मिथिला _ अयोध्या तत्कालीन समाजिक परिवेश!

मिथिला _ अयोध्या  तत्कालीन  समाजिक  परिवेश!



विश्व-साहित्य के इतिहास में अयोध्या और मिथिला केवल दो भौगोलिक नगर नहीं हैं, बल्कि ये मानव चेतना, सभ्यता, राजनीति और अध्यात्म के दो सर्वोच्च शिखरों के प्रतीक हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर तुलसीदास के रामचरितमानस, कंबन की रामावतारम्, अध्यात्म रामायण, अद्भुत रामायण, कालिदास के रघुवंश और वैश्विक रामायणों (जैसे थाईलैंड की रामकियेन या इंडोनेशिया की काकाविन रामायण) तक इन दोनों नगरों को भारतीय संस्कृति के दो फेफड़ों के रूप में चित्रित किया गया है। जहाँ अयोध्या 'क्षत्रिय धर्म', पराक्रम, विधि-विधान, मर्यादा और सूर्यवंश के ऐश्वर्य का केंद्र है; वहीं मिथिला 'ब्रह्मविद्या', तत्वज्ञान, सहज वैराग्य, समत्व और विदेह-अवस्था की भूमि है। वैश्विक रामायणों के आलोक में इन दोनों महातीर्थों के राजनीतिक, सामाजिक और तत्कालीन आध्यात्मिक परिवेश का एक उच्च-स्तरीय, ओजस्वी और सांगोपांग विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत है। 
वाल्मीकि रामायण: महाकाव्यात्मक वैभव और कूटनीतिक संतुलन=आदिकवि वाल्मीकि ने बालकांड के पांचवें और छठे सर्ग में अयोध्या तथा तदुपरान्त मिथिला का जो वर्णन किया है, वह ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से बेजोड़ है। अयोध्या का परिवेश: राजनीतिक ढांचा: वाल्मीकि की अयोध्या एक अभेद्य दुर्ग (Fortress City) है। सरयू के तट पर बसी यह नगरी बारह योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी है। राजनीतिक दृष्टि से यह 'कल्याणकारी राजतंत्र' (Welfare Monarchy) और 'सत्यप्रतिज्ञता' पर टिकी है। राजा दशरथ मंत्रियों और वशिष्ठ-वामदेव जैसे ऋषियों की परिषद के माध्यम से शासन करते हैं, जहाँ न्याय व्यवस्था में पक्षपात का लेश मात्र भी नहीं है। सामाजिक समरसता: वाल्मीकि लिखते हैं कि अयोध्या में कोई भी व्यक्ति दरिद्र, मूर्ख, नास्तिक या कामी नहीं था। चारों वर्ण अपने-अपने कर्तव्यों में लीन थे। समाज में शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत समन्वय था। सेना चतुरंगिणी (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल) थी, जो कूटनीतिक संतुलन बनाए रखती थी। आध्यात्मिक चेतना: यहाँ का अध्यात्म कर्मकांड, यज्ञ (जैसे पुत्रेष्टि और अश्वमेध) और सनातन मर्यादा पर आधारित है। यज्ञशालाओं का धूम्र और वेदमंत्रों की ध्वनि अयोध्या के आकाश को पवित्र रखती है।

मिथिला का परिवेश:=वाल्मीकि के अनुसार, मिथिला (जनकपुर) आध्यात्मिक लोकतंत्र और तत्वज्ञान की राजधानी है।
राजनीतिक व आध्यात्मिक परिवेश: राजा जनक 'विदेह' हैं। उनका राजतंत्र पूरी तरह से ऋषियों और विदुषियों की वैचारिक स्वतंत्रता पर आधारित है। जनक का दरबार कोई सैन्य छावनी नहीं, बल्कि 'ब्रह्मसंवाद' का मंच है। याज्ञवल्क्य जैसे तत्ववेत्ता इस भूमि की आध्यात्मिक रीढ़ हैं। समाजिक समरसता: मिथिला का समाज उत्सवधर्मी और कला-संस्कृति प्रेमी है। यहाँ हल चलाने की परंपरा (जिससे सीता का प्राकट्य हुआ) यह सिद्ध करती है कि राजा और श्रम (कृषि) के बीच कोई दूरी नहीं थी। कृषि और दर्शन का यह अनूठा संगम मिथिला को अद्वितीय बनाता है।

