आंदोलन नहीं, लक्ष्य भटकने की त्रासदी: जेपी से अन्ना तक और आज का छात्र आंदोलन
"मैं संपूर्ण क्रांति आंदोलन का प्रत्यक्ष सक्रीय साक्षी हूँ। आपातकाल का दंश झेला है, लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। इसलिए आंदोलनों का मूल्यांकन मैं नारों से नहीं, बल्कि उनके उद्देश्य, चरित्र और परिणाम से करता हूँ।" भारत का इतिहास बताता है कि आंदोलन तभी सफल होते हैं जब उनके केंद्र में राष्ट्रहित, नैतिकता और जनकल्याण हो। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन था। उसमें छात्र शक्ति परिवर्तन की मशाल थी, किसी राजनीतिक दल की सीढ़ी नहीं। अनुशासन, त्याग, राष्ट्रभक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा उसका आधार थे।
वर्ष 2011 का अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन भी अपार जनसमर्थन लेकर उठा। देश को विश्वास था कि यह आंदोलन सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और जवाबदेही की नई संस्कृति स्थापित करेगा। किंतु समय बीतने के साथ उसका मूल उद्देश्य पीछे छूटता गया। आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरे अलग-अलग राजनीतिक राहों पर चल पड़े। परिणाम यह हुआ कि जिस जनांदोलन ने व्यवस्था परिवर्तन का सपना दिखाया था, वह अंततः राजनीतिक पुनर्संरेखण का माध्यम बनकर रह गया। यह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि लक्ष्य से भटकते आंदोलनों की विडंबना है।
आज पुनः देश के विभिन्न भागों में छात्र आंदोलनों का वातावरण बनाया जा रहा है। छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि छात्र शक्ति का उपयोग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं होना चाहिए। यदि छात्र केवल सत्ता संघर्ष के औजार बन जाएँ, तो सबसे अधिक नुकसान उनके भविष्य, शिक्षा और राष्ट्र की बौद्धिक पूंजी का होता है।
यही कारण है कि आज प्रश्न छात्र नहीं, बल्कि उन्हें दिशा देने वाले नेतृत्व पर उठ रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि राहुल गांधी की राजनीति में दिवास्वप्न, अतिआत्मविश्वास और अहंकार का ऐसा मिश्रण दिखाई देता है, जो आत्ममंथन की संभावना को सीमित कर देता है। लगातार चुनावी पराजयों और जनादेशों के बावजूद यदि हर राजनीतिक चुनौती का उत्तर केवल आंदोलन और टकराव में खोजा जाए, तो यह लोकतांत्रिक विकल्प की नहीं, राजनीतिक अधीरता की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है।
लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि राष्ट्र के सामने व्यवहारिक और सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। संसद, न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाएँ और जनसंवाद,ये लोकतंत्र के स्थापित माध्यम हैं। यदि हर असहमति को सड़क के संघर्ष में बदल दिया जाए, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा भी प्रभावित होती है।
इतिहास का निष्कर्ष स्पष्ट है। जेपी आंदोलन इसलिए अमर हुआ क्योंकि उसका लक्ष्य राष्ट्र था। अन्ना आंदोलन इसलिए कमजोर पड़ा क्योंकि उसका मूल लक्ष्य बिखर गया। और आज यदि कोई भी आंदोलन राष्ट्रहित से ऊपर दलगत महत्वाकांक्षा को रखेगा, तो उसका परिणाम भी इतिहास के इन्हीं पन्नों में दर्ज होगा।
छात्रों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे किसी भी दल की राजनीतिक सेना नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, न्यायविद, पत्रकार, प्रशासक और राष्ट्रनिर्माता हैं। उनका सबसे बड़ा आंदोलन ज्ञान, चरित्र, अनुशासन और राष्ट्रसेवा होना चाहिए।
आंदोलन लोकतंत्र की शक्ति हैं, किंतु केवल तब, जब उनका लक्ष्य राष्ट्र का उत्थान हो। जब आंदोलन उद्देश्य से भटक जाते हैं, तब वे परिवर्तन का माध्यम नहीं, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का उपकरण बनकर रह जाते हैं।
