सीतायण,अध्याय ग्यारह
हनुमान का प्रत्यागमन एवं मधुवन-लीला
महाकवियों के आलोक में — वाल्मीकि एवं तुलसीदास की दृष्टि से विजय-यात्रा का उल्लासपूर्ण उपसंहार
भूमिका : कार्य-सिद्धि से प्रत्यागमन तक
लंका-दहन के पश्चात हनुमान पुनः शिंशपा वृक्ष के निकट सीता के समक्ष उपस्थित होते हैं। यह भेंट प्रथम भेंट से भिन्न है , अब हनुमान केवल दूत नहीं, अपितु विजयी योद्धा हैं, जिन्होंने शत्रु की राजधानी को अपनी शक्ति का प्रमाण दे दिया है। सीता हनुमान को आशीर्वाद देती हैं और पहचान-चिह्न स्वरूप अपनी चूड़ामणि (शिरोमणि) उतारकर देती हैं, जिससे राम को यह पूर्ण विश्वास हो सके कि संदेश-वाहक ने वास्तव में सीता से साक्षात्कार किया है। यह चूड़ामणि इस अध्याय की केंद्रीय कड़ी है , मिथिला से आया यह आभूषण अब जनकसुता की व्यथा और प्रतीक्षा दोनों का मूक साक्षी बनकर अयोध्या के राजकुमार तक पहुँचेगा। विदा के क्षण में सीता एक अत्यंत मार्मिक संदेश भी देती हैं , कि वे केवल एक मास तक ही जीवित रह सकेंगी, उसके पश्चात नहीं। यह समय-सीमा आगे की सम्पूर्ण सैन्य-योजना को तात्कालिकता और तीव्रता प्रदान करती है। हनुमान इस भार को हृदय में धारण कर महेन्द्र पर्वत की ओर, समुद्र-लंघन हेतु प्रस्थान करते हैं।प्रथम पर्व : पुनः समुद्र-लंघन::वाल्मीकि रामायण में हनुमान की वापसी यात्रा को जाते समय की यात्रा जितना ही भव्य रूप से चित्रित किया गया है। हर्ष और कार्य-सिद्धि के उल्लास से भरे हनुमान महेन्द्र पर्वत पर वानर-सेना , जामवंत, अंगद और अन्य प्रमुख वानरों के मध्य अवतरित होते हैं। तुलसीदास इस दृश्य को हनुमान के मुख की प्रसन्नता और शरीर के तेज के माध्यम से अत्यंत सजीव बनाते हैं।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड (हनुमान द्वारा राम को कार्य-विवरण)
एक ही चौपाई में तुलसी सम्पूर्ण अभियान का सार प्रस्तुत कर देते हैं समुद्र लाँघना, स्वर्ण-नगरी को जलाना, और राक्षस-कुल के विनाश हेतु प्रमदावन का उजाड़ा जाना। यह संक्षिप्तीकरण भक्ति-काव्य की वह विशेषता है जिसमें विस्तृत घटनाक्रम को भी भाव की सघनता में समेट दिया जाता है पूर्ण विवरण के स्थान पर सार-तत्त्व का उद्घोष।
वानर-दल हनुमान को घेरकर हर्षित होता है और उनके मुख की प्रसन्नता से ही यह अनुमान लगा लेता है कि कार्य सिद्ध हो चुका है , मानो जल पाकर तड़पती मछली को नवजीवन मिल गया हो। यह उपमा वाल्मीकि और तुलसी दोनों परंपराओं में समान भाव से प्रयुक्त है, जो प्रतीक्षारत वानर-सेना की व्याकुलता और तत्पश्चात उल्लास दोनों को एक साथ व्यंजित करती है।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
द्वितीय पर्व : मधुवन-लीला::अयोध्या अथवा किष्किंधा की ओर लौटते हुए मार्ग में सुग्रीव का निजी उद्यान मधुवन पड़ता है, जो विशेष रूप से संरक्षित एवं वर्जित है — साधारण वानरों को इसमें प्रवेश और फल-भक्षण की अनुमति नहीं। किंतु विजय के उल्लास में डूबे वानर-दल पर यह मर्यादा प्रभावी नहीं रहती। युवराज अंगद की सम्मति से समस्त वानर मधुवन में प्रवेश कर मधु और फलों का भरपूर भोग करते हैं।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
वन के रक्षक जब उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, तो उल्लास में डूबे वानर उन्हें घूँसों से मार भगाते हैं। यह प्रसंग रामायण के अत्यंत मानवीय क्षणों में से एक है जहाँ विजय के हर्ष में अनुशासन क्षणिक रूप से शिथिल होता प्रतीत होता है, किंतु यह शिथिलता विद्रोह नहीं, अपितु स्वामी-कार्य की सफलता पर सहज उमड़ा उल्लास है।