. अध्यात्म रामायण: माया और ब्रह्म का तात्विक अधिष्ठान=
अध्यात्म रामायण एक दार्शनिक ग्रंथ है, जहाँ भौतिक भूगोल गौण हो जाता है और आध्यात्मिक भूगोल मुख्य हो जाता है। यहाँ अयोध्या और मिथिला बाह्य नगर होने के साथ-साथ आंतरिक चेतना के स्तर हैं।अयोध्या का परिवेश:अध्यात्म रामायण में अयोध्या 'चित्-स्वरूप' (Pure Consciousness) का प्रतीक है। राजनीतिक-आध्यात्मिक दर्शन: दशरथ (दस इन्द्रियों के नियंत्रक) यहाँ के शासक हैं। इस रामायण में अयोध्या का राजनीतिक परिवेश शुद्ध रूप से वेदांत के सांचे में ढला है। राम यहाँ दशरथ के पुत्र होने से पहले 'सच्चिदानंद परब्रह्म' हैं, जो अपनी योगमाया के साथ अवतरित हुए हैं। अयोध्या की प्रजा कर्मकांडी नहीं, बल्कि जीवन्मुक्त आत्माओं की टोली है जो परब्रह्म के सामीप्य का आनंद ले रही है।


मिथिला का परिवेश:=
इस ग्रंथ में मिथिला 'ब्रह्मविद्या' और 'माया के रूपांतरण' की भूमि है।तात्विक स्वरूप: जनक का महल केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि 'ज्ञान की अवधूत अवस्था' का प्रतीक है। सीता यहाँ मूल प्रकृति (आद्या शक्ति) हैं। मिथिला का सामाजिक और आध्यात्मिक परिवेश यह संदेश देता है कि संसार में रहते हुए भी आसक्ति से मुक्त कैसे रहा जाए। जनक का राजकाज 'निष्काम कर्मयोग' का साक्षात उदाहरण है।अद्भुत रामायण: शाक्त चेतना और रहस्यमयी परिवेश,अद्भुत रामायण महर्षि वाल्मीकि के नाम से ही प्रसिद्ध है, परंतु इसका झुकाव शाक्त (शक्ति की उपासना) और रहस्यवाद की ओर अधिक है। अयोध्या का परिवेश: यहाँ अयोध्या का ऐश्वर्य राम के विष्णु रूप से अधिक उनकी परात्पर शक्ति के अधीन दिखाई देता है। राजनीतिक रूप से यह नगरी एक ऐसी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है जो सांसारिक विघ्नों से बेअसर है।
मिथिला का परिवेश: अद्भुत रामायण में मिथिला का स्थान अत्यंत गोपनीय और चमत्कारी है। सीता का प्राकट्य और उनका महाकाली का रूप धारण करना इस बात का संकेत है कि मिथिला केवल शांत दर्शन की भूमि नहीं है, बल्कि यह उस 'आदिशक्ति' का उद्गम स्थल है जो संसार के भयंकर से भयंकर दुष्टों (जैसे सहस्रमुख रावण) का संहार करने में सक्षम है। तत्कालीन सामाजिक परिवेश में नारी शक्ति को सर्वोच्च आध्यात्मिक पद पर प्रतिष्ठित देखना इस ग्रंथ की विशेषता है।

