सीतायण
अध्याय १० , हनुमद्-आगमन एवं मुद्रिका-प्रसंग
अशोक वाटिका के शिंशुपा वृक्ष (शीशम)तले जो अग्नि जल रही थी, वह भय की अग्नि नहीं थी — वह प्रतीक्षा की अग्नि थी, जिसमें तपकर स्वर्ण अपनी शुद्धतम आभा पाता है। सीता जल रही थीं, पर बुझी नहीं थीं।, सीतायण, अध्याय १०
शतयोजन-लंघन — अगम्य सागर का अतिक्रमण:: रामेश्वरम् के तट पर जब वानरयूथ शोक में डूबा बैठा था कि सौ योजन विस्तृत सागर को कौन लांघेगा, तब वृद्ध जाम्बवान् ने अंजनी-पुत्र को उसके विस्मृत बल का स्मरण कराया। यह क्षण केवल एक भौतिक चुनौती का उत्तर नहीं था , यह उस सत्य का उद्घाटन था कि जिस शक्ति की खोज बाहर की जा रही थी, वह भीतर सुप्त पड़ी थी। हनुमान का शरीर पर्वताकार हुआ, उनके रोम-रोम में सूर्यपुत्र का तेज उमड़ पड़ा, और महेन्द्र पर्वत की चोटी उनके चरण-आघात से डोल उठी। यह लंघन केवल दूरी का अतिक्रमण नहीं था, अपितु संदेह और संशय की उस खाई को पाटने का प्रथम चरण था जो अयोध्या और लंका के मध्य, राम और सीता के मध्य फैली हुई थी। समुद्र के मध्य मैनाक पर्वत ने विश्राम का निमंत्रण दिया, सुरसा ने मुख फैलाकर परीक्षा ली, और सिंहिका की छाया ने ग्रसने का प्रयत्न किया — किन्तु हनुमान बुद्धि, बल और विनय के त्रिविध अस्त्र से हर विघ्न को पार करते गए। यह यात्रा इस बात का प्रतीक बन गई कि सत्य और धर्म के मार्ग में आने वाला हर अवरोध, चाहे वह कितना ही विशाल क्यों न प्रतीत हो, विवेक के आगे नतमस्तक होता है।
लंका में अशोक वाटिका का अन्वेषण:: स्वर्णमयी लंका में प्रवेश कर हनुमान ने रात्रि के अंधकार में लघु रूप धारण किया और भवन-भवन, प्रासाद-प्रासाद खोजा। रावण के अंतःपुर में, कुम्भकर्ण के आवास में, विभीषण की धर्मपरायण शय्या के निकट , हर स्थान पर उनकी दृष्टि सीता को खोजती रही, परन्तु सफलता नहीं मिली। अंततः अशोक वाटिका के उस उपवन में, जो नाम से 'शोकरहित' था पर वस्तुतः विषाद की चरम भूमि बन चुका था, हनुमान ने एक शिंशुपा वृक्ष के नीचे मलिन वस्त्रों में, भूमि पर बैठी, दुर्बल किन्तु तेजोमय एक स्त्री को देखा। उनका हृदय बोल उठा , यही वह देवी हैं, जिनके लिए राम अयोध्या का सिंहासन त्याग कर वन-वन भटक रहे हैं।
शिंशुपा वृक्ष तले :: सीता के दर्शन:: यहाँ यह स्मरण रखना आवश्यक है कि सीतायण की मूल दृष्टि सीता को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, अपितु सार्वभौम आदि शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है, जो अपने वियोग-काल में भी अपनी गरिमा और संकल्प को तनिक भी न्यून नहीं होने देतीं। एक वर्ष के बंदीकाल में सीता ने न अन्न ग्रहण किया, न शृंगार, न विश्राम , उनका शरीर क्षीण अवश्य हुआ, परन्तु उनकी आत्मा में जो अग्नि जल रही थी, वह उन्हें रावण के समक्ष सिंहनी के समान अडिग बनाए रखती थी। उनके नेत्रों से अश्रु बहते थे, परन्तु उन अश्रुओं में दैन्य नहीं, प्रतिज्ञा थी। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में इस दृश्य का वर्णन है कि हनुमान ने सीता को एक मलिन वस्त्रधारिणी, उपवास से कृशकाय, किन्तु चन्द्रमा के समान मुख मण्डल वाली स्त्री के रूप में देखा, जो राक्षसियों से घिरी हुई थी और निरन्तर राम का ही स्मरण कर रही थी।
