बिजली अब सुविधा नहीं, जीवन का आधार है—फिर इसे कानूनी संरक्षण क्यों नहीं?
राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001
आज भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्मार्ट शहरों, ऑनलाइन शिक्षा, आधुनिक चिकित्सा और औद्योगिक विकास की बात करता है। इन सबकी आत्मा बिजली है। बिजली के बिना अस्पतालों की मशीनें रुक जाती हैं, किसानों की सिंचाई ठप हो जाती है, उद्योग बंद हो जाते हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि बिजली को आज भी 'आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955' के अंतर्गत आवश्यक वस्तु का दर्जा प्राप्त नहीं है।
बिजली का संचालन विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत होता है, जो उत्पादन, वितरण और नियमन की व्यवस्था तो करता है, लेकिन आम नागरिक को निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराने की जवाबदेही को उसी कठोरता से लागू नहीं करता, जैसी आवश्यक वस्तुओं के मामले में देखने को मिलती है। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में अघोषित कटौती, लो-वोल्टेज, खराब आपूर्ति और बार-बार होने वाले फॉल्ट आम नागरिक की नियति बन गए हैं।
आज प्रश्न यह है कि जब भोजन, पानी और दवा जीवन के लिए आवश्यक हैं, तो बिजली क्यों नहीं? क्या आधुनिक जीवन में बिजली के बिना नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का प्रभावी उपयोग कर सकता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
अब समय आ गया है कि संसद और सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। यदि बिजली को आवश्यक वस्तु के रूप में शामिल करना संभव न हो, तो कम-से-कम ऐसा कठोर कानूनी ढांचा बनाया जाए, जिसमें अनावश्यक विद्युत कटौती, लापरवाही और आपूर्ति में विफलता के लिए अधिकारियों और वितरण कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो तथा उपभोक्ताओं को क्षतिपूर्ति का अधिकार मिले।
21वीं सदी का भारत केवल बिजली पैदा करने से विकसित नहीं बनेगा, बल्कि हर नागरिक तक निर्बाध, गुणवत्तापूर्ण और उत्तरदायी बिजली पहुंचाने से विकसित बनेगा। बिजली अब विलासिता नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, उद्योग और सम्मानजनक जीवन का आधार है। इसलिए अब यह बहस टालने की नहीं, बल्कि निर्णायक नीति बनाने की है।
सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि आज के भारत में बिजली केवल एक सेवा नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। जब राष्ट्र की प्रगति का हर पहिया बिजली से चलता है, तो उसके संरक्षण और निर्बाध उपलब्धता के लिए भी कानून उतने ही मजबूत होने चाहिए, जितने किसी अन्य जीवनोपयोगी व्यवस्था के लिए
बस्ती से राजेंद्र नाथ तिवारी, 272001
आज भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्मार्ट शहरों, ऑनलाइन शिक्षा, आधुनिक चिकित्सा और औद्योगिक विकास की बात करता है। इन सबकी आत्मा बिजली है। बिजली के बिना अस्पतालों की मशीनें रुक जाती हैं, किसानों की सिंचाई ठप हो जाती है, उद्योग बंद हो जाते हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि बिजली को आज भी 'आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955' के अंतर्गत आवश्यक वस्तु का दर्जा प्राप्त नहीं है।बिजली का संचालन विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत होता है, जो उत्पादन, वितरण और नियमन की व्यवस्था तो करता है, लेकिन आम नागरिक को निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराने की जवाबदेही को उसी कठोरता से लागू नहीं करता, जैसी आवश्यक वस्तुओं के मामले में देखने को मिलती है। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में अघोषित कटौती, लो-वोल्टेज, खराब आपूर्ति और बार-बार होने वाले फॉल्ट आम नागरिक की नियति बन गए हैं।आज प्रश्न यह है कि जब भोजन, पानी और दवा जीवन के लिए आवश्यक हैं, तो बिजली क्यों नहीं? क्या आधुनिक जीवन में बिजली के बिना नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का प्रभावी उपयोग कर सकता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
अब समय आ गया है कि संसद और सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। यदि बिजली को आवश्यक वस्तु के रूप में शामिल करना संभव न हो, तो कम-से-कम ऐसा कठोर कानूनी ढांचा बनाया जाए, जिसमें अनावश्यक विद्युत कटौती, लापरवाही और आपूर्ति में विफलता के लिए अधिकारियों और वितरण कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो तथा उपभोक्ताओं को क्षतिपूर्ति का अधिकार मिले।21वीं सदी का भारत केवल बिजली पैदा करने से विकसित नहीं बनेगा, बल्कि हर नागरिक तक निर्बाध, गुणवत्तापूर्ण और उत्तरदायी बिजली पहुंचाने से विकसित बनेगा। बिजली अब विलासिता नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, उद्योग और सम्मानजनक जीवन का आधार है। इसलिए अब यह बहस टालने की नहीं, बल्कि निर्णायक नीति बनाने की है।सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि आज के भारत में बिजली केवल एक सेवा नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। जब राष्ट्र की प्रगति का हर पहिया बिजली से चलता है, तो उसके संरक्षण और निर्बाध उपलब्धता के लिए भी कानून उतने ही मजबूत होने चाहिए!
