श्रीराम सेना के प्रथम वैचारिक योद्धा ,अंगद समर्थ

 

श्रीराम सेना के प्रथम वैचारिक योद्धा ,अंगद समर्थ

बल नहीं, बुद्धि और नीति से रावण-सभा को निरुत्तर करने वाला वीर अंगद 







रामकथा में अधिकांश योद्धा अपने बाहुबल और अस्त्र-कौशल के लिए स्मरण किए जाते हैं, किंतु वालि-पुत्र अंगद का व्यक्तित्व इस परंपरा में एक विशिष्ट स्थान रखता है ,वे श्रीराम की वानर-सेना के ऐसे प्रथम योद्धा हैं जिन्होंने युद्धभूमि से पूर्व रावण की सभा में विशुद्ध बुद्धि, नीति और वाक्-चातुर्य के बल पर शत्रु-पक्ष को निरुत्तर किया। यह विशेष प्रसंग वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, कम्ब रामावतारम् तथा अन्य परंपराओं के आलोक में अंगद के व्यक्तित्व, उनकी दूतकर्म-यात्रा, रावण-सभा में उनकी वैचारिक विजय, और उनके प्रसिद्ध चरण-प्रतिज्ञा प्रसंग का सुव्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत करता है। अंगद ने यह सिद्ध किया कि युद्ध की प्रथम विजय अस्त्रों से नहीं, अपितु तर्क, नीति और निर्भीक सत्य-कथन से प्राप्त होती है।अंगद का परिचय , वंश, बाल्यकाल और गुण=अंगद किष्किंधा-नरेश वालि और उनकी पत्नी तारा के पुत्र हैं। जन्म से ही वे असाधारण बल, तेज और बुद्धि से संपन्न थे। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकाण्ड में वालि के चरित्र का विस्तृत वर्णन मिलता है, और उसी क्रम में अंगद के बाल्यकाल तथा उनके यौवराज्याभिषेक का उल्लेख भी आता है। वालि, राम के हाथों वध्य होने के पूर्व, अपने अंतिम समय में अंगद को राम की शरण में सौंपते हैं और उसे सुग्रीव के साथ मिलकर राम की सेवा में समर्पित रहने का उपदेश देते हैं  यह क्षण अंगद के चरित्र की नैतिक नींव रखता है। पिता वालि की मृत्यु के पश्चात अंगद को युवराज पद प्राप्त होता है, तथापि वे सिंहासन के मोह में न पड़कर राम के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखते हैं। रामचरितमानस में तुलसीदास अंगद के इस त्याग और समर्पण को विशेष श्रद्धा के साथ चित्रित करते हैं , पिता के वधकर्ता के प्रति द्वेष रखने के स्थान पर अंगद राम के धर्म-स्वरूप को समझकर उनकी सेवा में तत्पर हो जाते हैं। यह गुण ही आगे चलकर उन्हें रावण-सभा में भेजे जाने योग्य सर्वाधिक उपयुक्त पात्र बनाता है , क्योंकि वे केवल बलशाली नहीं, अपितु परिपक्व बुद्धि और असाधारण आत्म-संयम से भी संपन्न थे।

बुद्धिमान् वाग्मी च दक्षश्च नयशास्त्रविशारदः

 अंगदः सचिवैः सार्धं राघवस्य हिते रतः॥

बुद्धिमान, वाक्पटु, दक्ष तथा नीतिशास्त्र में निपुण अंगद अपने सचिवों सहित राघव के हित में सदा तत्पर रहते थे।

 वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकाण्ड 

महंगे

अंगद की माता तारा भी अत्यंत बुद्धिमती और नीति निपुण थीं, और वालि-वध के पश्चात सुग्रीव तथा किष्किंधा-राज्य के प्रति उनके संतुलित परामर्श ने अंगद के चरित्र-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उल्लेखनीय है कि अंगद के व्यक्तित्व में बल और बुद्धि का यह अद्भुत सामंजस्य उन्हें अपने पिता वालि और माता तारा , दोनों से प्राप्त हुआ प्रतीत होता है। वालि जहाँ अद्वितीय शारीरिक पराक्रम के लिए विख्यात थे, वहीं तारा अपनी नीति-दृष्टि और दूरदर्शिता के लिए। अंगद में इन दोनों गुणों का संगम उन्हें रामकथा के अन्य युवा पात्रों से पृथक् एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।