रावण का अंतिम प्रलोभन और सीता की सिंहनाद-सम प्रतिक्रिया:: इसी बीच रावण पुनः अशोक वाटिका में उपस्थित हुआ, इस बार भय और प्रलोभन दोनों का सम्मिश्रण लेकर — दो मास की अंतिम अवधि की चेतावनी के साथ। सीता की प्रतिक्रिया में उनके चरित्र की वह असाधारण दृढ़ता प्रकट होती है, जिसे सीतायण श्रृंखला आरम्भ से रेखांकित करती रही है। उन्होंने रावण को स्मरण कराया कि जो शक्ति उन्हें अशोक वाटिका में बंदी बनाए हुए है, वह उनकी अपनी नहीं, अपितु सीता के तप और राम की मर्यादा का संयम है — यदि सीता चाहें तो अपने तेज से समस्त लंका को भस्म कर सकती हैं, परन्तु वे अपने पति की अनुमति के बिना उस शक्ति का प्रयोग नहीं करतीं। यह कथन केवल धमकी नहीं, अपितु आत्मसंयम में निहित सार्वभौम सामर्थ्य की उद्घोषणा है।
मैं असहाय नहीं हूँ, रावण। मैं संयमित हूँ। और संयम, भय से नहीं, शक्ति से जन्म लेता है।
.सीता, अशोक वाटिका — सीतायण की भावानुगामी प्रस्तुति
त्रिजटा का स्वप्न — रक्षा-कवच:: रावण के प्रस्थान के पश्चात राक्षसी त्रिजटा, जो अन्य रक्षिकाओं में अपेक्षाकृत करुणाशील थी, ने अपना स्वप्न सुनाया , जिसमें राम विजयी होकर श्वेत गज पर आरूढ़ लंका में प्रवेश करते हैं और रावण का वंश नष्ट हो जाता है। इस स्वप्न-वृत्तांत ने अन्य राक्षसियों को भयभीत कर दिया और कुछ समय के लिए सीता को प्रताड़ना से राहत मिली। यह प्रसंग स्मरण कराता है कि धर्म के पक्ष में खड़े होने की चेतना शत्रु-शिविर में भी सर्वथा लुप्त नहीं होती।
हनुमान की नीति-दुविधा:: वृक्ष की शाखाओं में छिपे हनुमान के समक्ष अब एक सूक्ष्म नीति-प्रश्न उपस्थित हुआ किस प्रकार वे स्वयं को प्रकट करें, जिससे सीता भयभीत न हों और उन्हें एक और राक्षस-माया न समझें। यह प्रसंग हनुमान के विवेक, वाक्-चातुर्य और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करता है। अत्यंत मधुर, संस्कृतनिष्ठ वाणी में, वे धीरे-धीरे राम-कथा का वर्णन करने लगे , इक्ष्वाकु वंश से लेकर दशरथ, राम के जन्म, विश्वामित्र के साथ यज्ञ-रक्षा, जनकपुर के धनुष-यज्ञ और अंततः वन-गमन तक राम-वृत्तांत का श्रवण : विश्वास का सेतु::जैसे-जैसे यह कथा वृक्ष की ऊँची शाखाओं से नीचे उतरती गई, सीता का विस्मय बढ़ता गया , कौन है यह, जो राम के विषय में इतना यथार्थ और अंतरंग वर्णन कर सकता है? भय और आशा के मध्य दोलायमान सीता ने ऊपर दृष्टि उठाई और एक लघु वानर को शाखाओं के मध्य देखा। यहीं से आरम्भ होता है सीतायण के सर्वाधिक मार्मिक संवादों में से एक , जहाँ विश्वास और संदेह की रेखा अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है।
