्थ में यदि कहें कि राम को सत्ता प्रिय थी, तो यह उस सत्ता के प्रति निष्ठा थी, जो व्यक्तिगत सुख से बड़ी मानी गई न कि सत्ता का व्यक्तिगत उपभोग। फिर भी यह भेद पाठक को अंतिम उत्तर से मुक्त नहीं करता, अपितु प्रश्न को और तीक्ष्ण बनाता है क्या संस्थागत मर्यादा की रक्षा के नाम पर व्यक्तिगत न्याय का बलिदान सदैव उचित ठहराया जा सकता है? यही वह प्रश्न है, जिस पर भारतीय चिंतन ने सदियों से बहस की है, और जिसका कोई एक सरल उत्तर आज भी उपलब्ध नहीं।
दूसरा पक्ष::
राम के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम होने का अर्थ ही यह था कि वे अपने राज्य में स्थापित होने वाले हर मानदंड को स्वयं अपने ऊपर सबसे पहले और सबसे कठोरता से लागू करें। यदि राजा स्वयं प्रजा के अपवाद की उपेक्षा करता, तो भविष्य में कोई भी शासक न्याय-मर्यादा को व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार मोड़ सकता था। इस दृष्टि से यह निर्णय सत्ता-लोलुपता नहीं, बल्कि एक अत्यंत कठोर आदर्श-स्थापन था, जिसकी कीमत राम ने स्वयं आजीवन-वियोग सहकर चुकाई।
तुलसीदास का मौन — रामचरितमानस की मर्यादा::गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सीता-परित्याग के प्रसंग को अत्यंत संक्षिप्त और मर्यादित रूप में ही स्पर्श किया है —
आधुनिक प्रासंगिकता — मौन आज भी अपराध क्यों
यह प्रश्न केवल इतिहास या पुराकथा तक सीमित नहीं। आज भी जब सत्ता के गलियारों में कोई अन्यायपूर्ण निर्णय लिया जाता है, तो प्रायः वरिष्ठतम पदों पर बैठे व्यक्ति — जो अपनी स्थिति के बल पर प्रतिवाद कर सकते थे — मौन रह जाते हैं। यह मौन कभी 'प्रोटोकॉल' कहलाता है, कभी 'अनुशासन', कभी 'व्यवस्था के प्रति सम्मान'। परंतु परिणाम वही रहता है जो त्रेता युग में हुआ — निर्णय की समस्त नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी अकेले निर्णयकर्ता पर आ टिकती है, और जो मौन रहे, वे इतिहास में उत्तरदायित्व से मुक्त मान लिए जाते हैं।
यह स्मरण रखना उचित होगा कि मौन सदैव कायरता नहीं होता — कभी-कभी वह समय की प्रतीक्षा भी होता है, वाणी के लिए उपयुक्त क्षण की खोज भी। परंतु यह विवेक भी सामने वाले को स्पष्ट रहना चाहिए — कि मौन कब आवश्यक संयम है, और कब वह दायित्व से पलायन बन जाता है। रामकथा हमें यही विवेक करने का आमंत्रण देती है, निर्णय थोपती नहीं। प्रत्येक पाठक, प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक उत्तरदायी पद पर बैठा व्यक्ति स्वयं यह प्रश्न स्वयं से पूछे — जब अन्याय के समक्ष मेरी सभा मौन होगी, तो क्या मैं वशिष्ठ बनूँगा, अथवा अंगद?