 सेतु-निर्माण और सेना-संगठन में भूमिका=सुंदरकाण्ड और युद्धकाण्ड के संधिकाल में, जब वानर-सेना समुद्र-तट पर पहुँचती है और सेतु-निर्माण की योजना बनाई जाती है, अंगद इस संपूर्ण अभियान में एक अनुशासित और कुशल संगठक के रूप में उभरते हैं। वे केवल एक योद्धा नहीं, अपितु सेना के संगठन, मनोबल-वर्धन और रणनीति-निर्धारण में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यही अनुभव उन्हें आगे चलकर रावण-सभा में कूटनीतिक दूत के रूप में भेजे जाने के लिए तैयार करता है।

इसी अवधि में विभीषण के लंका-त्याग और राम की शरण में आने के प्रसंग में भी अंगद की उपस्थिति उल्लेखनीय है। सुग्रीव और अन्य वानर-प्रमुखों के मध्य विभीषण की सत्यता को लेकर हुए विचार-विमर्श में अंगद का दृष्टिकोण संतुलित और विवेकपूर्ण रहा, जो उनकी परिपक्व राजनीतिक समझ का एक और प्रमाण है। यह स्पष्ट है कि युद्ध आरंभ होने से बहुत पहले ही अंगद ने राम की सेना में एक विश्वसनीय रणनीतिकार और सलाहकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली थी।


 दूत बनकर रावण-सभा में — अंतिम संधि-प्रस्ताव =युद्ध के आरंभ से पूर्व, राम, धर्मानुसार अंतिम बार शांति और संधि का प्रस्ताव भेजना चाहते हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि युद्ध अंतिम विकल्प के रूप में ही चुना गया है। इस अत्यंत संवेदनशील और जोखिम पूर्ण दूतकर्म के लिए राम अंगद को चुनते हैं यह चयन स्वयं में अंगद की क्षमता पर राम के अगाध विश्वास का प्रमाण है। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में इस दूतकर्म का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ अंगद अकेले शत्रु की राजधानी में, शत्रु-सम्राट की सभा में, निर्भीक होकर प्रवेश करते हैं।

रावण की सभा में पहुँचकर अंगद अपना परिचय अत्यंत गौरव और आत्मविश्वास के साथ देते हैं , वे स्वयं को वालि-पुत्र और राम का दूत बताते हुए रावण को स्पष्ट शब्दों में समझाते हैं कि सीता को सम्मान पूर्वक लौटाना ही उसके तथा उसके संपूर्ण कुल के हित में है। कम्ब रामावतारम् में इस दृश्य को विशेष नाट्यात्मक तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया गया है, जहाँ अंगद के प्रत्येक वाक्य में शौर्य और नीति का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।

 रावण-अंगद संवाद — नीति और तर्क का द्वंद्व=

रावण-अंगद संवाद रामकथा के सर्वाधिक बौद्धिक रूप से समृद्ध प्रसंगों में गिना जाता है। जब रावण अंगद को उसकी लघु आयु और वानर-कुल का उपहास करते हुए तिरस्कृत करने का प्रयत्न करता है, तब अंगद अत्यंत तीक्ष्ण तर्कों से उसे उत्तर देते हैं। वे रावण को उसके स्वयं के अतीत के अपमान स्मरण कराते हैं ,विशेषतः वह प्रसंग जब वालि ने रावण को अपनी काँख में दबाकर संपूर्ण चतुःसमुद्र-भ्रमण करवाया था। यह स्मरण-वाक्य रावण के अहंकार पर सीधा आघात करता है।

यस्य पादतले वृद्धः पिता मे वालिनो हतः।

 तस्य पुत्रोऽहमायातो दूतत्वेन नरेश्वर॥

जिस वालि के चरणतल में तुम्हें दबाया गया था, हे नरेश्वर, मैं उन्हीं वालि का पुत्र हूँ, दूत बनकर आया हूँ।, वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 

