राम के मंदिर पर लगा कलंक: आस्था नहीं, जवाबदेही कठघरे में है
— कौटिल्य दृष्टि
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण केवल एक भव्य स्थापत्य का निर्माण नहीं था, बल्कि पाँच शताब्दियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों हिंदुओं की आस्था की विजय का प्रतीक था। ऐसे मंदिर में यदि चोरी की घटना घटती है, तो यह मात्र आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर लगा गंभीर प्रश्नचिह्न है। यह घटना किसी दल, संगठन या सरकार से पहले उस विश्वास को चोट पहुँचाती है, जिसके कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए अयोध्या पहुँचते हैं। लगभग एक माह तक मौन रहने के बाद जब मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने इसे "कलंक" कहा, तो उन्होंने वस्तुतः उस पीड़ा को स्वर दिया जिसे करोड़ों रामभक्त अनुभव कर रहे हैं। किंतु प्रश्न यह है कि यदि यह वास्तव में कलंक है, तो इस कलंक का उत्तरदायित्व कौन स्वीकार करेगा? क्या केवल बयान देकर कर्तव्य पूरा हो जाएगा? क्या किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही का स्थान केवल संवेदना व्यक्त करने तक सीमित हो सकता है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने घटना की निंदा करते हुए यह भी कहा कि हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ इस घटना का दुरुपयोग कर रही हैं। यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से ऐसे तत्वों का पर्दाफाश होना चाहिए। किंतु उससे भी पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन्हें अवसर मिला कैसे? षड्यंत्र तभी सफल होता है जब व्यवस्था में कहीं न कहीं कमजोरी होती है। इसलिए पहला दायित्व उस कमजोरी की पहचान और उसके निराकरण का है। कौटिल्य ने 'अर्थशास्त्र' में स्पष्ट कहा है— "राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका अनुशासन और उत्तरदायित्व है। जहाँ अधिकारी अपने दायित्व से विमुख होते हैं, वहाँ शत्रु बिना युद्ध के भी विजय प्राप्त कर लेता है।"
राम मंदिर ट्रस्ट और उससे जुड़े सभी उत्तरदायी व्यक्तियों को यह समझना होगा कि वे किसी सामान्य संस्था का संचालन नहीं कर रहे हैं। वे भारत की सांस्कृतिक चेतना के सबसे पवित्र केंद्र के संरक्षक हैं। इसलिए उनसे सामान्य नहीं, बल्कि सर्वोच्च स्तर की पारदर्शिता, सतर्कता और उत्तरदायित्व की अपेक्षा की जाती है।सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि चोरी हुई; चिंता यह है कि यदि व्यवस्था अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच करेगी तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति कैसे रुकेगी? इतिहास साक्षी है कि साम्राज्य बाहरी आक्रमणों से कम और आंतरिक शिथिलता से अधिक टूटे हैं।
श्रीराम ने अपने जीवन से सिखाया कि मर्यादा का अर्थ उत्तरदायित्व है। उन्होंने स्वयं पर सबसे कठोर नियम लागू किए। यदि रामराज्य की बात की जाती है, तो राम की मर्यादा भी स्वीकार करनी होगी। राम के नाम पर जनसमर्थन लेना सरल है, किंतु राम के आदर्शों के अनुरूप प्रशासन चलाना कहीं अधिक कठिन है।यह भी उतना ही सत्य है कि इस विषय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। विपक्ष यदि बिना प्रमाण पूरे मंदिर प्रबंधन को कठघरे में खड़ा करता है तो वह भी अनुचित है। उसी प्रकार सत्ता पक्ष यदि हर प्रश्न को विरोधियों का षड्यंत्र बताकर टालना चाहता है तो वह भी लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से विमुख होगा। सत्य किसी दल का नहीं होता; सत्य केवल सत्य होता है।
आज आवश्यकता किसी की छवि बचाने की नहीं, बल्कि श्रीराम मंदिर की गरिमा बचाने की है। दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे दंड मिलना चाहिए। यदि सुरक्षा व्यवस्था में कमी है तो उसे तत्काल सुधारा जाना चाहिए। यदि प्रशासनिक लापरवाही हुई है तो उसकी जवाबदेही निश्चित होनी चाहिए। यही राम के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।
कौटिल्य दृष्टि का स्पष्ट मत है—
"आस्था का सबसे बड़ा शत्रु आलोचना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व से पलायन है। सत्ता की प्रतिष्ठा प्रचार से नहीं, पारदर्शिता से बनती है। जो व्यवस्था अपनी भूल स्वीकार कर उसे सुधारती है, वही दीर्घकाल तक सम्मान पाती है; जो भूलों पर पर्दा डालती है, इतिहास उसके गौरव से अधिक उसकी विफलताओं को याद रखता है।"श्रीराम मंदिर भारत की आत्मा है। उसकी सुरक्षा, उसकी पवित्रता और उसके प्रशासन पर उठे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर तथ्यों, पारदर्शिता और न्याय से दिया जाना चाहिए। क्योंकि राम का मंदिर केवल पत्थरों से नहीं, करोड़ों लोगों के विश्वास से बना है और विश्वास की रक्षा ही किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।