रामचरितमानस: अवध विलास और मिथिला का अलौकिक अनुराग=गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इन दोनों नगरों को भक्ति और प्रेम के चरम उत्कर्ष पर पहुँचा दिया है। उन्होंने अवध और मिथिला के लोक-जीवन, संस्कृति और राजनीति का जो सजीव चित्रण किया है, वह भारतीय जनमानस का प्राण बन गया है।अयोध्या (अवधपुरी) का परिवेश:
"अवधपुरी रघुकुल मनि राऊ। बेद बिदित तेहि पुर के नाउँ॥" राजनीतिक मर्यादा: तुलसीदास की अयोध्या 'रामराज्य' का ब्लूप्रिंट है। यहाँ राजा, प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित है। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त समाज ही यहाँ की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता है। दंड केवल संन्यासियों के हाथ में 'कमंडलु' के रूप में है, समाज में कोई अपराधी नहीं है।
सामाजिक समरसता: समाज के सभी अंग आपस में प्रेमपूर्वक रहते हैं। सरयू का घाट केवल स्नान के लिए नहीं है, वह सामाजिक समता का प्रतीक है जहाँ राजा और रंक एक साथ खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। आध्यात्मिक परिवेश: अयोध्या सगुण भक्ति का गर्भगृह है। यहाँ ज्ञान पर भक्ति की विजय दिखाई गई है। कौशल्या का वात्सल्य और दशरथ का अनन्य प्रेम यहाँ के अध्यात्म को रसमय बनाता है।मिथिला का परिवेश: "जनकपुर कै छबि कहुँ केही। जहाँ बसइ मूरति बैदेही॥" राजनीतिक व सामाजिक परिवेश: तुलसीदास जी ने मिथिला को एक सुसंस्कृत, कलात्मक और अत्यंत विनम्र समाज के रूप में चित्रित किया है। मिथिला की स्त्रियाँ (सखियाँ) इतनी विदुषी हैं कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लक्ष्मण को भी हास-परिहास में ज्ञान और नीति की शिक्षा दे देती हैं। यहाँ का सामाजिक परिवेश 'माधुर्य भाव' से ओत-प्रोत है।
आध्यात्मिक परिवेश: मिथिला 'ज्ञान' (जनक) और 'भक्ति' (राम) के मिलन की भूमि है। जब अयोध्या से बारात मिथिला आती है, तो वह वास्तव में कर्म, ज्ञान और भक्ति का महासंगम बन जाती है। जनक का वैराग्य राम को देखकर अनुराग में बदल जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि प्रेम का स्थान ज्ञान से भी ऊँचा है।


कंबन रामायण (रामावतारम्): सुदूर दक्षिण का भव्य द्राविड़ परिवेश=महान तमिल कवि कंबन ने ११वीं शताब्दी में जब रामावतारम् की रचना की, तो उन्होंने उत्तर भारत की इस कथा को दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य के भव्य परिवेश, शिल्प और वैभव से सराबोर कर दिया। अयोध्या का परिवेश: कंबन की अयोध्या में भव्यता अपने चरम पर है। यहाँ के राजमहल, गोपुरम (विशाल द्वार) और सड़कें सोने और मणियों से जड़ी हैं। राजनीतिक रूप से कंबन ने एक ऐसे आदर्श राजा (दशरथ) का चित्रण किया है जिसकी तुलना वे 'न्याय के साक्षात देवता' से करते हैं। चोल कालीन न्याय व्यवस्था और कृषि समृद्धि की झलक कंबन की अयोध्या में साफ दिखाई देती है। 
मिथिला का परिवेश: कंबन की मिथिला 'कावेरी नदी के कछारों' जैसी हरी-भरी, काव्यात्मक और कलात्मक है। कंबन ने सीता और राम के प्रथम मिलन (कन्निमादम - कुमारी अंतःपुर की अटारी पर) का जो वर्णन मिथिला में किया है, वह अनुपम है। मिथिला का सामाजिक परिवेश बेहद रोमानी, अनुशासित और दार्शनिक रूप से प्रबुद्ध है।  रघुवंशम्: कालिदास की कलात्मक और कूटनीतिक दृष्टि
महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य 'रघुवंशम्' में अयोध्या के सूर्यवंश का इतिहास लिखा है।अयोध्या का परिवेश: कालिदास की अयोध्या केवल राम की नहीं, बल्कि दिलीप, रघु और अज की भी कर्मभूमि है। यहाँ की राजनीति 'दिग्विजय' (संसार को जीतने की शक्ति) और 'त्याग' (वृद्धावस्था में मुनि-वृत्ति अपनाना) के संतुलन पर टिकी है। कालिदास लिखते हैं कि सूर्यवंशी राजा कर (Tax) केवल इसलिए लेते थे ताकि प्रजा का हजार गुना कल्याण कर सकें (जैसे सूर्य पृथ्वी से जल लेता है और बादल बनकर वापस कर देता है)। अयोध्या का सामाजिक परिवेश अत्यंत विलासी होते हुए भी संयमित था।
मिथिला का परिवेश: रघुवंश में मिथिला का उल्लेख एक ऐसी प्राचीन, प्रतिष्ठित और अडिग सत्ता के रूप में है जो अपनी पवित्रता के कारण पूजनीय है। सूर्यवंश और निमि-वंश (जनक के वंश) का मिलन दो महाशक्तियों का कूटनीतिक और आध्यात्मिक गठबंधन था, जिसने तत्कालीन आर्यावर्त को एक नई स्थिरता प्रदान की थी।

