बजट नहीं, बादल तय करते हैं भारत की समृद्धि

 

भारत की वास्तविक वित्त मंत्री – वर्षा


कृषि, किसान और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा नियामक

"भारत का बजट संसद में नहीं, बादलों में बनता है।" यह वाक्य सुनने में साहित्यिक लग सकता है, किंतु यदि भारत की आर्थिक संरचना का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो यह शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध होता है। हर वर्ष देश की निगाहें केंद्रीय बजट पर टिकती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत की समृद्धि या संकट का पहला निर्णय वित्त मंत्रालय नहीं, बल्कि मानसून करता है। इसलिए यदि किसी एक शक्ति को भारत का वास्तविक वित्त मंत्री कहा जाए तो वह वर्षा है।कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की आधारशिला,भारत हजारों वर्षों से कृषि प्रधान राष्ट्र रहा है। आज भी कृषि केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन का आधार है। खेती से जुड़ी गतिविधियाँ—पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण परिवहन, कृषि उपकरण उद्योग और ग्रामीण व्यापार,देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ हैं।कृषि का प्रभाव केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। किसान की आय बढ़ती है तो गाँव का दुकानदार समृद्ध होता है, ट्रैक्टर निर्माता की बिक्री बढ़ती है, बैंक का ऋण लौटता है, परिवहन बढ़ता है और सरकार को अधिक कर प्राप्त होता है। इस प्रकार कृषि पूरे आर्थिक चक्र को गति देती है।

वर्षा,भारतीय अर्थव्यवस्था का अदृश्य नियंत्रक,भारत के बड़े हिस्से की खेती आज भी मानसून पर निर्भर है। लाखों किसान नहर या ट्यूबवेल से नहीं, बल्कि आकाश की ओर देखकर खेती करते हैं। समय पर वर्षा हो जाए तो खेतों में हरियाली छा जाती है, अन्यथा किसान की मेहनत सूख जाती है।यदि मानसून सामान्य रहे तो,खाद्यान्न उत्पादन बढ़ता है।महँगाई नियंत्रित रहती है।ग्रामीण आय बढ़ती है।उद्योगों की मांग बढ़ती है।सरकार का राजस्व बढ़ता है।सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को गति मिलती है।लेकिन यदि वर्षा विफल हो जाए तो,उत्पादन घटता है।खाद्यान्न महँगा होता है।ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ती है।सरकार को राहत पैकेज देने पड़ते हैं।आर्थिक विकास की गति धीमी हो जाती है।

यही कारण है कि भारतीय रिज़र्व बैंक भी अपनी मौद्रिक नीति बनाते समय मानसून का आकलन करता है।संसद का बजट और प्रकृति का बजट,वित्त मंत्री बजट में हजारों घोषणाएँ कर सकती हैं, लेकिन यदि वर्षा साथ न दे तो अधिकांश योजनाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं। सरकार सिंचाई परियोजनाएँ बना सकती है, खाद पर सब्सिडी दे सकती है, किसान सम्मान निधि भेज सकती है, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा सकती है, परंतु खेत में अंकुर तभी फूटेगा जब प्रकृति का आशीर्वाद मिलेगा।इस दृष्टि से देखें तो संसद का बजट धन का वितरण करता है, जबकि वर्षा धन का सृजन करती है।

विडंबना वर्षा का सम्मान नहीं,भारत में एक ओर बाढ़ आती है, दूसरी ओर कुछ महीनों बाद वही क्षेत्र सूखे से त्रस्त हो जाते हैं। इसका कारण वर्षा की कमी नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की कमी है।आज भी हजारों पारंपरिक तालाब नष्ट हो चुके हैं। वर्षा जल का अधिकांश भाग बिना उपयोग समुद्र में चला जाता है। भूजल लगातार नीचे जा रहा है। शहरों में वर्षा जल संचयन केवल कागज़ों तक सीमित है।यदि प्रत्येक गाँव में तालाबों का पुनर्जीवन हो, वर्षा जल संचयन अनिवार्य हो, नदियों और जलाशयों की रक्षा हो तथा खेत-तालाब जैसी योजनाओं को जनआंदोलन बनाया जाए तो भारत जल-संपन्न और कृषि-संपन्न दोनों बन सकता है।

जलवायु परिवर्तन की नई चुनौती,अब वर्षा केवल कम या अधिक होने का प्रश्न नहीं रह गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप बदल रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आती है, कहीं लम्बे सूखे पड़ते हैं। किसानों की खेती का पारंपरिक गणित बिगड़ रहा है।इसलिए भविष्य की आर्थिक नीति में जलवायु अनुकूल कृषि, सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण और फसल विविधीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

क्या भारत की वित्तीय नीति अधूरी है?,जब तक जल नीति और कृषि नीति को वित्तीय नीति का अभिन्न अंग नहीं बनाया जाएगा, तब तक भारत की आर्थिक योजनाएँ अधूरी रहेंगी। देश की आर्थिक समृद्धि केवल शेयर बाजार से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक समृद्धि तब होती है जब किसान की आय बढ़े, गाँव का बाजार चले, खेतों में हरियाली हो और अन्न भंडार भरे हों।

भारत का वित्त मंत्रालय दिल्ली में है, लेकिन भारत की आर्थिक नियति आकाश में लिखी जाती है। संसद कर लगा सकती है, ऋण ले सकती है, योजनाएँ बना सकती है, परंतु धरती पर समृद्धि का बीज केवल वर्षा बोती है।

इसलिए यह कहना किसी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक यथार्थ है कि,"भारत की वास्तविक वित्त मंत्री वर्षा है।"जिस दिन भारत वर्षा की प्रत्येक बूंद को राष्ट्रीय संपत्ति मानकर उसका संरक्षण करेगा, उसी दिन किसान आत्मनिर्भर होगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होगी और विकसित भारत का स्वप्न वास्तविकता में बदल जाएगा।

अंत में केवल एक वाक्य,"दिल्ली का वित्त मंत्री बजट पढ़ता है, लेकिन भारत का वास्तविक बजट हर वर्ष मानसून लिखता है। बादलों की कृपा से ही खेतों में अन्न, बाजारों में व्यापार और राष्ट्र में समृद्धि आती है। इसलिए भारत की वास्तविक वित्त मंत्री कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वर्षा है।"



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