दूसरा पक्ष ,:: मर्यादा-उल्लंघन अथवा सहज उल्लास? यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या वानरों द्वारा वर्जित उद्यान में प्रवेश और रक्षकों को पीटना अनुशासनहीनता नहीं है? परंपरागत व्याख्या इसे नकारती नहीं, अपितु इसे स्वामिभक्ति के आवेग में हुई तात्कालिक चूक मानती है , जिसे स्वयं सुग्रीव भी दण्ड के स्थान पर हर्ष के साथ स्वीकार करते हैं। यहाँ रामायण यह संदेश देती है कि सच्चे स्वामी की परख यही है कि वह सेवक के आवेग के मूल हेतु को समझकर उसे क्षमा-भाव से देखे, केवल नियम की कठोरता से नहीं।
दधिमुख की सुग्रीव से शिकायत और सुग्रीव का अनुमान
मधुवन के प्रधान रक्षक दधिमुख — जो सुग्रीव के मामा माने जाते हैं — इस उपद्रव की शिकायत लेकर सीधे किष्किंधा जाते हैं। वाल्मीकि रामायण के सर्ग ६३ में यह वृत्तान्त विस्तार से वर्णित है, जहाँ दधिमुख अत्यंत क्षुब्ध होकर सुग्रीव को वन के उजड़ने का समाचार सुनाते हैं।
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
किंतु यहाँ काव्य का सबसे सूक्ष्म एवं मार्मिक मोड़ आता है , सुग्रीव, जो वानर-राज होने के नाते वन की मर्यादा-भंग पर क्रोधित हो सकते थे, इसके ठीक विपरीत हर्षित होते हैं। उनकी बुद्धि तत्क्षण यह निष्कर्ष निकाल लेती है कि जब तक सीता की सुधि प्राप्त न होती, अनुशासित वानर कदापि मधुवन के वर्जित फलों का भक्षण करने का साहस न करते। अतः यह उपद्रव स्वयं में कार्य-सिद्धि का प्रमाण है।
यदि सीता की सुधि न मिली होती, तो वानर वर्जित मधुवन के फल छूने का साहस भी न करते उल्लास का यह उपद्रव ही विजय का प्रथम संदेश बन गया। यह प्रसंग सुग्रीव के नेतृत्व-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है , घटना के सतही रूप के परे जाकर उसके मूल कारण की खोज करना, और परिणाम को साधन से पूर्व पहचान लेना। सुग्रीव आदरपूर्वक वानर-दल को किष्किंधा बुलाते हैं, दण्ड के स्थान पर स्वागत की तैयारी करते हैं।
तृतीय पर्व : मिलन, संदेश-निवेदन एवं चूड़ामणि-समर्पण::वानर-दल किष्किंधा पहुँचकर सुग्रीव को प्रणाम करता है, और सुग्रीव अत्यंत स्नेह से सबका कुशल-क्षेम पूछते हैं। हनुमान तब सीता की स्थिति, अशोक वाटिका, रावण-संवाद और लंका-दहन का सम्पूर्ण विवरण सुनाते हैं।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड
इसके पश्चात सम्पूर्ण दल राम के पास पहुँचता है, जहाँ हनुमान अत्यंत विनम्रता से यह स्पष्ट करते हैं कि यह सम्पूर्ण पराक्रम उनका अपना नहीं, अपितु राम के ही प्रताप का प्रतिफल है। अंततः हनुमान चूड़ामणि राम को समर्पित करते हैं। यह क्षण सम्पूर्ण सुंदरकाण्ड का भावनात्मक चरम-बिंदु है विरह-पीड़ित राम को जब सीता का शुभ-संदेश और यह पहचान-चिह्न प्राप्त होता है, तो उनका हर्ष अवर्णनीय हो जाता है। परंपरा में इसी हर्ष के कारण वाल्मीकि ने इस काण्ड को 'सुंदर' नाम दिया माना जाता है — सीता के कुशल-समाचार को सुनकर राम का मन सुंदर (प्रसन्न) हो उठा।
वैचारिक निष्कर्ष : उल्लास, अनुशासन और नेतृत्व
मधुवन-लीला केवल एक हास्य-प्रसंग नहीं, अपितु नेतृत्व और सामूहिक मनोविज्ञान का एक सूक्ष्म अध्ययन है। एक ओर वानर-सेना का उल्लास , जो विजय की तीव्रता में मर्यादा को क्षण भर के लिए भूल जाता है , मानवीय स्वभाव की सहज सच्चाई है। दूसरी ओर सुग्रीव का विवेकपूर्ण नेतृत्व — जो घटना के भीतर छिपे संकेत को पढ़कर क्रोध के स्थान पर विश्वास प्रकट करता है आदर्श स्वामी की कसौटी प्रस्तुत करता है।
चूड़ामणि का समर्पण इस सम्पूर्ण अभियान की परिणति है — एक छोटा-सा आभूषण, जो मिथिला की पुत्री की स्मृति और अयोध्या के राजकुमार की प्रतीक्षा को जोड़ता है। यह प्रसंग स्मरण कराता है कि किसी भी महान कार्य की सिद्धि में उल्लास, अनुशासन और विवेक तीनों का समुचित स्थान है। जनकपुर से जगद्गुरु भारत की यात्रा में भी यही त्रिविध संतुलन आवश्यक है कठोर परिश्रम का उल्लासपूर्ण उत्सव, किंतु मर्यादा की अंतर्निहित प्रतिष्ठा के साथ।
(अगला अध्याय : समुद्र-तट पर सेतु-निर्माण की योजना)