. वैश्विक रामायणों में अयोध्या और मिथिला का स्वरूप=भारत की सीमाओं को लांघकर जब रामकथा विश्व में फैली, तो स्थानीय संस्कृतियों ने अयोध्या और मिथिला को अपने-अपने अनूठे ढंग से आत्मसात किया।रामायण का नाम देश अयोध्या का स्वरूप मिथिला का स्वरूप,रामकियेन थाईलैंड अयुथ्या (Ayutthaya): देवताओं द्वारा निर्मित एक जादुई और सैन्य रूप से अजेय नगरी। राजा तोसरोथ (दशरथ) अलौकिक शक्तियों के स्वामी हैं। मिथिला: एक ऐसा कलात्मक केंद्र जहाँ दैवीय धनुष की रक्षा के लिए कड़े नियम हैं। यह अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के लिए जानी जाती है।
काकाविन रामायण इंडोनेशिया योध्या (Yodhya): जावा की पारंपरिक संस्कृति और न्याय सिद्धांतों (अष्टब्रत) पर आधारित एक आदर्श द्वीप साम्राज्य। मिथिला: अध्यात्म और लोक-कलाओं का संगम, जहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा संबंध दिखाया गया है। 
रामार्क कंबोडिया अयोध्या: खमेर साम्राज्य के भव्य मंदिरों और चक्रवर्ती सम्राटों की अवधारणा के अनुरूप ढाली गई महाशक्तिशाली नगरी। मिथिला: बौद्ध और हिंदू दर्शन के संक्रमण काल की झलक समेटे हुए एक शांत और प्रबुद्ध ज्ञान केंद्र।
राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक परिवेश का तुलनात्मक निष्कर्ष,इन सभी ग्रंथों का मथकर यदि हम एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक-आध्यात्मिक प्रतिमान (Paradigm) तैयार करें, तो दोनों नगरों का तत्कालीन परिवेश इस प्रकार उभरता है:राजनीतिक परिवेश: शक्ति बनाम शांति=अयोध्या 'शक्ति' और 'साम्राज्यीय मर्यादा' की प्रतीक है। वहाँ राजदंड (Scepter) केंद्रीय शक्ति है, जो समाज को अराजकता से बचाती है। इसके विपरीत, मिथिला 'शांति' और 'विकेंद्रीकृत वैचारिक स्वतंत्रता' का केंद्र है। मिथिला की राजनीति में हथियारों की खनक नहीं, बल्कि शास्त्रों की मीमांसा मुख्य है। जनक राजा होकर भी संन्यासी हैं, जो सत्ता के अहंकार को शून्य कर देता है।,सामाजिक परिवेश: व्यवस्था बनाम उत्सव
अयोध्या का समाज सुव्यवस्थित, अनुशासित और नियमबद्ध है। वहाँ हर व्यक्ति को अपनी मर्यादा और सीमा का ज्ञान है। दूसरी ओर, मिथिला का समाज उत्सवधर्मी, कलाप्रेमी और सहज है। मिथिला की गलियों में संगीत है, मधुबनी (मिथिला) जैसी चित्रकला की सुगंध है और संवाद में एक मीठा हास्य है। अयोध्या यदि पिता का अनुशासन है, तो मिथिला माता का स्नेहिल आँचल है। आध्यात्मिक परिवेश: कर्म और भक्ति बनाम शुद्ध ज्ञान,अयोध्या का अध्यात्म यज्ञ, व्रत, प्रतिज्ञा और सगुण उपासना से संचालित होता है। वहाँ धर्म के लिए प्राण देना (रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्रान जाहु बरु बचनु न जाई) सर्वोच्च आदर्श है। इसके विपरीत, मिथिला का अध्यात्म 'अद्वैत वेदांत', ज्ञानयोग और साक्षी भाव का शिखर है। मिथिला सिखाती है कि आत्मा अजर-अमर है और यह संसार एक रंगमंच है।