रामचरितमानस में तुलसीदास इस संवाद को और अधिक नीति परक बनाते हैं, जहाँ अंगद रावण को बार-बार धर्म, कुल-मर्यादा और अंततः विनाश की चेतावनी देते हुए सीता को सम्मान पूर्वक लौटाने का आग्रह करते हैं। अंगद का प्रत्येक वाक्य नीति शास्त्र के गूढ़ सिद्धांतों से युक्त होता है , वे यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा क्षत्रिय-धर्म बल-प्रदर्शन में नहीं, अपितु सत्य और विवेकपूर्ण नीति में निहित होता है। रावण की सभा में उपस्थित मंत्रीगण अंगद के तर्कों से प्रभावित होकर मौन हो जाते हैं, जो रावण के अहंकार को और अधिक क्षुब्ध करता है।

इस संवाद के एक अन्य महत्त्वपूर्ण अंश में अंगद रावण को उसके स्वयं के कुल ,पुलस्त्य ऋषि की परंपरा ,का स्मरण कराते हुए यह प्रश्न करते हैं कि क्या ऋषि-कुल में जन्म लेकर पर स्त्री-हरण जैसा अधर्म शोभा देता है। यह तर्क रावण को विशेष रूप से आहत करता है, क्योंकि रावण स्वयं को महा ज्ञानी और शास्त्रों का प्रकांड पंडित मानता था। अंगद का यह कौशल कि वे शत्रु को उसी के ज्ञान और कुल-गौरव के आधार पर आत्म निरीक्षण के लिए विवश कर देते हैं, उनकी नीति निपुणता का सर्वोच्च प्रमाण है।

 चरण-प्रतिज्ञा ,रावण-सभा का सार्वजनिक अपमान=जब संवाद वाक्-युद्ध की चरम सीमा पर पहुँचता है, और रावण अंगद का अनादर करने का प्रयत्न करता है, तब अंगद अपना प्रसिद्ध चरण दृढ़ता पूर्वक भूमि पर रखकर एक अद्भुत प्रतिज्ञा करते हैं , यदि रावण की सभा में उपस्थित कोई भी वीर उनके इस चरण को तनिक भी हिला सके, तो संपूर्ण वानर-सेना बिना युद्ध किए वापस लौट जाएगी। यह चुनौती केवल शारीरिक बल की परीक्षा नहीं थी, अपितु रावण की संपूर्ण सभा के सम्मिलित सामर्थ्य और नैतिक साहस की भी परीक्षा थी।

एक-एक कर रावण के महाबली सेनापति, मंत्री और स्वयं उसका पुत्र मेघनाद तक अंगद के इस अडिग चरण को हिलाने का प्रयत्न करते हैं और असफल होकर लज्जित होते हैं। राम चरितमानस में तुलसीदास इस दृश्य को विशेष व्यंग्यात्मक तीव्रता के साथ प्रस्तुत करते हैं , प्रत्येक असफल प्रयास के साथ रावण की सभा में उपस्थित मौन और गहराता जाता है। अंततः रावण स्वयं क्रोधित होकर उठता है और चरण स्पर्श करने का प्रयत्न करता है , इस क्षण अंगद अत्यंत नीतिपूर्ण उपहास के साथ कहते हैं कि यदि रावण राम चरण का स्पर्श कर ले, तो यह उसके लिए चरण-वंदन के समान होगा, अतः उसे ऐसा नहीं करना चाहिए , यह वाक्य रावण को असमंजस में डाल देता है। अंगद का अडिग चरण उस क्षण का प्रतीक बना जब रावण की सभा में पहली बार सन्नाटा छाया , बल की भाषा तर्क के समक्ष निरुत्तर हो गई।

