सीता — पृथ्वी की पुत्री,पौराणिक, लौकिक एवं शास्त्रीय बृहद व्याख्यान
वैदिक क्षेत्रपति सूक्त और वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वर्णित सीता के भूमिजा-स्वरूप की चर्चा पूर्व में की जा चुकी है किस प्रकार हल की रेखा से प्रकट हुई कन्या का नाम ही उनके पार्थिव उद्गम का प्रमाण बना, और कैसे 'भूमिजा', 'वसुधासुता', 'जानकी' ये तीनों नाम एक ही सत्य के तीन आयाम हैं। यह विषय इतना व्यापक है कि इसे केवल वैदिक-रामायण साक्ष्य तक सीमित रखना अपर्याप्त होगा। सीता का भूमि-सम्बन्ध भारतीय चेतना की तीन समानांतर धाराओं में प्रवाहित होता है — पुराणों के दार्शनिक-आध्यात्मिक विवेचन में, जनमानस की लोक-परम्परा में, और संस्कृत-भाषेतर शास्त्रीय काव्यों में। इन तीनों धाराओं का समन्वित अनुशीलन ही सीता के वास्तविक स्वरूप — आदि शक्ति और वसुंधरा के अभिन्न रूप — को पूर्णता में प्रकट करता है।
पौराणिक साक्ष्य=देवीभागवत पुराण — प्रकृति के अष्टम रूप में सीता; देवीभागवत पुराण की परम्परा आदि शक्ति को नौ अथवा अष्ट रूपों में प्रकट मानती है, जिनमें राम-पत्नी सीता को प्रकृति के एक विशिष्ट रूप के रूप में स्वीकार किया गया है। इस दृष्टि से सीता केवल जनकनन्दिनी मात्र नहीं, अपितु स्वयं मूल प्रकृति का पार्थिव-सत्तात्मक अवतरण हैं — वह शक्ति जो सृष्टि और भूमि दोनों को धारण करती है। यह अवधारणा सीता के भूमिजा-स्वरूप को दार्शनिक आधार प्रदान करती है : जो सृष्टि की मूल शक्ति है, वही धरती के रूप में प्रकट होकर पुनः धरती की पुत्री के रूप में अवतीर्ण होती है — सृष्टा और सृष्टि का यह चक्रीय ऐक्य पौराणिक चिन्तन की विशेषता है।
अद्भुत रामायण = काली-रूपा सीता और भूमि की संहारक शक्ति;अद्भुत रामायण का सहस्रमुख रावण-वध प्रसंग इस भूमि-शक्ति सम्बन्ध को उग्रतम रूप में प्रस्तुत करता है। जब राम सहस्रमुख रावण के समक्ष असमर्थ हो जाते हैं, तब सीता स्वयं काली का रूप धारण कर उस असुर का संहार करती हैं। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि भूमिजा सीता में केवल सहनशीलता और क्षमा ही नहीं, अपितु प्रलयंकारी शक्ति भी अन्तर्निहित है — ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी भूकम्प, ज्वालामुखी और प्रलय जैसी संहारक शक्तियों को भी अपने भीतर धारण करती है। सीता का यह काली-रूप उनके वसुधा-स्वरूप का ही प्रलयकारी पक्ष है सह्यता और संहार, दोनों एक ही भूमि-तत्व की अभिव्यक्तियाँ हैं।
भुवनेश्वरी और दशमहाविद्या-परम्परा=शाक्त पुराण-परम्परा में दस महाविद्याओं में एक भुवनेश्वरी हैं वह शक्ति जो सम्पूर्ण भुवन (लोक-पृथ्वी) की स्वामिनी और आधार हैं। यद्यपि सीता को प्रत्यक्षतः भुवनेश्वरी के रूप में नहीं गिना जाता, तथापि शाक्त चिन्तकों ने सदा यह संकेत किया है कि जो शक्तियाँ भूमि, सृष्टि और आधार-तत्व से सम्बद्ध हैं, वे परस्पर एक ही आदि शक्ति के विविध रूप हैं। इस दृष्टि से सीता का वसुधासुता-स्वरूप शाक्त परम्परा की उसी व्यापक भूमि-शक्ति चेतना का रामायण-सन्दर्भित प्रकटीकरण माना जा सकता है।