आज के लोकतांत्रिक ढाँचे में यह प्रश्न और भी सजीव हो उठता है। जब किसी सभा, संसद अथवा संस्था में कोई निर्णय विवादास्पद हो, और उपस्थित जनप्रतिनिधि, अधिकारी अथवा वरिष्ठजन मौन साध लें, तो वह मौन 'शालीनता' नहीं, अपितु सामूहिक उत्तरदायित्व से पलायन है। प्रजातंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यहाँ वशिष्ठ को भी बोलने का अधिकार है, अंगद को भी। जो समाज अपने वशिष्ठों को मौन रहने देता है, वह अपने अंगदों के साहस को भी धीरे-धीरे कुंठित कर देता है। इसलिए यह सम्पादकीय केवल इतिहास की समीक्षा नहीं, अपितु वर्तमान समाज, संस्थाओं और मीडिया — जिसका दायित्व स्वयं यही है कि वह मौन को तोड़े — सबके लिए एक आत्ममंथन का आह्वान है। रामकथा हमें यह स्मरण कराती है कि मौन कभी निर्दोष नहीं होता — वह उतना ही उत्तरदायी है जितना कि निर्णय स्वयं।
जनकपुर से जगद्गुरु भारत तक — सीता का प्रश्न, राष्ट्र का प्रश्न
यह विवेचन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सीता केवल राम की अर्धांगिनी नहीं, स्वयं मिथिला की राजकुमारी, जनकपुर की पुत्री और आदि शक्ति का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करने वाली सशक्त नारी थीं। जनकपुर से जगद्गुरु भारत की उस बड़ी परिकल्पना में, जिसे यह पत्रिका वर्ष 2047 तक साकार होते देखना चाहती है, सीता का प्रश्न केवल पौराणिक कथा-विश्लेषण नहीं, अपितु यह मूल्यांकन है कि भारतीय समाज ने अपनी सशक्त नारी-परंपराओं के साथ, संकट के क्षणों में, कैसा व्यवहार किया। यदि हमें सचमुच उस सभ्यतागत गौरव की पुनर्स्थापना करनी है, तो हमें अपने ही इतिहास के उन क्षणों को भी उतनी ही ईमानदारी से देखना होगा, जब मौन ने न्याय पर परदा डाला। यही आत्मसमीक्षा किसी सभ्यता को कमजोर नहीं, अपितु परिपक्व बनाती है।
निष्कर्ष
राम का चरित्र भारतीय सभ्यता का वह दर्पण है, जिसमें हर युग अपने प्रश्नों के उत्तर खोजता आया है। सीता-परित्याग का प्रसंग हमें यह सिखाता नहीं कि राम अपूर्ण थे, अपितु यह सिखाता है कि मर्यादा की कीमत असीम पीड़ा में चुकाई जाती है — और वह पीड़ा अकेले राजा की नहीं होनी चाहिए थी। वशिष्ठ, लक्ष्मण, भरत — इन सबका मौन इतिहास के लिए एक चेतावनी बनकर रह गया है: कि जब निर्णय अन्यायपूर्ण प्रतीत हो, तब विवेकशील मौन भी उतना ही परीक्षित होना चाहिए जितना निर्णय स्वयं।
यह भी स्मरणीय है कि धर्मसंकट में मौन और स्थितप्रज्ञता के बीच की रेखा अत्यंत सूक्ष्म होती है। स्थितप्रज्ञता का अर्थ यह कदापि नहीं कि अन्याय के समक्ष वाणी बंद हो जाए गीता का स्थितप्रज्ञ राग-द्वेष से मुक्त अवश्य है, परंतु वह कर्तव्यहीन या मूकदर्शक नहीं। अर्जुन को स्वयं कृष्ण ने युद्ध से विरत नहीं, अपितु समभाव सहित युद्ध में प्रवृत्त होने का उपदेश दिया था। इसी कसौटी पर देखें तो अयोध्या की सभा में अपेक्षित स्थितप्रज्ञता यह नहीं थी कि सब मौन रहें, अपितु यह थी कि प्रत्येक अपना मत निर्भीकता से रखते हुए भी राजा के अंतिम निर्णय के प्रति मर्यादा बनाए रखें। यही अंतर मौन और स्थितप्रज्ञता के बीच है, और यही अंतर आज के संस्थानों, सभाओं और परिवारों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना त्रेता युग की उस सभा के लिए था।