कम्ब रामावतारम् में इस प्रसंग को विशेष काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान की गई है, जहाँ तमिल परंपरा इस दृश्य को रावण के संपूर्ण साम्राज्य के मिथ्या गौरव के प्रतीकात्मक विघटन के रूप में प्रस्तुत करती है। यह घटना युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही रावण-पक्ष के मनोबल को गहरी चोट पहुँचाती है, जबकि वानर-सेना का मनोबल और अधिक दृढ़ हो जाता है। इस प्रतिज्ञा की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें अंगद ने संपूर्ण युद्ध के परिणाम को एक ही प्रतीकात्मक कसौटी पर टिका दिया , यह न केवल असाधारण आत्मविश्वास का प्रदर्शन था, अपितु एक सुविचारित मनोवैज्ञानिक रणनीति भी थी। यदि रावण-सभा का कोई भी वीर उनका चरण हिला पाता, तो वानर-सेना ,बिना युद्ध लौट जाती  किंतु अंगद को अपने बल और धर्म के बल पर यह पूर्ण विश्वास था कि ऐसा संभव नहीं होगा। यह प्रसंग दर्शाता है कि अंगद केवल एक उग्र योद्धा नहीं, अपितु एक सुदूरदर्शी रणनीतिकार भी थे, जो जानते थे कि किस प्रकार एक ही प्रतीकात्मक कृत्य से शत्रु-पक्ष के मनोबल को स्थायी रूप से क्षति पहुँचाई जा सकती है।

वैचारिक योद्धा के रूप में अंगद का महत्त्व=अंगद को 'प्रथम वैचारिक योद्धा' कहने का औचित्य इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने युद्धभूमि में अस्त्र उठाने से पूर्व ही, विशुद्ध बुद्धि, नीति और निर्भीक वाक्-कौशल के बल पर शत्रु-पक्ष के मनोबल और नैतिक आधार को विखंडित कर दिया। यह उपलब्धि किसी भी भौतिक युद्ध-विजय से कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी, क्योंकि युद्ध का वास्तविक निर्णय प्रायः रणभूमि में उतरने से पूर्व ही, पक्षों के नैतिक और मानसिक संतुलन में निहित होता है।अंगद के व्यक्तित्व में निम्नलिखित गुणों का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है, जो उन्हें एक आदर्श वैचारिक योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करता है:निर्भीकता अकेले शत्रु-राजधानी में प्रवेश कर, बिना किसी भय के अपना पक्ष रखना।

नीतिशास्त्र-निपुणता ,प्रत्येक तर्क को धर्मशास्त्र और राजनीति के सुदृढ़ आधार पर प्रस्तुत करना।वाक्-चातुर्य , रावण के उपहास का उत्तर तीक्ष्ण किंतु मर्यादित भाषा में देना।आत्म-संयम — पिता वालि के वधकर्ता राम के प्रति द्वेष त्यागकर धर्म का अनुसरण करना।कूटनीतिक साहस , चरण-प्रतिज्ञा जैसी अभूतपूर्व चुनौती के माध्यम से संपूर्ण शत्रु-सभा को एक साथ ललकारना।

न बलं क्षत्रधर्मस्य मूलं वाक्यं तु कारणम्। 

नयेन जितमप्येकं युद्धाज्जेतुं न शक्यते॥

क्षत्रधर्म का मूल केवल बल नहीं, अपितु सुनीति है। नीति से जीता हुआ कार्य युद्ध से भी अधिक स्थायी सिद्ध होता है।

नीतिशास्त्र-परंपरा (अंगद-चरित्र पर आधारित 

भारतीय इतिहास और महाकाव्य-परंपरा में दूत कर्म को सदैव अत्यंत गौरवपूर्ण किंतु जोखिमपूर्ण दायित्व माना गया है। महाभारत में श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर-सभा में शांति-दूत बनकर जाना इसी परंपरा का एक अन्य प्रसिद्ध उदाहरण है। अंगद और श्रीकृष्ण के दूत कर्म की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि दोनों ही प्रसंगों में दूत ने शत्रु-सभा में जाकर तर्क, नीति और निर्भीकता से अपने पक्ष को प्रस्तुत किया, तथा दोनों ही अवसरों पर संधि-प्रस्ताव अस्वीकृत होने पर युद्ध अंतिम और अपरिहार्य विकल्प के रूप में सामने आया। यह तुलना अंगद के दूत कर्म को भारतीय राजनीति-दर्शन की उस विस्तृत परंपरा में स्थापित करती है जिसमें युद्ध से पूर्व शांति का हर संभव प्रयास करना राजधर्म का अनिवार्य अंग माना गया है।


