कौटिल्य दृष्टि
मोबाइलधारी नहीं, राष्ट्रधारी चाहिए! फर्जी पत्रकारिता पर अब निर्णायक प्रहार का समय
दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी केवल न्यायालय की एक सामान्य चिंता नहीं है, बल्कि उस विकृति पर करारा प्रहार है जिसने पत्रकारिता के पवित्र धर्म को बाजार, ब्लैकमेल और भ्रम के दलदल में धकेल दिया है।आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट सत्ता नहीं, फर्जी पत्रकारिता है।गले में आई-कार्ड, हाथ में मोबाइल, सामने कैमरा और पीछे कोई संस्थान नहीं, कोई संपादक नहीं, कोई जवाबदेही नहीं—फिर भी स्वयंभू पत्रकार! यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी सीमा पर घुसपैठ।पत्रकारिता कोई लाइक, व्यू और सब्सक्राइबर का खेल नहीं है। यह राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का व्रत है। जिसने सत्य के लिए संघर्ष नहीं किया, जिसने समाज के प्रति जवाबदेही नहीं निभाई, जिसने केवल भय, ब्लैकमेल और सनसनी को अपना व्यवसाय बना लिया, उसे पत्रकार कहना पत्रकारिता का अपमान है।विडंबना यह है कि कुछ तथाकथित पत्रकार प्रशासन को धमकाते हैं, व्यापारियों से वसूली करते हैं, अफवाहों को खबर बनाते हैं और फिर प्रेस की स्वतंत्रता की ढाल लेकर कानून से बचने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों ने हजारों ईमानदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा को दागदार किया है।
अब समय आ गया है कि फर्जी पत्रकारिता और वास्तविक पत्रकारिता के बीच लक्ष्मण रेखा खींची जाए।सरकार को ऐसा पारदर्शी और न्यायसंगत ढाँचा विकसित करना चाहिए जिससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर चल रहे ब्लैकमेल उद्योग पर कठोर प्रहार हो। स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं हो सकता।आचार्य कौटिल्य ने स्पष्ट कहा था,"राज्य का सबसे बड़ा शत्रु वह है जो असत्य को सत्य बनाकर जनता को भ्रमित करे।" आज यही काम फर्जी खबरों और स्वयंभू पत्रकारों का एक वर्ग कर रहा है।
यह लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं, पत्रकारिता की आत्मा को बचाने की है।यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाना है तो कलम को फिर से तपस्या बनाना होगा, कैमरे को जवाबदेह बनाना होगा और पत्रकारिता को पुनः राष्ट्रधर्म बनाना होगा।देश को मोबाइलधारी नहीं, सत्यधारी पत्रकार चाहिए।देश को माइक्रोफोन नहीं, चरित्र चाहिए।देश को सनसनी नहीं, सत्य चाहिए।यही लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग है, यही पत्रकारिता का पुनर्जागरण है और यही समय की सबसे बड़ी पुकार है।
वी के त्रिपाठी