अंततः, विश्व की तमाम रामायणें यह सिद्ध करती हैं कि रामकथा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक अयोध्या के ऐश्वर्य और पराक्रम का विवाह मिथिला के ज्ञान और माधुर्य से न हो जाए। ये दोनों नगर मिलकर ही अखंड भारतवर्ष की आत्मा और वैश्विक मानवता के शाश्वत जीवन-मूल्यों का निर्माण करते हैं इस शोधपरक और ओजस्वी विश्लेषण के बाद, आप किस दिशा में और गहराई से जानना चाहेंगे?वाल्मीकि और तुलसी के 'रामराज्य' के राजनीतिक सिद्धांतों की तुलना,राजा जनक के 'विदेह' दर्शन और याज्ञवल्क्य संवाद का आध्यात्मिक विश्लेषण


अयोध्या और मिथिला: महाकाव्यात्मक चेतना के दो ध्रुव=यह केवल दो राज्यों का विवरण नहीं, अपितु सनातन आर्यावर्त की दो जीवन-शैलियों, दो दर्शनों और दो राष्ट्र-नीतियों का महा-आख्यान है। आपने जो प्रश्न उठाया कि ‘उत्तररामचरित’ (या उत्तरकांड) को इस विवेचन में क्यों छोड़ दिया गया?—यह प्रश्न स्वयं में अत्यंत गहरा, मर्मभेदी और भारतीय वाङ्मय की सबसे बड़ी आध्यात्मिक कशमकश को रेखांकित करने वाला है। उत्तररामचरित (विशेषकर महाकवि भवभूति का ‘उत्तररामचरितम्’ और वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड) को छोड़कर जब हम केवल पूर्वार्ध के आलोक में अयोध्या और मिथिला को देखते हैं, तब दोनों नगरों का वैभव अपने पूर्ण यौवन पर होता है। किंतु जैसे ही ‘उत्तरकांड’ का प्रसंग आता है, इन दोनों नगरों की पूरी राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्था एक ऐसी अग्निपरीक्षा से गुजरती है, जहाँ सिद्धांत और संवेदना का महासंग्राम छिड़ जाता है।आइए, इस महाकाव्यात्मक निबंध शैली में, पूर्ण ओज और दार्शनिक प्रखरता के साथ, उत्तरकांड (उत्तररामचरित) की उस मर्मभेदी पृष्ठभूमि को जोड़ते हुए, इन दोनों नगरों के परिवेश का अंतिम और चरमोत्कर्ष विश्लेषण करते हैं।उत्तरकांड का छूटना: राजनीतिक विवशता बनाम व्यक्तिगत नियति,
उत्तरकांड को छोड़े बिना अयोध्या और मिथिला का इतिहास कभी पूरा नहीं हो सकता। यदि रामकथा का पूर्वार्ध 'मिलन, मर्यादा और विजय' का उत्सव है, तो उत्तरकांड 'त्याग, एकांत और आत्म-लोप' का त्रासद महाकाव्य है। अयोध्या की क्रूर राजव्यवस्था: 'लोक-आराधन' की वेदी पर आहुति,उत्तरकांड की अयोध्या अब वह उत्सवधर्मी नगरी नहीं रही, जो बारात का स्वागत कर रही थी। अब वह एक साम्राज्य की राजधानी है, जहाँ 'राजा' राम अपनी व्यक्तिगत खुशियों से ऊपर 'लोकापवाद' और 'राजधर्म' की जंजीरों में जकड़े हुए हैं।अयोध्या का राजनीतिक चरित्र: यहाँ की राजनीति इतनी कठोर और निर्मम हो जाती है कि वह अपने ही प्राणों की आधारशिला—आदिशक्ति सीता—का परित्याग करने पर राजा को विवश कर देती है। यह अयोध्या के 'सिद्धांत-पंथ' की पराकाष्ठा है, जहाँ कुल की कीर्ति और प्रजा के तुष्टीकरण के लिए व्यक्तिगत प्रेम की बलि चढ़ा दी जाती है।