स्थितप्रज्ञता आत्मबल का प्रतीक है, परंतु सामूहिक मौन, चाहे वह कितने ही आदर से उपजा हो, समाज की सामूहिक विवेक-शक्ति पर सदैव प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है। यही इस सम्पादकीय की मूल चेतावनी और मूल प्रश्न है — मौन कभी निर्दोष नहीं होता।
— रजेन्द्र नाथ तिवारी, सम्पादक, कौटिल्य का भारत दैनिक
विस्तृत नाटकीयता से बचते हुए। यह मौन भी अपने आप में विचारणीय है। तुलसी के राम भक्ति-काव्य के केंद्रीय आदर्श हैं, अतः कवि ने वहाँ इतिहास के सर्वाधिक असुविधाजनक प्रसंग को न तो नकारा, न विस्तार से उघाड़ा — अपितु संयत भाव से उसे स्वीकार करते हुए आगे बढ़ गए। यह साहित्यिक मौन उस बड़े प्रश्न को और पुष्ट करता है, जिससे यह सम्पादकीय आरम्भ हुआ — भारतीय परंपरा स्वयं इस प्रसंग पर असहज रही है, और उस असहजता को शब्दों में बाँधने के स्थान पर अक्सर मौन को ही चुना गया है। यही प्रवृत्ति है, जिसकी समीक्षा आज आवश्यक है — भक्ति और आलोचना दोनों में मौन का स्थान कहाँ तक उचित है, यह प्रश्न परंपरा के भीतर से ही पूछा जाना चाहिए, परंपरा को नकारे बिना।
यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तुलसीदास की संक्षिप्तता आलोचना का अभाव नहीं, अपितु भक्ति-काव्य की मर्यादा है — वाल्मीकि इतिहासकार की दृष्टि से लिखते हैं, तुलसी भक्त की दृष्टि से। दोनों परंपराओं को परस्पर मिलाना उचित नहीं, अपितु दोनों को उनके अपने संदर्भ में समझना ही इस विवेचन की सच्ची पद्धति है — जैसा कि सीतायण शृंखला में हमने सदैव इस सिद्धांत का पालन किया है।
एक स्वर बनाम सम्पूर्ण समाज
इस प्रसंग का एक और आयाम है, जिसकी चर्चा प्रायः कम होती है — क्या सचमुच सम्पूर्ण अयोध्या सीता के विरुद्ध थी, अथवा एक अकेले प्रजाजन का आक्षेप ही राजसभा तक पहुँचकर 'लोकापवाद' का रूप ले बैठा? यदि आख्यानों को ध्यान से देखें तो प्रजा में सीता के प्रति स्नेह और श्रद्धा का उल्लेख भी मिलता है। ऐसे में यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है — क्या एक स्वर को समूचे समाज की इच्छा मान लेना स्वयं एक भूल थी? क्या सभा में उपस्थित किसी ने यह नहीं पूछा कि आक्षेप की सत्यता जाँची जाए, स्रोत की विश्वसनीयता परखी जाए, अथवा सीता को स्वयं अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए? यहीं मौन का सबसे गहरा अपराध उजागर होता है — निर्णय की प्रक्रिया में ही यदि कोई प्रश्न नहीं उठाता, तो निर्णय चाहे कितना भी मर्यादित प्रतीत हो, वह न्यायपूर्ण प्रक्रिया का परिणाम नहीं रह जाता।
दूसरा पक्ष
इसके विपरीत यह तर्क भी उतना ही सशक्त है कि राजा के लिए यह संभव नहीं था कि प्रत्येक अफवाह की जाँच के लिए न्यायिक प्रक्रिया अपनाए — रामराज्य की मूल कसौटी ही यह थी कि प्रजा की धारणा राजा के आचरण की कसौटी बने, चाहे वह धारणा कितनी भी अल्पमत की उपज क्यों न हो। यह राजधर्म की वह अतिशय कठोरता थी, जिसमें राजा स्वयं को साधारण नागरिक से भी अधिक जवाबदेह मानता था — भले ही इसकी कीमत स्वयं उसके परिवार को चुकानी पड़े।
