नीट नहीं, सत्ता की परीक्षा में जुटा विपक्ष


छात्रों की पीड़ा पर राजनीति बंद करो! आंदोलन नहीं, सत्ता की भूख का प्रदर्शन

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने अनेक परिवर्तन किए हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर संपूर्ण क्रांति तक विद्यार्थियों ने राष्ट्रहित में संघर्ष किया। परंतु आज प्रश्न यह है कि क्या हर छात्र आंदोलन वास्तव में छात्रों का आंदोलन रह गया है, या फिर वह कुछ राजनीतिक दलों के लिए सत्ता प्राप्ति का शॉर्टकट बन चुका है?

नीट परीक्षा में यदि कहीं पेपर लीक हुआ है, यदि किसी छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ हुआ है, तो दोषियों को कठोरतम दंड मिलना चाहिए। इसमें कोई दो मत नहीं। परंतु इस न्याय की मांग के नाम पर राजधानी की सड़कों को राजनीतिक रंग देना, संसद से लेकर सड़क तक टकराव का वातावरण बनाना और छात्रों के कंधों पर सत्ता की राजनीति लादना—यह राष्ट्रहित नहीं, अवसरवाद है।

आज वही दल लोकतंत्र बचाने का ढोल पीट रहे हैं, जिनके शासनकाल में भर्ती घोटाले, शिक्षा माफिया, नकल उद्योग, शिक्षक नियुक्ति घोटाले और विश्वविद्यालयों का राजनीतिकरण चरम पर था। देश यह भी नहीं भूला है कि वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार की गिरफ्त में रही। तब लोकतंत्र खतरे में नहीं था, आज केवल बैरिकेड देखकर लोकतंत्र खतरे में कैसे आ गया?

राहुल गांधी और उनके सहयोगी छात्रों के हमदर्द बनने का प्रयास कर रहे हैं। प्रश्न है,क्या छात्रों को न्याय दिलाने का एकमात्र मार्ग सड़क पर शक्ति प्रदर्शन है? यदि जांच एजेंसियां कार्य कर रही हैं, न्यायालय सक्रिय हैं और दोषियों पर कार्रवाई हो रही है, तो फिर इस आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? न्याय या राजनीतिक सुर्खियां?

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने आंदोलनों को कई बार राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया। अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का परिणाम देश देख चुका है। छात्र आंदोलनों में राजनीतिक घुसपैठ नई बात नहीं है। आज भी वही पटकथा दोहराई जा रही है—छात्र आगे, राजनीति पीछे।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन किसी भी विरोध का अधिकार कानून-व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। यदि प्रशासन सुरक्षा की दृष्टि से बैरिकेड लगाता है, तो उसे "लोकतंत्र की हत्या" कहना जनता को भ्रमित करने का प्रयास है। कानून का पालन सरकार भी करेगी और विपक्ष भी—यही संविधान की भावना है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन नेताओं के अपने परिवार पीढ़ियों से सत्ता के केंद्र में रहे, वे आज स्वयं को व्यवस्था के सबसे बड़े पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह राजनीतिक नाटक अब जनता की समझ से बाहर नहीं है।

आचार्य चाणक्य ने स्पष्ट कहा था,"राज्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी आक्रमणकारी नहीं, बल्कि वह व्यक्ति है जो अपने स्वार्थ के लिए जनता की भावनाओं का उपयोग करता है।" आज छात्रों के आक्रोश को राजनीतिक ईंधन बनाया जा रहा है। यह राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

भारत का विद्यार्थी किसी दल का कार्यकर्ता नहीं है। वह डॉक्टर बनेगा, वैज्ञानिक बनेगा, सैनिक बनेगा, शिक्षक बनेगा, राष्ट्र का निर्माता बनेगा। उसे सड़क की राजनीति का हथियार बनाना राष्ट्रीय अपराध से कम नहीं।यदि विपक्ष वास्तव में छात्रों के साथ है, तो संसद में परीक्षा सुधार का विस्तृत विधेयक लाए, परीक्षा माफिया के विरुद्ध सर्वदलीय कानून बनाए, शिक्षा व्यवस्था को दलगत हस्तक्षेप से मुक्त करने का संकल्प ले। केवल कैमरों के सामने मार्च निकालना और सोशल मीडिया पर बयान देना छात्रों के भविष्य का समाधान नहीं है।

देश अब यह समझ चुका है कि कुछ दलों की राजनीति का मूल मंत्र है—जहाँ असंतोष मिले, वहाँ अवसर खोजो; जहाँ समस्या मिले, वहाँ समाधान नहीं, आंदोलन खड़ा करो।

भारत को आंदोलनजीवी राजनीति नहीं, उत्तरदायी राजनीति चाहिए। छात्रों को न्याय मिले, दोषियों को दंड मिले, परीक्षा प्रणाली पारदर्शी बने—यह पूरे राष्ट्र की मांग है। लेकिन छात्रों के कंधों पर सत्ता की सीढ़ी बनाने वालों को भी देश पहचान चुका है।

**राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में।छात्र पहले, सत्ता की महत्वाकांक्षा बाद में।यही लोकतंत्र है, यही राष्ट्रधर्म है।

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