कौटिल्य दृष्टि
"शिक्षा के मंदिर में दलाली का अड्डा: खुलासा. बाबू या भ्रष्टाचार का केवल एक चेहरा?"शिक्षा केवल नौकरी का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला है। यदि उसी प्रयोगशाला में नियुक्तियों का सौदा होने लगे, यदि बेरोजगार युवाओं के सपनों की कीमत लाखों रुपये तय होने लगे और यदि सरकारी कार्यालय दलालों के अड्डों में बदल जाएँ, तो यह किसी एक बाबू की बेईमानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की नैतिक मृत्यु का संकेत है।
बस्ती में संयुक्त शिक्षा निदेशक कार्यालय के एक लिपिक पर नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये हड़पने का आरोप सामने आया है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इतना बड़ा खेल केवल एक लिपिक अकेले कर सकता है? यदि नहीं, तो फिर इस पूरे तंत्र में और कौन-कौन शामिल था? क्या किसी अधिकारी को भनक नहीं लगी? क्या वर्षों तक चलने वाली ऐसी गतिविधियाँ बिना संरक्षण के संभव हैं? आज सबसे बड़ा संकट यह है कि भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप धारण कर लिया है। अब रिश्वत छिपकर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ माँगी जाती है। नौकरी, स्थानांतरण, पदोन्नति, ठेका, भुगतान—हर जगह दलालों का एक समानांतर तंत्र खड़ा हो गया है। यह तंत्र कानून से नहीं, बल्कि संरक्षण से चलता है।
विडंबना यह है कि जो पकड़ा गया, वही चोर कहलाया; जो अब तक नहीं पकड़े गए, वे ईमानदारी का मुखौटा पहनकर व्यवस्था के सम्मानित चेहरे बने हुए हैं। यह स्थिति केवल शिक्षा विभाग की नहीं, बल्कि अनेक सरकारी कार्यालयों की कड़वी सच्चाई बनती जा रही है।सबसे अधिक पीड़ा उस बेरोजगार युवा की है, जो अपनी मेहनत और योग्यता पर विश्वास करता है, लेकिन उसे बताया जाता है कि बिना पैसे नौकरी नहीं मिलेगी। वह परिवार की जमीन बेचता है, कर्ज लेता है, गहने गिरवी रखता है और अंत में न नौकरी मिलती है, न पैसा लौटता है। ऐसे अपराध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक हत्या हैं।
यदि आरोप सत्य हैं, तो दोषी को कठोरतम दंड मिलना चाहिए। लेकिन केवल एक कर्मचारी की गिरफ्तारी से न्याय पूरा नहीं होगा। यह पता लगाना होगा कि इस खेल के पीछे कौन-कौन लोग थे, किसके संरक्षण में यह नेटवर्क चल रहा था, किन अधिकारियों की चुप्पी ने इसे बढ़ावा दिया और कितने युवाओं का भविष्य इस भ्रष्ट तंत्र ने लूटा।
शिक्षा विभाग पर लगा यह दाग केवल विभाग का नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है। सरकार यदि भ्रष्टाचार के प्रति वास्तव में शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) का दावा करती है, तो इस मामले की निष्पक्ष, समयबद्ध और उच्चस्तरीय जांच कराकर पूरे गिरोह को बेनकाब करना होगा। देश का भविष्य कक्षाओं में बनता है, दलालों के दफ्तरों में नहीं। यदि शिक्षा के मंदिरों में बैठे कुछ लोग बेरोजगारों के सपनों की नीलामी करेंगे, तो यह केवल कानून का नहीं, राष्ट्र की आत्मा का अपराध होगा। अब समय आ गया है कि भ्रष्टाचारियों के चेहरे से ईमानदारी का मुखौटा उतारा जाए और व्यवस्था को यह संदेश दिया जाए,पद चाहे कितना भी बड़ा हो, भ्रष्टाचार का अंत जेल के दरवाजे पर ही होगा।
भ्रष्टाचार के लिए पूरा तन्त्र जिम्मेदार है क्योंकि शिकायत किससे की जाए जब वह भी इसी तन्त्र का हिस्सा है
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