संपादकीय/कौटिल्य दृष्टि
कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना: राहुल का वर्चस्व या प्रियंका का राजनीतिक वनवास?
जिस कांग्रेस ने कभी इंदिरा गांधी जैसी लौह महिला नेता के दम पर देश की राजनीति की दिशा तय की थी, उसी कांग्रेस में आज प्रियंका गांधी जैसी जन स्वीकार्य नेता को राजनीतिक हाशिए पर बैठा दिया गया है। यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि कांग्रेस की निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न है। राहुल गांधी बीस वर्षों से कांग्रेस के केंद्र में हैं। परिणाम सबके सामने हैं—संगठन सिकुड़ा, राज्यों की सत्ता हाथ से निकली, विधायक आधे रह गए और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता गया। इसके बावजूद जवाबदेही तय नहीं होती। दूसरी ओर, प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश जैसे लगभग असंभव राजनीतिक रणक्षेत्र में भेजा गया, हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया और फिर बिना जिम्मेदारी के बैठा दिया गया। आखिर यह कैसी राजनीति है?
यदि प्रियंका गांधी में नेतृत्व क्षमता नहीं थी तो उन्हें आगे क्यों लाया गया? और यदि क्षमता थी तो आज उन्हें संगठन की कमान क्यों नहीं सौंपी जा रही? इसका अर्थ साफ है—कांग्रेस में योग्यता नहीं, दरबार की निकटता चलती है। दिग्विजय सिंह का बयान कांग्रेस के भीतर की सच्चाई उजागर करता है। वर्षों से गांधी परिवार की सेवा करने वाला नेता जब सार्वजनिक रूप से पूछने लगे कि प्रियंका को बड़ी जिम्मेदारी क्यों नहीं दी जा रही, तो समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस के भीतर असंतोष अब फुसफुसाहट नहीं, विद्रोह की दस्तक बन चुका है।
सबसे गंभीर प्रश्न राहुल गांधी के नेतृत्व पर है। क्या कांग्रेस एक पूर्णकालिक अध्यक्ष और पूर्णकालिक रणनीतिकार की हकदार नहीं? बार-बार विदेश यात्राएं, संगठन से दूरी और चुनावी पराजयों का लंबा सिलसिला क्या यही राष्ट्रीय दल के नेतृत्व की पहचान है? यदि परिणाम ही कसौटी है तो राहुल गांधी के नेतृत्व का राजनीतिक लेखा-जोखा बेहद निराशाजनक दिखाई देता है। विडंबना यह भी है कि भाजपा पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाली कांग्रेस स्वयं परिवार के भीतर ही क्षमता का सम्मान नहीं कर पा रही। जिस पार्टी में एक प्रभावशाली नेता को केवल इसलिए सीमित रखा जाए कि कहीं सत्ता का संतुलन न बदल जाए, वहां लोकतंत्र नहीं, दरबारी संस्कृति जीवित रहती है। आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट भाजपा नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व संकट है। पार्टी यह तय ही नहीं कर पा रही कि उसे चुनाव जिताने वाला संगठन चाहिए या केवल एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमता हुआ राजनीतिक तंत्र।
अंतिम प्रश्न देश भी पूछ रहा है—क्या कांग्रेस प्रियंका गांधी से डरती है, या राहुल गांधी के आसपास बैठे वे लोग डरते हैं जिनकी राजनीति प्रियंका के उभार से समाप्त हो जाएगी? यदि कांग्रेस इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजती, तो प्रियंका गांधी का राजनीतिक वनवास लंबा होगा और कांग्रेस का राजनीतिक वनवास उससे भी लंबा। यही आज की सबसे कड़वी सच्चाई है।