सीता ने तत्काल विश्वास नहीं किया। यह उनकी दुर्बलता नहीं, अपितु उनकी विवेकशीलता का प्रमाण है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि यह रावण की ही कोई नवीन माया हो सकती है, जो उन्हें छलने के लिए भेजी गई हो। यह क्षण सीतायण की उस मूल स्थापना को पुनः पुष्ट करता है कि सीता कहीं भी भोली अथवा सरल-विश्वासी नारी के रूप में चित्रित नहीं होतीं ,वे प्रत्येक परिस्थिति का मूल्यांकन अपने विवेक से करती हैं, चाहे वह मित्र हो या शत्रु।
मुद्रिका-प्रदान — प्रमाण और पुनर्जीवन:: सीता के संशय का समाधान करने के लिए हनुमान ने राम की अंगुली से प्राप्त मुद्रिका (अंगूठी) प्रस्तुत की, जिस पर राम-नाम अंकित था। यह वस्तु केवल पहचान-चिह्न नहीं थी , यह उस अटूट सूत्र का भौतिक प्रतीक थी, जो सैकड़ों योजन की दूरी और सागर के अंतराल के बावजूद राम और सीता को जोड़े हुए था। मुद्रिका को हाथ में लेते ही सीता की देह में मानो प्राण पुनः संचरित हो उठे। जिस मुख पर महीनों से केवल विषाद की छाया थी, वहाँ क्षण भर के लिए वही आभा लौट आई, जो मिथिला के स्वयंवर में दिखी थी।
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड (हनुमान के स्वरूप-प्राकट्य का सुप्रसिद्ध प्रसंग, भावानुगामी संदर्भ में उद्धृत)
यहाँ स्मरणीय है कि यह चौपाई मूलतः हनुमान की शक्ति के स्मरण-प्रसंग से सम्बद्ध है, जिसे हम इस अध्याय की भावभूमि हनुमान के प्रताप और उनकी सेवा-निष्ठा , के सन्दर्भ में उद्धृत कर रहे हैं। पाठकों से अनुरोध है कि मूल प्रसंग हेतु सुन्दरकाण्ड का सम्पूर्ण पाठ अवश्य देखें।
चूड़ामणि — सीता का प्रत्युत्तर, धैर्य-सीमा एवं संदेश:: विश्वास सुदृढ़ होने के पश्चात सीता ने अपने केशों में धारण चूड़ामणि (शिरोमणि) उतारकर हनुमान को सौंपी, जिससे राम को यह प्रमाण मिले कि यह संदेश वस्तुतः सीता की ओर से ही है। यह आदान-प्रदान , मुद्रिका का सीता तक पहुँचना और चूड़ामणि का राम तक लौटना , सीतायण की दृष्टि में केवल सूचना का आवागमन नहीं, अपितु दो सार्वभौम आत्माओं के मध्य उस अटूट प्रतिज्ञा का नवीकरण है, जो विवाह के सप्तपदी में ली गई थी। सीता ने हनुमान से यह भी स्पष्ट कह दिया कि यदि एक मास के भीतर राम न आए, तो वे स्वयं अपने प्राण त्याग देंगी यह उनकी दुर्बलता नहीं, अपितु उनकी उस अंतिम स्वायत्तता की उद्घोषणा है कि अपने भाग्य का निर्णय वे स्वयं लेंगी, किसी अन्य की प्रतीक्षा में अनंतकाल तक विवश नहीं रहेंगी।