 आधुनिक भारत के लिए अंगद की प्रासंगिकता=

अंगद का चरित्र केवल प्राचीन काव्य का एक सुंदर प्रसंग मात्र नहीं है , वह आज के राष्ट्र-निर्माण की चेतना के लिए भी अत्यंत प्रेरक आदर्श प्रस्तुत करता है। किसी भी राष्ट्र अथवा संस्था की सुरक्षा केवल भौतिक शक्ति अथवा सैन्य-सामर्थ्य से ही सुनिश्चित नहीं होती, अपितु उसके प्रतिनिधियों के नैतिक साहस, तर्कशक्ति और कूटनीतिक कौशल से भी सुदृढ़ होती है। अंगद जैसा चरित्र यह स्मरण कराता है कि किसी भी विवाद अथवा संघर्ष में अंतिम विकल्प के रूप में बल का प्रयोग करने से पूर्व, संवाद, तर्क और नीति के माध्यम से समाधान का प्रयास करना ही श्रेष्ठ राजधर्म है — और जब यह प्रयास शत्रु द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाए, तभी युद्ध धर्मसंगत ठहरता है।

युवा पीढ़ी के लिए अंगद का चरित्र विशेष रूप से अनुकरणीय है , पिता की मृत्यु के प्रति द्वेष न रखकर धर्म का अनुसरण करना, वैभव और सिंहासन के मोह से ऊपर उठकर सेवा-भाव अपनाना, तथा संकटकाल में निर्भीकता और बुद्धि  दोनों का संतुलित प्रयोग करना, ये गुण किसी भी युग में प्रासंगिक रहेंगे। कौटिल्य का भारत दैनिक की दृष्टि में, जनकपुर से जगद्गुरु भारत @2047 की यात्रा में, ऐसे ही वैचारिक योद्धाओं की आवश्यकता है ,जो अपने राष्ट्र और सभ्यता के पक्ष को तर्क, नीति और निर्भीकता के साथ विश्व-मंच पर प्रस्तुत कर सकें। प्रत्येक युग को अपने अंगद की आवश्यकता होती है  ऐसे युवा जो शत्रु की सभा में भी निर्भय होकर सत्य कह सकें।

 परंपराओं में अंगद-चरित्र की तुलनात्मक झलक,परंपरा,अंगद-चरित्र पर विशिष्ट दृष्टिकोणवाल्मीकि रामायण,नीतिशास्त्र-निपुण दूत, तर्कपूर्ण संवाद, यथार्थवादी चित्रणरामचरितमानस (तुलसीदास)भक्ति व मर्यादा पर बल, धर्मोपदेशक स्वरूप, व्यंग्यात्मक तीव्रता,कम्ब रामावतारम् (तमिल)नाट्यात्मक तीव्रता, काव्यात्मक विस्तार, प्रतीकात्मक विघटन का चित्रण,आनंद रामायणअंगद के पूर्वजन्म व सेवा-निष्ठा से जुड़े सहायक प्रसंग

यह तुलनात्मक दृष्टि स्पष्ट करती है कि अंगद का चरित्र प्रत्येक परंपरा में एक समान महत्त्व के साथ प्रस्तुत हुआ है , भले ही शैली और विस्तार में भेद रहा हो। यह इस बात का प्रमाण है कि अंगद का वैचारिक पराक्रम रामकथा-परंपरा की समग्र चेतना में गहराई से अंकित है, न कि किसी एक ग्रंथ-विशेष की उपज मात्र है।

