वह पत्रकार जिन्हे अंग्रेज जीते-जी न पकड़ सके


 एक ऐसा अमर क्रांतिवीर, जिसे पकड़ने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी समूची शक्ति झोंक दी, परन्तु उसकी आत्मा को कभी पराजित नहीं कर सका।

सूफ़ी अम्बा प्रसाद : वह पत्रकार, क्रांतिवीर, जिसकी देह को अंग्रेज पा सके, आत्मा को नहीं






भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल उन नामों का इतिहास नहीं है, जो पाठ्यपुस्तकों में दर्ज हैं। यह उन अमर तपस्वियों की भी गाथा है, जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र की वेदी पर अर्पित कर दिया, किंतु इतिहास के पन्नों में गुमनाम रह गए। ऐसे ही युगपुरुष थे क्रांतिवीर सूफ़ी अम्बा प्रसाद। वे केवल एक लेखक नहीं थे, वे शब्दों के योद्धा थे। उनकी लेखनी से निकला प्रत्येक वाक्य अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला देता था। उर्दू पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने विदेशी सत्ता को खुली चुनौती दी। परिणाम स्वरूप उन पर राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए, कारावास दिया गया, नौ वर्षों तक कठोर यातनाएँ दी गईं और उनकी समस्त संपत्ति जब्त कर ली गई। परन्तु जो व्यक्ति राष्ट्र को अपना सर्वस्व मान चुका हो, उसे कारागार की दीवारें कैसे रोक सकती थीं?

जेल से निकलकर वे पुनः क्रांति के पथ पर अग्रसर हुए। हैदराबाद से लाहौर पहुँचे और सरदार अजीत सिंह की भारत माता सोसायटी से जुड़ गए। उन्होंने "विद्रोही ईसा" जैसी प्रखर पुस्तक लिखी, जिसने अंग्रेजी सत्ता की नींद उड़ा दी। गिरफ्तारी के आदेश निकले, वे नेपाल पहुँचे, वहाँ से पकड़े गए, भारत लाए गए; पर अंग्रेज उनके विरुद्ध कोई प्रमाण प्रस्तुत न कर सके और उन्हें रिहा करना पड़ा।

सन् 1906 में जब क्रांति की लपटें तेज हुईं, तब सूफ़ी अम्बा प्रसाद भूमिगत हो गए। वर्षों तक पर्वतों, जंगलों और निर्जन पथों पर भटकते रहे, किंतु अंग्रेजों के सामने झुके नहीं। लाहौर लौटकर उन्होंने "पेशवा" नामक पत्र निकाला। छत्रपति शिवाजी महाराज पर लिखे उनके ओजस्वी लेख अंग्रेजी शासन के लिए किसी तोप से कम नहीं थे। गिरफ्तारी की आहट मिली तो वे भारत की सीमाएँ पार कर ईरान पहुँच गए।

ईरान में भी उनका जीवन केवल निर्वासन नहीं, बल्कि क्रांति का विस्तार था। शिराज की धरती पर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता का शंखनाद किया। उन्होंने उद्घोष किया,"भारत की पराधीनता केवल भारत की पीड़ा नहीं, सम्पूर्ण एशिया की गुलामी है। जब तक भारत स्वतंत्र नहीं होगा, एशिया भी पूर्ण स्वतंत्र नहीं हो सकता।"

यह घोषणा साम्राज्यवाद के विरुद्ध एशियाई चेतना का उद्घोष बन गई। सन् 1917 में अंग्रेज उन्हें ईरान में खोज निकालने में सफल हुए। उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया। अंग्रेज सोच रहे थे कि वे इस सिंह-हृदय क्रांतिकारी को फाँसी के फंदे पर झुलाकर अपनी विजय का उत्सव मनाएँगे।

किन्तु इतिहास ने एक अद्भुत दृश्य देखा।,फाँसी की सुबह जब जेल का द्वार खुला, जल्लाद फंदा लेकर उनकी कोठरी में पहुँचा, तो सामने एक शांत, तेजस्वी और समाधिस्थ महापुरुष बैठे थे। उनके प्राण देह का परित्याग कर चुके थे। कहा जाता है कि उन्होंने योगबल और अटूट आत्मसंयम से स्वयं ही देह त्याग दी।

अंग्रेजों की मुट्ठी में केवल एक निर्जीव शरीर आया; सूफ़ी अम्बा प्रसाद की आत्मा उनके साम्राज्य से कहीं अधिक ऊँची उड़ान भर चुकी थी। आज भी ईरान के शिराज में उनकी समाधि उस अमर गाथा की साक्षी है। वहाँ उन्हें सम्मान पूर्वक स्मरण किया जाता है, जबकि भारत में उनका नाम अभी भी व्यापक जनमानस तक नहीं पहुँच पाया है। यह केवल एक क्रांतिकारी का विस्मरण नहीं, बल्कि राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति की पीड़ा है।

आइए, हम प्रण लें कि भारत के उन गुमनाम महायोद्धाओं को पुनः जन-जन तक पहुँचाएँगे, जिनके त्याग ने हमारी स्वतंत्रता की नींव रखी। क्योंकि राष्ट्र उन वीरों को कभी नहीं भूल सकता, जिनके रक्त से स्वतंत्रता का सूर्य उदित हुआ।

सूफ़ी अम्बा प्रसाद अमर रहें।

भारत माता की जय।

वन्दे मातरम्।


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