राम स्थितप्रज्ञ थे — गीता का मापदंड
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ पुरुष का जो लक्षण अर्जुन को बताया, वह राम के चरित्र पर अद्भुत रूप से घटित होता प्रतीत होता है — वह पुरुष जो सुख-दुःख में समभाव रखे, जिसकी बुद्धि हर परिस्थिति में स्थिर रहे:
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
अर्थ — जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा नष्ट हो गई है, जो राग, भय और क्रोध से रहित है, वही स्थितप्रज्ञ मुनि कहलाता है।
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५६
इसी अध्याय का एक और श्लोक इस विवेचन के लिए और भी सटीक बैठता है — वह पुरुष जिसकी आसक्ति कहीं नहीं, जो शुभ-अशुभ दोनों को समान भाव से स्वीकार करे:
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप् य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
अर्थ — जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ या अशुभ को प्राप्त कर न तो हर्षित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित (स्थिर) मानी जाती है।
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५७
यदि इस कसौटी पर राम को परखा जाए, तो प्रजाहित के लिए सीता-परित्याग जैसा असह्य निर्णय लेकर भी सार्वजनिक रूप से विचलित न होना, राजसिंहासन पर बैठकर भी शोक को शासन-कर्तव्य पर हावी न होने देना — यह स्थितप्रज्ञता का ही एक रूप प्रतीत होता है। परंतु भवभूति स्वयं इस चित्रण को एकरेखीय नहीं रहने देते — उनका राम एकांत में विलाप करता है, सीता के चित्र के समक्ष मूर्च्छित होता है। अर्थात् स्थितप्रज्ञता यहाँ भावशून्यता नहीं, अपितु सार्वजनिक कर्तव्य और निजी वेदना के बीच खींची गई वह रेखा है, जिसे राम ने कभी पार नहीं होने दिया।
स्थितप्रज्ञता या कर्तव्य का बंधन?
यहीं यह लेख अपने सबसे कठिन प्रश्न पर पहुँचता है। स्थितप्रज्ञता गीता में आत्मज्ञान से उपजी वह अवस्था है, जो कामना और आसक्ति के त्याग से आती है — वह स्वतःस्फूर्त है, बाह्य दबाव से उत्पन्न नहीं। परंतु राम का सीता के प्रति स्नेह असंदिग्ध था, अनेक प्रसंगों में प्रमाणित। ऐसे में यह प्रश्न उचित है कि क्या राम की बाह्य स्थिरता स्थितप्रज्ञता की आंतरिक शांति थी, अथवा राजधर्म की उस विवशता का आवरण थी, जिसे तोड़ने का साहस स्वयं वशिष्ठ, लक्ष्मण, भरत — किसी में नहीं था? यदि सम्पूर्ण सभा मौन रही, तो संभव है कि वह मौन राम के निर्णय के प्रति सहमति नहीं, अपितु राजतंत्र की उस संरचना के प्रति विवशता थी, जिसमें एक बार राजा ने मर्यादा को कर्तव्य घोषित कर दिया, तो उसके विरुद्ध बोलना स्वयं मर्यादा-भंग माना जाता।
