संसद के द्वार पर संघर्ष: असहमति बनाम अराजकता

 जंतर मंतर से जनपथ तक  सत्ता के द्वार पर उपद्रव राजनीति और राष्ट्र की परीक्षा !

कौटिल्य विशेष

नई दिल्ली

बीस जून से जंतर-मंतर पर सुलग रही आग बीस-इक्कीस जुलाई को दिल्ली के हृदयस्थल तक पहुंच गई। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले नीट परीक्षा में गड़बड़ी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन जब मानसून सत्र के पहले दिन "चलो संसद" मार्च में बदला, तो यह केवल एक छात्र-आंदोलन नहीं रह गया - यह राजधानी की सुरक्षा-व्यवस्था और राजनीतिक मर्यादा दोनों की परीक्षा बन गया।

हज़ारों की भीड़ ने संसद मार्ग की बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किया। दिल्ली पुलिस को केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के निकट आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और लाठीचार्ज करना पड़ा। प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी दोनों घायल हुए। यह घटनाक्रम अकेला नहीं था उसी दिन जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस का प्रदर्शन और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में किसानों का शंभू सीमा की ओर कूच भी चल रहा था। एक ही दिन दिल्ली में तीन बड़े मोर्चे यह संयोग नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि राजधानी की सुरक्षा तंत्र पर एक साथ कितना दबाव झेलने की क्षमता परखी जा रही है।

एक ही दिन में तीन प्रदर्शन, हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में बैरिकेड टूटना और प्रधानमंत्री आवास तक धरने की नौबत - यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, राष्ट्र की सुरक्षा-संस्कृति का प्रश्न है। सोमवार की झड़प के अगले ही दिन, इक्कीस जुलाई को, कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास तक मार्च किया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई सांसदों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। कांग्रेस ने इसे "बर्बरतापूर्ण कार्रवाई" बताते हुए विरोध जताया, वहीं आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस पर छात्र आंदोलन का श्रेय लेने और उसे कमज़ोर करने का आरोप मढ़ा - यानी विपक्ष स्वयं भी एकजुट नहीं दिखा।

यहीं वह बिंदु है जहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है: क्या यह विपक्ष का छात्रों के प्रति सच्चा सरोकार है, अथवा एक वास्तविक शैक्षणिक मुद्दे पर सवार होकर सत्ता-प्रतिष्ठान को घेरने की सुनियोजित राजनीति? नीट परीक्षा में अनियमितता एक गंभीर विषय है, जिस पर सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए- इसमें कोई विवाद नहीं। परंतु जब आंदोलन प्रधानमंत्री के निजी आवास तक पहुंचने की ज़िद में बदल जाए, जब बैरिकेड तोड़े जाएं और सुरक्षा घेरे को चुनौती दी जाए, तब यह प्रश्न भी उतना ही वैध है कि क्या मांग और मर्यादा के बीच की रेखा पार की जा रही है। भारत की लोकतांत्रिक परंपरा प्रदर्शन और असहमति के अधिकार को सम्मान देती है यह जनकपुर से लेकर आधुनिक गणतंत्र तक हमारी सभ्यतागत विरासत का ही विस्तार है, जहां लोकमत को राजधर्म का आधार माना गया। किंतु वही परंपरा यह भी सिखाती है कि राष्ट्र की सुरक्षा-संस्था और सत्ता के प्रतीकों की गरिमा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में भीड़ का बैरिकेड तोड़ना, चाहे कारण कितना भी न्याय संगत क्यों न हो, एक ऐसी रेखा है जिसे राजनीतिक लाभ के लिए धुंधला नहीं किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल की बैठक में स्पष्ट किया कि पेपर लीक "घोर पाप" है और सरकार ने ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करते हुए आवश्यक कदम उठाए हैं, यहां तक कि जहां आवश्यक था वहां पुनर्परीक्षा भी कराई गई। यह उत्तर पर्याप्त है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है • परंतु इसका उत्तर सड़क पर बैरिकेड तोड़कर नहीं, संसद के भीतर सार्थक बहस से आना चाहिए, जिसके लिए जनता ने अपने प्रतिनिधियों को भेजा है।

राष्ट्र के समक्ष सवाल?

जब राजधानी एक साथ तीन मोर्चों की गवाह बनती है - छात्र आंदोलन, किसान मार्च और क्षेत्रीय राज्यत्व की मांग तो यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि असंतोष के अनेक स्वर एक साथ मुखर हो रहे हैं। एक परिपक्व राष्ट्र के लिए आवश्यक है कि वह इन स्वरों को सुने, परंतु साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि कोई भी आंदोलन राजनीतिक दलों के हाथ की कठपुतली बनकर संस्थाओं की गरिमा को चुनौती देने का माध्यम न बने। कौटिल्य ने स्वयं कहा था कि राज्य की सुरक्षा और प्रजा का असंतोष दोनों के प्रति सजग राजा ही दीर्घजीवी शासन कर सकता है। दिल्ली की सड़कों पर बीते दो दिनों का घटनाक्रम इसी संतुलन की परीक्षा है और यह परीक्षा केवल सरकार की नहीं, विपक्ष की, आंदोलनकारियों की, और अंततः पूरे राष्ट्र-तंत्र की है।


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