आत्मविश्वास कहता है"मैं सत्य के साथ हूँ।"अहंकार कहता है"सत्य मेरे साथ है।"

 आत्मविश्वास और अहंकार के मध्य की अदृश्य रेखा

जब राष्ट्र इस रेखा को मिटा देता है, तब इतिहास रक्त से नया अध्याय लिखता है


कौटिल्य दृष्टि/संपादकीय 


सृष्टि के महानतम विनाश शस्त्रों से नहीं, अहंकार से हुए हैं। तलवारें तो केवल अंतिम दृश्य होती हैं; युद्ध की वास्तविक शुरुआत उस क्षण होती है, जब मनुष्य अपने आत्मविश्वास को ईश्वर का वरदान न मानकर अपनी सर्वशक्तिमत्ता का उद्घोष करने लगता है। वहीं से सभ्यताओं का सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ने लगता हैहै,आत्मविश्वास नदी है,वह जितनी विशाल होती है, उतनी ही झुककर बहती है। अहंकार बाढ़ है,वह अपने ही किनारों को तोड़ देता है। आत्मविश्वास वटवृक्ष है, जिसकी छाया में समाज शरण पाता है; अहंकार विष वृक्ष है, जिसकी जड़ें सबसे पहले उसी भूमि को विषाक्त करती हैं, जिसने उसे जन्म दिया।

आज संसार की सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं कि मनुष्य अहंकारी हो गया है; त्रासदी यह है कि उसने अहंकार को ही नेतृत्व, उद्दंडता को साहस, असहिष्णुता को दृढ़ता और आत्ममुग्धता को व्यक्तित्व का पर्याय मान लिया है। यह भ्रम जितना व्यक्ति के लिए घातक है, उससे कहीं अधिक समाज और राष्ट्र के लिए विनाशकारी है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजा को बार-बार सावधान किया कि राज्य का पतन सीमाओं पर नहीं, निर्णयों में प्रवेश कर चुके अहंकार से आरम्भ होता है। जिस दरबार में सत्य बोलने वालों का स्थान चाटुकार ले लेते हैं, वहाँ पराजय की घोषणा शत्रु नहीं करता—समय करता है।रावण पराजित इसलिए नहीं हुआ कि राम अधिक शक्तिशाली थे; वह इसलिए पराजित हुआ क्योंकि उसके भीतर का अहंकार उसके विवेक से अधिक शक्तिशाली हो गया था। दुर्योधन इसलिए नहीं हारा कि पाण्डव अधिक थे; वह इसलिए हारा कि उसने धर्म से बड़ा अपने अहंकार को मान लिया। इतिहास का प्रत्येक खंडहर एक ही वाक्य लिखता है,"जिसे अपने अतिरिक्त कोई दिखाई नहीं देता, उसे अंततः अपना भविष्य भी दिखाई नहीं देता।"


आज परिवारों में संवाद का स्थान अहं ने ले लिया है। राजनीति में विचारधारा का स्थान व्यक्तिपूजा ने, शिक्षा में ज्ञान का स्थान प्रमाणपत्रों ने और समाज में चरित्र का स्थान प्रदर्शन ने। यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक संकट नहीं, राष्ट्रीय संकट का संकेत है। क्योंकि राष्ट्र केवल संविधान से नहीं, संस्कारों से जीवित रहते हैं। न नागरिक अपनी आलोचना सुनना छोड़ देता है, उसी दिन उसका विकास रुक जाता है। जिस दिन शासन स्वयं को प्रश्नों से ऊपर मान लेता है, उसी दिन लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। और जिस दिन समाज सत्य से अधिक अपनी सुविधा को महत्व देने लगे, उसी दिन पतन की नींव रखी जा चुकी होती है। भारत की आत्मा ने कभी शक्ति का अहंकार नहीं किया। इसी भूमि ने विश्वविजयी सम्राटों से भी कहलवाया "विजय से बड़ा धर्म है।" यही वह भूमि है जहाँ श्रीराम विजय के बाद भी विनम्र रहे, श्रीकृष्ण सामर्थ्य के शिखर पर भी सारथी बने रहे, और चाणक्य साम्राज्य का निर्माता होकर भी राजसिंहासन से दूर रहे। यही भारतीयता है,शक्ति का संयम, ज्ञान का विनय और विजय का आत्मसंयम। आज आवश्यकता केवल विकसित भारत की नहीं, विनम्र भारत की है; केवल शक्तिशाली नेतृत्व की नहीं, आत्मसंयमी नेतृत्व की है; केवल तकनीकी प्रगति की नहीं, नैतिक प्रगति की है। क्योंकि जिन राष्ट्रों की प्रगति चरित्र से बड़ी हो जाती है, उनका वैभव अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहता।


कौटिल्य का अंतिम संदेश::आत्मविश्वास कहता है"मैं सत्य के साथ हूँ।"अहंकार कहता है"सत्य मेरे साथ है।"इन दोनों वाक्यों के बीच ही राष्ट्रों का भविष्य छिपा है जिस दिन व्यक्ति, समाज और सत्ता इस सूक्ष्म अंतर को समझ लेंगे, उसी दिन संघर्ष सहयोग में, विभाजन समरसता में और शक्ति लोकमंगल में बदल जाएगी। अन्यथा इतिहास की धूल में दफन साम्राज्य आज भी मौन खड़े होकर यही चेतावनी दे रहे हैं,"सामर्थ्य कभी किसी सभ्यता को नहीं डुबोता; सामर्थ्य का अहंकार ही उसके डूबने का कारण बनता है।"

यही कौटिल्य की दृष्टि है। यही भारत की सनातन चेतना है। यही आने वाले युग की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता है

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