कहीं यह मौन, ओर लीपापोती, स्वयं में एक और अपराध बन जाए


राष्ट्रीय संपादकीय, कौटिल्य  दृष्टि 

मंदिर में चोरी नहीं, राष्ट्र के चरित्र का अपहरण,

श्री रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र में हुई आस्था की क्षति का लेखा-जोखाधन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया,

किन्तु चरित्र गया तो सब कुछ चला गया।

 

यह प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन का सार-वाक्य है, और आज अयोध्या के प्रसंग में यह पंक्ति किसी उपदेश की भाँति नहीं, वरन् एक चुभते हुए प्रश्न के रूप में हमारे सामने खड़ी है। जिस भूमि की प्रतीक्षा भारत ने पाँच शताब्दियों तक की, जिस मंदिर के निर्माण में करोड़ों श्रद्धालुओं का त्याग, तप और श्रद्धा-धन समाहित है, वहीं से उठी एक रिपोर्ट ने राष्ट्र के हृदय को झकझोर दिया है।व्यवस्था की चूक, या नियोजित उपेक्षा?पिछले महीनों में श्री रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र से जुड़ी जो जांच रिपोर्ट सामने आई, वह किसी सामान्य लेखा-अनियमितता की कथा नहीं है। विशेष जांच दल की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से जून 2026 के मध्य लगभग चालीस दिनों के सीसीटीवी अभिलेखों में गणना-कक्ष में कार्यरत कर्मचारियों को सत्तर से अधिक बार चढ़ावे की राशि में हेराफेरी करते हुए पकड़ा गया। ट्रस्ट और बैंक के मध्य निर्धारित मानक प्रक्रिया  अधिकारियों की संयुक्त उपस्थिति, कर्मचारियों की नियमित तलाशी, हुंडीवार पृथक अभिलेखन, मासिक रोटेशन — इन सभी व्यवस्थाओं का पालन शिथिल पड़ गया था। यह किसी एक क्षण की चूक नहीं, वरन् महीनों तक चली एक व्यवस्थागत उपेक्षा का परिणाम प्रतीत होती है।

चोरी नहीं, अपहरण,इसीलिए यह घटना केवल चोरी नहीं, अपहरण है  उस आस्था का अपहरण, जो करोड़ों भारतीयों ने वर्षों के संघर्ष और प्रतीक्षा के उपरांत श्रीराम जन्मभूमि को समर्पित की थी। दान-पात्र में गिरा एक-एक सिक्का किसी श्रद्धालु के विश्वास का प्रतीक होता है; जब वह सिक्का व्यवस्था की आँखों के सामने से चुराया जाता है, तो हानि केवल धातु की नहीं होती, उस विश्वास की होती है जो इस राष्ट्र ने अत्यंत कठिन प्रतीक्षा-काल के बाद पुनः अर्जित किया था।रक्षक ही भक्षक  नए युग के खर-दूषण,रामायण के दण्डकारण्य-प्रसंग को स्मरण कीजिए। खर और दूषण किसी बाहरी शत्रु के भेजे हुए आक्रांता नहीं थे — वे उसी वन-क्षेत्र में स्थापित होकर उसकी रखवाली के दंभ में उत्पात मचाते रहे, जब तक स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम को उनका संहार करने के लिए हाथ में धनुष नहीं उठाना पड़ा। आज अयोध्या में जो हुआ, वह इसी कथा की एक कड़वी पुनरावृत्ति है। जो हाथ रामलला की रखवाली के लिए बढ़े थे, वे ही हाथ उस दान-राशि को हड़पने में लिप्त पाए गए जो श्रद्धालुओं ने उसी रखवाली के भरोसे अर्पित की थी। रामभक्ति का आवरण ओढ़कर भीतर बैठे इन खर-दूषणों ने न बाहर से हमला किया, न तलवार उठाई — इन्होंने विश्वास को भीतर से खोखला किया, जो किसी भी आक्रमण से अधिक घातक है।

