सीतायण । अध्याय ९ : सागर-साधना और सेतु-बंधन
जब स्वयं सागर ने रघुनाथ के समक्ष मस्तक झुकाया
हनुमान लंका से लौट आए थे। सीता का चूड़ामणि, उनका संदेश, और यह आश्वासन कि माता जानकी जीवित हैं और अपने संकल्प पर अडिग हैं — इतना भर वृत्तांत सुनकर किष्किंधा की वानर-सेना में उत्साह की लहर दौड़ गई। अब समय था कर्म का। सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जामवंत — समस्त वानर-वीरों के साथ राम और लक्ष्मण ने दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया और महेंद्र पर्वत होते हुए उस स्थान पर पहुंचे, जहां से लंका की भूमि सागर के उस पार दिखाई देती थी। किंतु सामने अथाह जलराशि थी — विशाल वानर-सेना के लिए भी अगम्य।
रघुनाथ का क्रोध और सागर की चुप्पी
राम ने विनम्रता से सागर के तट पर कुशासन बिछाकर तपस्या आरंभ की — प्रार्थना की कि सागर स्वयं मार्ग दे। एक दिन बीता, दूसरा बीता, तीसरा भी — सागर की ओर से कोई उत्तर नहीं आया। तुलसीदास इस क्षण को रामचरितमानस में अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित करते हैं — विनय जब निष्फल हुई, तब मर्यादा-पुरुषोत्तम राम ने भी क्रोध का सहारा लिया, क्योंकि निर्जीव को भी कभी-कभी भय दिखाए बिना बोध नहीं होता।
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥
अर्थ : जड़ (निर्जीव) सागर तीन दिन बीत जाने पर भी विनती नहीं मान रहा था। तब श्रीराम ने क्रोधपूर्वक कहा — भय के बिना प्रीति (आदर) नहीं होती।
— गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड/लंकाकांड संधि-प्रसंग
राम ने लक्ष्मण से अपना दिव्य धनुष मंगवाया और अग्निबाण संधान किया। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में वर्णन मिलता है कि इस असाधारण तेज से सागर का जलमग्न कुक्षि-प्रदेश जल उठा, जलचर व्याकुल होकर पुकार उठे, और स्वयं सरिताओं के स्वामी समुद्र कांपते हुए राम के समक्ष प्रकट हुए — हाथ जोड़े, क्षमा-प्रार्थी।
समुद्र का परामर्श : नल की शक्ति
समुद्र ने विनयपूर्वक निवेदन किया कि प्रकृति का नियम है — जल अपनी गहराई और विस्तार को स्वेच्छा से त्याग नहीं सकता, चाहे कितना भी बड़ा प्रयोजन क्यों न हो। किंतु उसने स्वयं ही मार्ग सुझाया — वानरसेना में विश्वकर्मा-पुत्र नल हैं, जिन्हें यह वरदान प्राप्त है कि वे जो कुछ भी जल में डालेंगे, वह डूबेगा नहीं। नल की सहायता से यदि सेतु बनाया जाए, तो सागर स्वयं उसे स्थिर आधार देगा और वह भार सहर्ष वहन करेगा।
यह क्षण अत्यंत सूचक है — प्रकृति का सबसे विराट तत्व भी धर्म के लिए मार्ग देने को बाध्य होता है, बशर्ते संकल्प में सामर्थ्य और साधना दोनों हों। राम ने केवल बल का प्रयोग नहीं किया — पहले विनय, फिर तप, और अंततः आवश्यकता पड़ने पर तेज। यही राजधर्म और साधना का समन्वित मार्ग कौटिल्य-दृष्टि से भी आदर्श राज्य-नीति का प्रतीक है : पहले संधि का प्रयास, फिर आवश्यकता पड़ने पर बल का संकेत।
नल-नील और वानर-सेना द्वारा सेतु-निर्माण
नल के निर्देशन और नील की सहायता से सेतु-निर्माण आरंभ हुआ। वानर-सेना पर्वत-शिखरों और विशाल वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर सागर में डालने लगी, और राम-नाम के उच्चारण मात्र से वे शिलाएं जल पर स्थिर तैरने लगीं — यह प्रसंग भारतीय जनमानस में आज भी एक ही पंक्ति में स्मरण किया जाता है, कि जिस शिला पर राम का नाम लिखा गया, वह भी तैर गई, जबकि स्वयं राम जब सेतु परीक्षण हेतु पत्थर डालते, तो वह डूब जाता — भक्तों की श्रद्धा में इसका भावार्थ यही निकाला गया कि नाम का प्रताप स्वयं नामी से भी बड़ा हो सकता है, जब भक्ति निश्छल हो। पांच दिनों में सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा यह सेतु पूर्ण हुआ — भारतीय स्थापत्य और सामूहिक श्रम-शक्ति का यह प्रतीक आज भी 'राम सेतु' के नाम से सांस्कृतिक स्मृति में जीवंत है।
स्रोत-टिप्पणी : समुद्र-क्रोध व सेतु-बंधन का मूल वर्णन वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड (सर्ग २१-२३ के आसपास) में मिलता है; भावपूर्ण चित्रण गोस्वामी तुलसीकृत रामचरितमानस में है। दोनों परंपराओं को यहां पृथक स्वीकार्यता के साथ, बिना मिश्रण के, प्रस्तुत किया गया है।
भविष्य-संकेत : रामेश्वरम की प्रतीक्षा
इसी सागर-तट पर, युद्ध की समाप्ति और रावण-वध के पश्चात, एक और अध्याय लिखा जाना शेष था — जब स्वयं मर्यादा-पुरुषोत्तम राम को ब्राह्मण-वध के दोष-निवारण हेतु शिव-आराधना करनी थी, और अगस्त्य जैसे मुनियों के मार्गदर्शन में यहीं शिवलिंग की स्थापना हुई, जो आगे चलकर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से पूजित हुआ। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण अथवा रामचरितमानस में नहीं, बल्कि मुख्यतः तमिल संत कंबन की 'रामावतारम्' और परवर्ती पौराणिक परंपरा (शिवपुराण) में मिलता है — अतः इसे यहां केवल भविष्य-संकेत के रूप में रखा जा रहा है; इसका विस्तृत वर्णन आगामी अध्याय में, युद्ध-समापन के प्रसंग के साथ, प्रामाणिक स्रोतों सहित प्रस्तुत किया जाएगा।
सीता के लिए यह सेतु
जिस क्षण सागर ने राम के समक्ष सिर झुकाया, उसी क्षण दूर अशोक वाटिका में सीता भी अपने भीतर की उसी अडिग साधना पर खड़ी थीं — प्रतीक्षा में, पर पराजित नहीं। यह सेतु केवल पत्थर और वृक्षों का पुल नहीं था; यह उस संकल्प का सेतु था जो आदि शक्ति सीता की मुक्ति और धर्म की पुनर्स्थापना के बीच बनाया जा रहा था। प्रकृति के सबसे अजेय तत्व — सागर — का झुकना यह सिद्ध करता है कि सीता जैसी तपस्विनी की प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाती; सृष्टि स्वयं उसके पक्ष में मार्ग खोलती है।
— क्रमशः (अध्याय १० : मेघनाद-बंधन, रावण-संवाद एवं लंका-दहन)