यह भेद समझना आवश्यक है कि गीता में स्थितप्रज्ञता का उदय आत्मज्ञान और निष्काम कर्मयोग से होता है — अर्जुन को कृष्ण कर्म से विरत होने को नहीं, अपितु फल की आसक्ति त्यागकर कर्म करने को कहते हैं। यदि इस मापदंड को राम पर लागू करें, तो राम का 'कर्म' उस निर्णय को लेना और उसका पालन करना भर नहीं था — उनका वास्तविक कर्तव्य यह भी था कि सभा में विमर्श को खुला रखें, प्रश्नों को आमंत्रित करें, और तब निर्णय लें। स्थितप्रज्ञता किसी निर्णय की गुणवत्ता की गारंटी नहीं देती, वह केवल यह सुनिश्चित करती है कि निर्णयकर्ता व्यक्तिगत राग-द्वेष से प्रभावित न हो। अतः राम की मनःस्थिरता को स्वीकार करते हुए भी हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि क्या वह स्थिरता निर्णय-प्रक्रिया में भी उतनी ही समावेशी थी, जितनी वह व्यक्तिगत संयम में थी।
मौन कभी तटस्थता नहीं होता — वह या तो स्वीकृति है, या भय, या फिर उस व्यवस्था की सीमा, जिसे तोड़ने का साहस किसी में नहीं बचा।
अंगद का उदाहरण — जब मौन तोड़ा गया
रामकथा में ही एक ऐसा चरित्र है, जिसने भय और मर्यादा दोनों की सीमाओं को लांघकर वाणी उठाई — अंगद। रावण की भरी सभा में, जहाँ प्रतिवाद का अर्थ प्राणदंड हो सकता था, अंगद ने निर्भीकता से रावण के अन्याय को ललकारा और स्वयं शत्रु-शिविर में जाकर सत्य कहने का साहस दिखाया। यह प्रसंग इस लेख के प्रश्न को और तीव्र करता है — यदि शत्रु की सभा में एक युवा राजकुमार निर्भय होकर बोल सकता था, तो अपने ही राज्य की सभा में, अपने ही आराध्य राजा के समक्ष, कोई वरिष्ठतम मंत्री, गुरु या भ्राता क्यों नहीं बोला? अंगद का साहस यह सिद्ध करता है कि रामकथा में मौन कोई अनिवार्य नियति नहीं थी — यह एक विकल्प था, जिसे अयोध्या की सभा ने नहीं चुना। यही अंतर हमें बताता है कि मौन को 'परंपरा' या 'मर्यादा' कहकर सदैव उचित नहीं ठहराया जा सकता — साहस भी उतना ही सनातन मूल्य है, जितना संयम।
आधुनिक प्रासंगिकता — मौन आज भी अपराध क्यों
यह प्रश्न केवल इतिहास या पुराकथा तक सीमित नहीं। आज भी जब सत्ता के गलियारों में कोई अन्यायपूर्ण निर्णय लिया जाता है, तो प्रायः वरिष्ठतम पदों पर बैठे व्यक्ति — जो अपनी स्थिति के बल पर प्रतिवाद कर सकते थे — मौन रह जाते हैं। यह मौन कभी 'प्रोटोकॉल' कहलाता है, कभी 'अनुशासन', कभी 'व्यवस्था के प्रति सम्मान'। परंतु परिणाम वही रहता है जो त्रेता युग में हुआ — निर्णय की समस्त नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी अकेले निर्णयकर्ता पर आ टिकती है, और जो मौन रहे, वे इतिहास में उत्तरदायित्व से मुक्त मान लिए जाते हैं।
यह स्मरण रखना उचित होगा कि मौन सदैव कायरता नहीं होता — कभी-कभी वह समय की प्रतीक्षा भी होता है, वाणी के लिए उपयुक्त क्षण की खोज भी। परंतु यह विवेक भी सामने वाले को स्पष्ट रहना चाहिए — कि मौन कब आवश्यक संयम है, और कब वह दायित्व से पलायन बन जाता है। रामकथा हमें यही विवेक करने का आमंत्रण देती है, निर्णय थोपती नहीं। प्रत्येक पाठक, प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक उत्तरदायी पद पर बैठा व्यक्ति स्वयं यह प्रश्न स्वयं से पूछे — जब अन्याय के समक्ष मेरी सभा मौन होगी, तो क्या मैं वशिष्ठ बनूँगा, अथवा अंगद?
