क्या मोदी को इंदिरा गांधी से कुछ सीखना चाहिए?
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि सत्ता चलाने की दो अलग-अलग शैलियाँ रही हैं। एक ओर श्रीमती इंदिरा गांधी का दौर था, जब 1975 में आपातकाल लागू हुआ, विपक्ष के अनेक नेता जेल भेजे गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया। इस अवधि की आलोचना इसलिए होती है कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल है। उनके विरोधी तीखी आलोचना करते हैं, अनेक बार व्यक्तिगत टिप्पणियाँ भी करते हैं। इसके बावजूद अधिकांश मामलों में सरकार लोकतांत्रिक और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से ही प्रतिक्रिया देती दिखाई देती है। कुछ लोगों का मत है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों, आतंकवाद, अलगाववाद और खुलेआम हिंसा के लिए उकसाने वालों के विरुद्ध सरकार को अधिक कठोर और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। उनका तर्क है कि कानून का भय बना रहना चाहिए और संविधान के दायरे में रहते हुए ऐसे अपराधों पर सख्त दंड दिया जाना चाहिए।
हालाँकि, लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति विरोधियों को कुचलने में नहीं, बल्कि कानून के समान और निष्पक्ष शासन में होती है। किसी भी सरकार की मजबूती इस बात से आँकी जाती है कि वह संविधान, न्यायपालिका और विधि के शासन का सम्मान करते हुए देश की सुरक्षा और नागरिकों की स्वतंत्रता—दोनों का संतुलन बनाए रखे।
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का संदेश यही है कि दृढ़ नेतृत्व आवश्यक है, लेकिन वह संविधान और कानून की मर्यादा के भीतर ही सबसे प्रभावी माना जाता है।
यही कारण है कि कांग्रेस वेंटिलेटर