यह कोई सामान्य लापरवाही नहीं, राष्ट्र की आस्था के साथ किया गया विश्वासघात है, और विश्वासघात को कोई भी सभ्यता क्षमा नहीं करती। जिन्होंने रामजन्मभूमि के नाम पर स्वयं को “सेवक” कहा, वे स्वामी बनकर बैठ गए; जिन्हें प्रहरी नियुक्त किया गया, वे स्वयं सेंधमार बन गए। यह पाखंड, यह दोहरा चरित्र  रामराज्य की उस मूल भावना पर सीधा प्रहार है, जिसमें प्रजा का एक-एक विश्वास राजा के लिए त्रिकालाबाधित उत्तरदायित्व माना जाता था। आज प्रश्न केवल यह नहीं कि धन कहाँ गया — प्रश्न यह है कि जिन कंधों पर मर्यादा की रक्षा का भार था, वे कंधे इतने कमजोर या इतने लोभी कैसे पड़ गए?धन की भरपाई सम्भव, चरित्र की क्षति का उत्तरदायी कौन?मुद्रित हो, प्रसारित हो अथवा सामाजिक माध्यम — सभी दोषियों को दंड दिलाने की बात कर रहे हैं, और यह उचित भी है, परन्तु पर्याप्त नहीं। दंड चोरों को मिले, यह न्याय की न्यूनतम अपेक्षा है; किन्तु प्रश्न इससे कहीं आगे का है। धन की क्षति की भरपाई तो लेखा-बही से हो सकती है, परन्तु जो क्षति राष्ट्र के सामूहिक चरित्र और सार्वजनिक विश्वास को पहुँची है, उसका क्षतिपूर्ति-कर्म कौन करेगा? यहाँ किसी व्यक्ति-विशेष का नाम लेना उचित नहीं, क्योंकि मूल प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं  उस समूची पर्यवेक्षण-व्यवस्था का है जिसे सजग प्रहरी की भूमिका निभानी थी और जो अपने दायित्व में शिथिल पड़ गई। किन्तु इतना अवश्य कहा जाना चाहिए: जो भी इस षड्यंत्र में सम्मिलित पाया जाए, चाहे वह पद कितना भी ऊँचा क्यों न हो, उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई ही रामराज्य के प्रति सच्ची निष्ठा होगी। नरम रवैया, लीपापोती अथवा पद की आड़ में बचाव — यह सब स्वयं में एक और अपराध है।मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को कभी लंका के स्वर्ण-भवनों का लोभ नहीं रहा। लंका सोने की थी, यह जानते हुए भी उन्होंने उसे राख नहीं बनाया क्योंकि उनका लक्ष्य स्वर्ण नहीं, धर्म था। लंका दहन के लिए तो उन्हें केवल एक हनुमान चाहिए था  निष्काम, निर्भीक, सदा सजग, जिसकी भक्ति में लोभ की एक बूँद भी न हो। आज श्रीराम जन्मभूमि को भी ठीक उसी सजगता के प्रहरियों की आवश्यकता है , ऐसे हनुमान की, जो चढ़ावे की थैली को भी उतनी ही निगरानी से देखे जितनी वह स्वयं रामलला की मूर्ति को देखता है। जब तक ऐसा सजग प्रहरी हर द्वार पर खड़ा नहीं होगा, तब तक हर कुछ महीने में एक नया खर-दूषण जन्म लेता रहेगा।रामराज्य का मूल तत्त्व , सुशासन, वैभव नहीं,समय की मांग है कि जांच केवल दोषियों की पहचान तक सीमित न रहे; पारदर्शी अंकेक्षण-प्रणाली, प्रौद्योगिकी-आधारित निरंतर निगरानी और उत्तरदायित्व की स्पष्ट श्रृंखला स्थापित हो, ताकि आस्था का यह केंद्र भविष्य में पुनः संदेह की छाया में न आए। रामराज्य की जो कल्पना इस राष्ट्र ने सदियों तक संजोई, उसका मूल तत्त्व सुशासन और उत्तरदायित्व ही था  स्वर्ण-वैभव नहीं।राष्ट्र अब लीपापोती नहीं, निर्भय जांच और दृश्य दंड चाहता है। जिस दिन दोषी  चाहे वह कितने ही बड़े पद पर क्यों न बैठा हो खुले रूप से दंडित होता दिखेगा, उसी दिन जनता का टूटा विश्वास फिर से जुड़ना आरंभ करेगा। अन्यथा यह मौन, यह लीपापोती, स्वयं में एक और अपराध बन जाएगी  उस श्रीराम के नाम पर, जिसने स्वयं अपने प्रिय भाई तक को न्याय-तुला पर तौलने में संकोच नहीं किया था।आस्था अर्जित करने में शताब्दियाँ लगती हैं, गंवाने में क्षण भर।इस क्षण को सजगता से थाम लेना ही अयोध्या के प्रति राष्ट्र का वास्तविक ऋण-चुकौता होगआचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः। आचारः परमं ज्ञानम् आचारात् किं न साध्यते॥भारतीय सुभाषित-परंपरा) आचरण ही सर्वोच्च धर्म है, आचरण ही सर्वोच्च तप है, आचरण ही सर्वोच्च ज्ञान है आचरण से भला क्या साध्य नहीं हो सकता?



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