आज के लोकतांत्रिक ढाँचे में यह प्रश्न और भी सजीव हो उठता है। जब किसी सभा, संसद अथवा संस्था में कोई निर्णय विवादास्पद हो, और उपस्थित जनप्रतिनिधि, अधिकारी अथवा वरिष्ठजन मौन साध लें, तो वह मौन 'शालीनता' नहीं, अपितु सामूहिक उत्तरदायित्व से पलायन है। प्रजातंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यहाँ वशिष्ठ को भी बोलने का अधिकार है, अंगद को भी। जो समाज अपने वशिष्ठों को मौन रहने देता है, वह अपने अंगदों के साहस को भी धीरे-धीरे कुंठित कर देता है। इसलिए यह सम्पादकीय केवल इतिहास की समीक्षा नहीं, अपितु वर्तमान समाज, संस्थाओं और मीडिया — जिसका दायित्व स्वयं यही है कि वह मौन को तोड़े — सबके लिए एक आत्ममंथन का आह्वान है। रामकथा हमें यह स्मरण कराती है कि मौन कभी निर्दोष नहीं होता — वह उतना ही उत्तरदायी है जितना कि निर्णय स्वयं।
जनकपुर से जगद्गुरु भारत तक — सीता का प्रश्न, राष्ट्र का प्रश्न
यह विवेचन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सीता केवल राम की अर्धांगिनी नहीं, स्वयं मिथिला की राजकुमारी, जनकपुर की पुत्री और आदि शक्ति का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करने वाली सशक्त नारी थीं। जनकपुर से जगद्गुरु भारत की उस बड़ी परिकल्पना में, जिसे यह पत्रिका वर्ष 2047 तक साकार होते देखना चाहती है, सीता का प्रश्न केवल पौराणिक कथा-विश्लेषण नहीं, अपितु यह मूल्यांकन है कि भारतीय समाज ने अपनी सशक्त नारी-परंपराओं के साथ, संकट के क्षणों में, कैसा व्यवहार किया। यदि हमें सचमुच उस सभ्यतागत गौरव की पुनर्स्थापना करनी है, तो हमें अपने ही इतिहास के उन क्षणों को भी उतनी ही ईमानदारी से देखना होगा, जब मौन ने न्याय पर परदा डाला। यही आत्मसमीक्षा किसी सभ्यता को कमजोर नहीं, अपितु परिपक्व बनाती है।
निष्कर्ष
राम का चरित्र भारतीय सभ्यता का वह दर्पण है, जिसमें हर युग अपने प्रश्नों के उत्तर खोजता आया है। सीता-परित्याग का प्रसंग हमें यह सिखाता नहीं कि राम अपूर्ण थे, अपितु यह सिखाता है कि मर्यादा की कीमत असीम पीड़ा में चुकाई जाती है — और वह पीड़ा अकेले राजा की नहीं होनी चाहिए थी। वशिष्ठ, लक्ष्मण, भरत — इन सबका मौन इतिहास के लिए एक चेतावनी बनकर रह गया है: कि जब निर्णय अन्यायपूर्ण प्रतीत हो, तब विवेकशील मौन भी उतना ही परीक्षित होना चाहिए जितना निर्णय स्वयं।
यह भी स्मरणीय है कि धर्मसंकट में मौन और स्थितप्रज्ञता के बीच की रेखा अत्यंत सूक्ष्म होती है। स्थितप्रज्ञता का अर्थ यह कदापि नहीं कि अन्याय के समक्ष वाणी बंद हो जाए — गीता का स्थितप्रज्ञ राग-द्वेष से मुक्त अवश्य है, परंतु वह कर्तव्यहीन या मूकदर्शक नहीं। अर्जुन को स्वयं कृष्ण ने युद्ध से विरत नहीं, अपितु समभाव सहित युद्ध में प्रवृत्त होने का उपदेश दिया था। इसी कसौटी पर देखें तो अयोध्या की सभा में अपेक्षित स्थितप्रज्ञता यह नहीं थी कि सब मौन रहें, अपितु यह थी कि प्रत्येक अपना मत निर्भीकता से रखते हुए भी राजा के अंतिम निर्णय के प्रति मर्यादा बनाए रखें। यही अंतर मौन और स्थितप्रज्ञता के बीच है, और यही अंतर आज के संस्थानों, सभाओं और परिवारों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना त्रेता युग की उस सभा के लिए था।
स्थितप्रज्ञता आत्मबल का प्रतीक है, परंतु सामूहिक मौन, चाहे वह कितने ही आदर से उपजा हो, समाज की सामूहिक विवेक-शक्ति पर सदैव प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है। यही इस सम्पादकीय की मूल चेतावनी और मूल प्रश्न है — मौन कभी निर्दोष नहीं होता।
— रजेन्द्र नाथ तिवारी, सम्पादक, कौटिल्य