पंच-परंपरा तुलनात्मक दृष्टि:: सीतायण की स्थापित पद्धति के अनुरूप, इस प्रसंग को हम पाँच शास्त्रीय परम्पराओं के तुलनात्मक दर्पण में देखते हैं, प्रत्येक को उसके मौलिक स्वरूप में पृथक् रखते हुए, बिना किसी सम्मिश्रण के।वाल्मीकि रामायण (सुन्दरकाण्ड) यहाँ हनुमान की बुद्धिमत्ता और विनय पर सर्वाधिक बल है , वे अत्यंत सतर्कता से, धीरे-धीरे राम-कथा सुनाकर सीता का विश्वास अर्जित करते हैं। यह मूल आधार-ग्रंथ समस्त उत्तरवर्ती परम्पराओं का स्रोत है। रामचरितमानस (तुलसीदास, सुन्दरकाण्ड) :: भक्ति-भाव प्रधान है हनुमान को राम के परम भक्त एवं सेवक के रूप में चित्रित किया गया है, और सीता के प्रति उनका व्यवहार पुत्रवत् श्रद्धा से परिपूर्ण है।
कम्बन का रामावतारम् (तमिल) इस दक्षिण भारतीय महाकाव्य में सीता के आत्मगौरव और तेजस्विता का विशेष उभार मिलता है :: सीता का संवाद अधिक तीक्ष्ण एवं स्वाभिमानी स्वर लिए हुए है, जो सीतायण की मूल दृष्टि से विशेष सामंजस्य रखता है। अद्भुत रामायण , इस परम्परा में सीता की दिव्य, आदि-शक्ति-स्वरूपा प्रकृति और भी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होती है , यहाँ सीता का चरित्र सामान्य पतिव्रता नारी से आगे बढ़कर सृष्टि-संचालिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है।अध्यात्म रामायण , यह परम्परा सम्पूर्ण कथा को आध्यात्मिक-दार्शनिक दृष्टि से प्रस्तुत करती है, जहाँ मुद्रिका-प्रसंग जीवात्मा और परमात्मा के मिलन के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित होता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उपर्युक्त पाँचों परम्पराओं को हम पृथक्-पृथक् स्रोतों के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, न कि एक-दूसरे में घुला-मिलाकर। यह सीतायण की मूल प्रतिबद्धता है , शास्त्रीय स्रोत और आधुनिक रचनात्मक पुनर्कथन (यथा अमीश त्रिपाठी की कल्पनाशील कृतियाँ) में स्पष्ट रेखा बनाए रखना।
सीता सक्रिय भागीदार, निष्क्रिय पीड़िता नहीं:: मुद्रिका-प्रसंग को यदि केवल 'बंदी को सूचना मिली' के रूप में पढ़ा जाए, तो सीता के चरित्र की सम्पूर्ण गरिमा खो जाती है। वस्तुतः यह दो सार्वभौम इच्छाशक्तियों के मध्य संवाद है ,एक ओर राम, जो सेना और शक्ति के माध्यम से न्याय स्थापित करने निकले हैं; दूसरी ओर सीता, जो अपने तप, संयम और स्पष्ट प्रतिज्ञा (एक मास की समय-सीमा) के माध्यम से अपनी शर्तें स्वयं निर्धारित करती हैं। यह समानधर्मा साझेदारी है, आश्रय नहीं।
सीतायण दृष्टिकोण
दूसरा पक्ष:: कुछ आधुनिक टीकाकार यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि सीता वस्तुतः इतनी सार्वभौम शक्तिसम्पन्न थीं, तो उन्हें बाह्य सहायता (हनुमान, राम-सेना) की आवश्यकता ही क्यों पड़ी। इस पर पारम्परिक व्याख्या यह देती है कि सीता का संयम स्वेच्छा से धारण की गई मर्यादा थी, विवशता नहीं , ठीक उसी प्रकार जैसे राम स्वयं मर्यादा-पुरुषोत्तम कहलाते हुए भी सामर्थ्यवान थे। पाठक इस प्रश्न पर स्वतंत्र चिंतन कर सकते हैं।
आगामी अध्याय ११ में — हनुमान का विध्वंस-तांडव, अक्षयकुमार-वध एवं लंका-दहन