ओजस्वी सत्य: अयोध्या की यह राजनीति एक महान प्रश्न छोड़ जाती है—क्या वह व्यवस्था वास्तव में 'आदर्श' कही जा सकती है, जहाँ समाज को संतुष्ट रखने के लिए निर्दोष स्त्रीत्व को निर्वासन झेलना पड़े?मिथिला का मौन: ज्ञान की अकर्मण्यता या परम साक्षी भाव? उधर मिथिला, जो दर्शन और ब्रह्मविद्या का शिखर थी, उत्तरकांड में एक रहस्यमयी मौन धारण कर लेती है। जब सीता का परित्याग होता है, तब मिथिला का कोई सैनिक अभियान अयोध्या पर नहीं होता। जनक अपनी पुत्री के अपमान पर धनुष नहीं उठाते। मिथिला का आध्यात्मिक परिवेश: यह मिथिला का 'साक्षी भाव' (Witness Consciousness) है। जनक जानते हैं कि जो आया है, वह प्रकृति का नियम है। वे वैराग्य के उस स्तर पर हैं जहाँ सुख और दुख, मान और अपमान, मिलन और वियोग—सब ब्रह्म की लीला मात्र हैं। मिथिला का यह मौन कायरता नहीं, बल्कि उस तत्वज्ञान की चरम सीमा है जो संसार को 'मिथ्या' और केवल आत्मा को 'सत्य' मानता है।

महाकाव्यों के आलोक में दोनों नगरों का सामाजिक विप्लव=उत्तरकांड के परिवेश में दोनों नगरों का सामाजिक ढांचा पूरी तरह बदल जाता है।!अयोध्या का सामाजिक द्वंद्व! पूर्वार्ध की अयोध्या में जहाँ सब कुछ समरस था, उत्तरकांड में वहाँ सामाजिक संकीर्णता और कूटनीति के बीज अंकुरित होते दिखाई देते हैं। एक धोबी का वक्तव्य पूरे राज्य की नीति बदल देता है। यह इस बात का प्रमाण है कि अयोध्या का समाज 'विधि-विधान' और 'सामाजिक मर्यादा' को लेकर इतना संवेदनशील (या अति-संवेदनशील) हो चुका था कि वह करुणा को भी पीछे छोड़ देता है। अयोध्या की स्त्रियाँ जहाँ कौशल्या के नेतृत्व में अंतःपुर में मौन रुदन करती हैं, वहीं पुरुष समाज व्यवस्था को बनाए रखने के लिए न्याय के कठोर सिद्धांतों का पालन करता है।