 युद्धभूमि में अंगद — वैचारिक विजय के पश्चात शौर्य=यह ध्यातव्य है कि अंगद केवल एक कूटनीतिक दूत ही नहीं थे , रावण-सभा से लौटने के पश्चात, जब युद्ध अपरिहार्य हो जाता है, तब वे रणभूमि में भी अत्यंत पराक्रमी योद्धा के रूप में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। युद्धकाण्ड में अंगद का उल्लेख अनेक अवसरों पर वीर योद्धा के रूप में मिलता है, जहाँ वे रावण-पक्ष के अनेक बलशाली योद्धाओं का सामना करते हैं। इस प्रकार अंगद का चरित्र इस तथ्य का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करता है कि वैचारिक साहस और शारीरिक पराक्रम परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर-पूरक गुण हैं , एक सच्चा योद्धा दोनों क्षेत्रों में समान रूप से निपुण हो सकता है।

युद्ध की समाप्ति और लंका-विजय के पश्चात भी अंगद राम की सेवा में सतत तत्पर रहते हैं, और अयोध्या-वापसी के अवसर पर उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त होता है। यह संपूर्ण जीवन-यात्रा , पिता के वध की पीड़ा से आरंभ होकर, राम के प्रति अटूट निष्ठा, रावण-सभा में वैचारिक विजय, और अंततः युद्धभूमि में शौर्य-प्रदर्शन तक , अंगद को रामकथा के सर्वाधिक बहुआयामी और प्रेरणादायी चरित्रों में से एक बनाती है।

यह भी स्मरणीय है कि अंगद का चरित्र किसी भी प्रकार के अहंकार से मुक्त रहा , अपनी असाधारण उपलब्धियों के बावजूद वे सदैव राम और सुग्रीव के प्रति विनम्र और आज्ञाकारी बने रहे। यह संतुलन,असाधारण क्षमता और साथ ही गहन विनम्रता का सहअस्तित्व , अंगद के चरित्र को और भी अधिक अनुकरणीय बनाता है। जहाँ रावण की अहंकारी प्रवृत्ति उसके पतन का कारण बनी, वहीं अंगद की विनम्रता-सहित-पराक्रम की प्रवृत्ति उन्हें रामकथा के सर्वाधिक सम्मानित चरित्रों में स्थान दिलाती है। अंगद का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सच्चा वीर वही है जो शब्दों में भी उतना ही निर्भीक हो जितना शस्त्रों में।



 समर्थ अंगद का शाश्वत संदेश,अंगद का चरित्र आज के युग के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक संदेश देता है। वे यह सिद्ध करते हैं कि वास्तविक शक्ति केवल शस्त्र-बल में नहीं, अपितु सत्य, नीति और निर्भीक वाक्-सामर्थ्य में भी निहित होती है। एक युवा राजकुमार, जो चाहे तो सिंहासन और वैभव में लीन हो सकता था, उसने राम के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखते हुए स्वयं को धर्म-रक्षा के सबसे कठिन और जोखिमपूर्ण कार्य के लिए समर्पित किया। शत्रु की सभा में अकेले खड़े होकर, बिना किसी भय के सत्य कहना, और अंततः अपनी बुद्धि तथा नीति से एक संपूर्ण साम्राज्य के अहंकार को हिला देना — यही अंगद को 'समर्थ' और 'श्रीराम सेना के प्रथम वैचारिक योद्धा' की उपाधि का सच्चा अधिकारी बनाता है।

सीतायण की दृष्टि में अंगद का यह प्रसंग उस व्यापक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है जो संपूर्ण रामकथा में बार-बार प्रकट होता है , कि धर्म की विजय अंततः बल से नहीं, अपितु सत्य, नीति और निर्भीक चरित्र से ही सुनिश्चित होती है। जनकपुर से जगद्गुरु भारत की उस दृष्टि के अनुरूप, अंगद जैसे चरित्र यह स्मरण कराते हैं कि राष्ट्र-रक्षा में वैचारिक साहस भौतिक शक्ति के समान ही अपरिहार्य है।


संदर्भ-ग्रंथ सूचीवाल्मीकि रामायण , किष्किंधाकाण्ड एवं युद्धकाण्ड,तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस — किष्किंधाकाण्ड एवं लंकाकाण्ड,कम्ब रामावतारम् (तमिल)  युद्धकाण्डम्आनंद रामायण — अंगद से संबंधित सहायक प्रसंग,








एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने