मौन सरजू के आसुओं को कौन पोंछेगा?

 अयोध्या! यदि दान पर दाग लगे, तो सरयू भी मौन होकर रोती है!


राजेन्द्र, 272001

"राम पत्थरों में नहीं बसते, वे मनुष्य के चरित्र में निवास करते हैं। मंदिर का शिखर जितना ऊँचा हो, यदि आचरण उतना ऊँचा न हो तो घंटियों की ध्वनि भी आत्मग्लानि का शोर बन जाती है।"1984 की वह तपती दोपहर आज भी स्मृतियों में धधकती है। जब पहली बार श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन का शंखनाद हुआ था, तब किसी ने सत्ता का स्वप्न नहीं देखा था। तब केवल एक ही संकल्प था,राम भारत की आत्मा हैं और उनकी जन्मभूमि राष्ट्र की अस्मिता। कितने युवकों ने अपना यौवन अर्पित कर दिया, कितनी माताओं ने अपने पुत्रों को तिलक लगाकर विदा किया, कितने परिवारों ने अश्रुओं का समुद्र पी लिया। किसी ने पद नहीं माँगा, किसी ने पुरस्कार नहीं माँगा। सबने केवल इतिहास से इतना कहा—"जब राम पुकारेंगे, हम उपस्थित होंगे।"आज मंदिर खड़ा है,दिव्य, भव्य और विराट। परंतु प्रश्न यह है कि क्या उसके साथ हमारी आत्मा भी उतनी ही विराट हुई?

यदि कभी रामभक्तों के दान, उनकी श्रद्धा या उसकी पवित्रता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है, तो वह केवल लेखा-जोखा का विवाद नहीं होता; वह करोड़ों लोगों के विश्वास की परीक्षा बन जाता है। आस्था की थाली में रखा एक दाना भी यदि अपवित्र हो जाए, तो पूरा प्रसाद कलुषित प्रतीत होता है। राम ने स्वर्णमयी लंका को ठुकरा दिया था, क्योंकि उनके लिए वैभव से अधिक मूल्यवान मर्यादा थी। आज यदि राम के नाम पर चलने वाली किसी व्यवस्था में पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं, तो उत्तर भी राम के आदर्शों से ही देना होगा—सत्य, न्याय और निष्कलुष आचरण से।

इतिहास का सबसे बड़ा छल शत्रु नहीं करता, अपना करता है। रावण सामने था, इसलिए युद्ध सरल था; विभीषण का धर्म और मंथरा का मोह भीतर था, इसलिए परीक्षा कठिन थी। सभ्यताएँ बाहर के आक्रमण से कम, भीतर के चरित्र-पतन से अधिक टूटती हैं।

अयोध्या केवल ईंटों का नगर नहीं; वह भारतीय चेतना का ध्रुवतारा है। यदि वहाँ से मर्यादा का प्रकाश मंद पड़ जाए, तो पूरे राष्ट्र का नैतिक आकाश धुँधला हो जाता है। रामराज्य का अर्थ केवल मंदिर नहीं, विश्वास की रक्षा है। श्रद्धा का प्रत्येक अर्पण एक यज्ञाहुति है। उस पर संदेह की छाया भी पड़े, तो समाज का धर्म है कि सत्य सामने आए,न किसी को बचाने के लिए, न किसी को फँसाने के लिए, बल्कि राम के नाम को निष्कलंक रखने के लिए।

राम की नगरी में सबसे बड़ा अपराध धन की चोरी नहीं, विश्वास की चोरी है। मंदिर की रक्षा सेना कर सकती है, दीवारें अभियंता बना सकते हैं, शिखर शिल्पी गढ़ सकते हैं; किंतु आस्था की रक्षा केवल चरित्र कर सकता है।आइए, ऐसा भारत बनाएँ जहाँ श्रीराम का मंदिर केवल स्थापत्य का चमत्कार न हो, बल्कि सत्य, मर्यादा, ईमानदारी और पारदर्शिता का भी शाश्वत प्रतीक बने।

क्योंकि इतिहास अंत में यही पूछेगा? "तुमने राम का मंदिर तो बना दिया, क्या तुमने अपने भीतर भी राम को बचाए रखा?"

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