मिथिला के लोकगीतों में भूमिजा सीता=मिथिलांचल के पारम्परिक विवाह-गीतों और सोहर गीतों में सीता को बार-बार 'धरती की बेटी' के रूप में स्मरण किया जाता है। हल जोतते समय कन्या के प्रकट होने की कथा मैथिल लोक-चेतना में इतनी गहरी है कि आज भी खेत जोतने के पूर्व कृषक समुदाय के अनेक परिवारों में भूमि-पूजन करते समय सीता का नामोच्चार करने की परम्परा लोक-मान्यता के रूप में जीवित है। यह लोक-स्मृति शास्त्रीय ग्रन्थों से पूर्व की भी हो सकती है, क्योंकि मौखिक परम्पराएँ प्रायः लिखित शास्त्र से अधिक प्राचीन होती हैं।
सीता नवमी और कृषि-चक्र का सम्बन्ध=सीता का प्राकट्य-पर्व 'सीता नवमी' वैशाख शुक्ल नवमी को मनाया जाता है — यह वह समय है जब उत्तर भारत के अधिकांश भागों में रबी की फसल कट चुकी होती है और खेत नई बुवाई के लिए तैयार किए जाते हैं। लोक-मान्यता में इस पर्व और कृषि-चक्र के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध देखा जाता है — सीता का जन्म-पर्व मानो भूमि की उर्वरता और नवीकरण का स्मरण-पर्व बन जाता है। ग्रामीण अंचलों में इस दिन भूमि-पूजन, हल-पूजन और अन्न-दान की परम्पराएँ आज भी अनेक स्थानों पर प्रचलित हैं, यद्यपि इनका स्वरूप क्षेत्र-भेद से भिन्न-भिन्न है।
कुलदेवी और ग्राम-देवी रूप में सीता=अवध और मिथिला के अनेक ग्रामों में सीता को कुलदेवी अथवा ग्राम-देवी के रूप में पूजने की परम्परा है, जो प्रायः स्थानीय शक्ति-पूजा की प्राचीन परतों से जुड़ी हुई प्रतीत होती है — यह विषय पूर्व में गिरिजा/गौरी कुलदेवी प्रसंग में विस्तार से चर्चित किया जा चुका है। यह लोक-आराधना इस बात का प्रमाण है कि सीता का भूमि-सम्बन्ध केवल शास्त्रीय कथा-तत्व नहीं, अपितु जनमानस के जीवन्त आस्था-व्यवहार का अंग है।
लोक-परम्परा प्रायः वह जीवित स्मृति होती है जो शास्त्र के लिखे जाने से पहले भी विद्यमान रहती है, और लिखे जाने के पश्चात् भी उससे स्वतंत्र प्रवाहित होती रहती है — सीता की भूमि-कथा इसी लोक-स्मृति और शास्त्र-स्मृति के संगम का दृष्टान्त है।
वाल्मीकि रामायण का पुनःस्मरण=वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वर्णित हलरेखा-प्राकट्य की कथा इस सम्पूर्ण परम्परा का मूल आधार-स्तम्भ है, जिसकी चर्चा पूर्व में सप्रमाण की जा चुकी है। शास्त्रीय परम्परा में आगे चलकर अन्य कवियों और आचार्यों ने इसी भूमिजा-भाव को अपनी-अपनी भाषा और शैली में विस्तार दिया।