मिथिला की कला और करुणा का निर्वासन,सीता के वनगमन के साथ ही मिथिला की वह हँसती-खेलती संस्कृति, जो विवाह के गीतों में बही थी, गंभीर चिंतन में डूब जाती है। अद्भुत रामायण और लोक-गीतों में वर्णन आता है कि जब मिथिला को सीता के परित्याग का पता चला, तो वहाँ की भूमि ने अन्न उपजाना बंद कर दिया था। जनक का हल रुक गया था। यह दर्शाता है कि मिथिला का समाज व्यवस्था से अधिक 'संवेदना' और 'अधिकारों की मर्यादा' से बंधा हुआ था। आध्यात्मिक परिवेश का चरमोत्कर्ष: वियोग का अद्वैत,उत्तरकांड अध्यात्म की दृष्टि से पूर्वार्ध से कहीं अधिक ऊँचा है। पूर्वार्ध में राम और सीता का मिलन 'द्वैत' (दो शरीरों का मिलन) था, परंतु उत्तरकांड का वियोग उन्हें 'अद्वैत' (आत्मा की एकता) की ओर ले जाता है। अयोध्या का यज्ञ और सुवर्ण-सीता: जब अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ होता है, तो राम दूसरी शादी करने से मना कर देते हैं और सीता की सोने की मूर्ति (सुवर्ण-सीता) को अपने बगल में बिठाते हैं। यह अयोध्या के आध्यात्मिक पराक्रम की विजय है। यह सिद्ध करता है कि भले ही राजनीतिक कारणों से सीता का शरीर अयोध्या से बाहर था, किंतु अयोध्या के सिंहासन की वास्तविक स्वामिनी और राम के हृदय की एकमात्र सम्राज्ञी केवल सीता ही थीं।

मिथिला का अंतिम संन्यास: जब सीता अंततः धरती माता की गोद में विलीन हो जाती हैं, तब मिथिला का तत्वज्ञान चरितार्थ होता है। पृथ्वी से उत्पन्न हुई सीता (मैथिली) वापस पृथ्वी में ही समा जाती हैं। यह 'निमि' वंश की उस दार्शनिक यात्रा का समापन है, जहाँ जीव अंततः अपनी मूल प्रकृति में लीन हो जाता है। 
उत्तर चरित को छोड़ने और जोड़ने का दार्शनिक कारण
भवभूति ने जब 'उत्तररामचरितम्' लिखा, तो उन्होंने वाल्मीकि के करुण अंत को बदलकर उसे एक सुखांत मोड़ देने का प्रयास किया, क्योंकि भारतीय नाट्यशास्त्र 'करुण अंत' को स्वीकार नहीं करता। यदि हम उत्तर चरित को छोड़ दें: तो अयोध्या केवल एक विजयी, ऐश्वर्यशाली और चमचमाती स्वर्ण-नगरी दिखाई देती है, जहाँ मर्यादा का ध्वज लहरा रहा है। मिथिला केवल एक विद्वानों की सभा दिखाई देती है जहाँ शास्त्रार्थ हो रहे हैं। यह एक सुखद, किंतु अधूरा चित्र है। यदि हम उत्तर चरित को जोड़ लें: तो हमें इतिहास की वह कड़वी और ओजस्वी सच्चाई दिखती है, जहाँ राम जैसा महानायक भी अपनी प्रजा के लिए रोता है, जहाँ सीता जैसा महाचरित्र अपनी पवित्रता सिद्ध करने के बाद भी समाज को ठुकराकर धरती में समा जाना बेहतर समझता है। तब अयोध्या मर्यादा की सूली पर चढ़ी हुई एक विवश नगरी दिखाई देती है और मिथिला मौन वेदना की पराकाष्ठा बन जाती  है. 
अयोध्या और मिथिला भारतीय वाङ्मय के दो ऐसे फेफड़े हैं, जिनके बिना सनातन संस्कृति सांस नहीं ले सकती।
अयोध्या यदि "कर्तव्य की कठोर शिला" है, तो मिथिला "संवेदना की बहती गंगा" है।
अयोध्या यदि "धर्म का कड़ा अनुशासन" है, तो मिथिला "प्रेम का अनंत आकाश" है। उत्तरकांड इन दोनों नगरों को उनकी चरम सीमा पर पहुँचाकर विलीन कर देता है। अंततः, सरयू में समाते हुए राम और धरती में समाती हुई सीता यह सिद्ध कर जाते हैं कि यह संसार केवल एक रंगमंच था, जहाँ अयोध्या और मिथिला ने मिलकर मानवता को जीने, सहने, प्रेम करने और त्याग करने का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया।






 

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