तुलसीदास — रामचरितमानस में जगज्जननी जानकी=जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड (मंगलाचरण)गोस्वामी तुलसीदास सुन्दरकाण्ड के आरम्भ में ही सीता को 'जग जननी' अर्थात् समस्त जगत् की जननी कहकर सम्बोधित करते हैं — यह सम्बोधन उन्हें केवल जनक की पुत्री तक सीमित नहीं रखता, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि की मातृशक्ति के पद पर प्रतिष्ठित करता है। भूमिजा और जग-जननी — ये दोनों विशेषण मिलकर सीता के उस स्वरूप को उद्घाटित करते हैं जिसमें पार्थिव उद्गम और सार्वभौमिक मातृत्व एक साथ समाहित हैं।
कम्ब रामायण — तमिल परम्परा में 'नीलादेवी'
तमिल कवि कम्बन कृत 'रामावतारम्' में भी सीता के भूमि-प्राकट्य की कथा वाल्मीकि-परम्परा के अनुरूप वर्णित है, और तमिल भक्ति-परम्परा में सीता को भूदेवी अथवा नीलादेवी (धरा की अधिष्ठात्री) से सम्बद्ध रूप में स्मरण किया जाता है। दक्षिण भारतीय वैष्णव परम्परा में भूदेवी और श्रीदेवी विष्णु की दो पत्नियों के रूप में प्रतिष्ठित हैं, और सीता को भूदेवी के भूतल-अवतरण के रूप में देखने की यह दृष्टि उत्तर भारतीय भूमिजा-अवधारणा से गहरा सामंजस्य रखती है — भिन्न भाषा और भिन्न क्षेत्र होते हुए भी मूल भाव में अद्भुत एकता है।
अध्यात्म रामायण =प्रकृति और माया के रूप में सीता
अध्यात्म रामायण में राम को साक्षात् परब्रह्म और सीता को उनकी माया अथवा प्रकृति-शक्ति के रूप में दार्शनिक व्याख्या दी गई है। इस दृष्टि से सीता का भूमि से सम्बन्ध केवल कथा-तत्व नहीं, अपितु सांख्य-वेदान्त दर्शन की प्रकृति-पुरुष अवधारणा का रामायण-रूपान्तरण है — पुरुष (राम) चेतन तत्व हैं और प्रकृति (सीता) वह मूल शक्ति जिससे सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि, अर्थात् भूमि सहित समस्त जड़-चेतन जगत्, प्रकट होता है। इसी कारण सीता का पृथ्वी से तादात्म्य दार्शनिक दृष्टि से अनिवार्य और स्वाभाविक सिद्ध होता है।
पौराणिक, लौकिक और शास्त्रीय — ये तीनों धाराएँ भिन्न-भिन्न मार्गों से एक ही सत्य की ओर संकेत करती हैं : सीता का भूमिजा-स्वरूप कोई आकस्मिक कथा-प्रसंग नहीं, अपितु भारतीय चेतना की गहनतम सांस्कृतिक स्मृति है। पुराण उन्हें प्रकृति और शक्ति के दार्शनिक धरातल पर प्रतिष्ठित करते हैं, लोक-परम्परा उन्हें प्रतिदिन के कृषि-जीवन और आस्था-व्यवहार में जीवन्त रखती है, और शास्त्रीय काव्य-परम्परा — चाहे वह अवधी हो या तमिल — उन्हें जग-जननी और भूदेवी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह त्रिविध समन्वय ही सीतायण की उस मूल दृष्टि की पुष्टि करता है जिसमें सीता को निष्क्रिय पात्र नहीं, अपितु सचेतन, समर्थ आदि शक्ति और वसुंधरा के अभिन्न स्वरूप में देखा गया है।जो भूमि है, वही जानकी है — और जो जानकी हैं, वही आदि शक्ति हैं। सृष्टि, सहनशीलता और संहार — तीनों का यह त्रिविध ऐक्य ही सीता के वसुधासुता-स्वरूप का सम्पूर्ण रहस्य है।
राजेन्द्र नाथ तिवारी