गुरू पूर्णिमा पर विशेष, शाक्त परम्परा( मां) को प्रथम गुरु की प्रतिष्ठा मिले

 माँ को प्रथम गुरु कहना केवल भावुक कथन नहीं, बल्कि जीवन, शास्त्र, तर्क और नीति—तीनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली सत्य-वाणी है । 




बस्ती, उत्तरप्रदेश 

माँ: प्रथम गुरु मनुष्य के जीवन का आरंभ किसी उपदेश से नहीं, स्पर्श से होता है। वह पहला स्पर्श माँ का होता है,स्नेह का, सुरक्षा का, जीवनदायिनी करुणा का। शिशु बोलना नहीं जानता, समझना नहीं जानता, पर वह माँ के हृदय की धड़कन पहचानता है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने माँ को केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि प्रथम गुरु माना है । गुरु का अर्थ केवल विद्यालय में पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि अज्ञान का अंधकार हटाकर संस्कार, विवेक और जीवन-दृष्टि देने वाला है। यह कार्य माँ शिशु के जीवन के सबसे आरंभिक और निर्णायक चरण में करती है ।शास्त्र-सम्मत दृष्टि से देखें तो भारतीय परंपरा में माता के स्थान को अत्यंत ऊँचा माना गया है। “मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुषो वेद” जैसी भावना बताती है कि मनुष्य का निर्माण अनेक स्तरों पर होता है, और उनमें मातृत्व सबसे पहला आधार है । वेद, स्मृति और नीति-साहित्य में माता को देवतुल्य बताया गया है; कारण स्पष्ट है,वह केवल शरीर को जन्म नहीं देती, वह संस्कारों का बीज भी रोपती है । शिशु के चरित्र, भाषा, व्यवहार, धैर्य, करुणा और सत्यप्रियता की पहली पाठशाला घर होती है, और उस पाठशाला की मुख्य अध्यापिका माँ होती है । इसी अर्थ में “माता, पिता, गुरु, दैवम्” का क्रम भी जीवन-निर्माण की यात्रा का सूचक है, जिसमें माँ प्रथम आधार है ।तर्क की कसौटी पर भी यह बात सहज सिद्ध होती है। शिक्षा केवल अक्षरज्ञान नहीं है; जीवन-ज्ञान उससे कहीं व्यापक है। बच्चा संसार में आते ही सबसे पहले माँ की आँखों, आवाज़, स्पर्श और आचरण से सीखता है। वह देखता है कि भय में कैसे शांत रहना है, पीड़ा में कैसे सहना है, और संबंधों में कैसे प्रेम निभाना है। यदि माँ कठोर, असंयत और असंवेदनशील हो, तो बालक के मन में वही असंतुलन अंकित हो सकता है; और यदि माँ धैर्यवान, संस्कारी, संयमी और करुणामयी हो, तो वही गुण उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं । इसलिए बालक का व्यक्तित्व, उसके विचार और उसकी नैतिक चेतना, बहुत हद तक माँ के जीवन-व्यवहार का प्रतिरूप होते हैं।

माँ की गुरुता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसका उपदेश शब्दों से कम, आचरण से अधिक होता है। बच्चा वही सीखता है जो वह देखता है। माँ यदि सत्य बोलती है, बच्चा सत्य की ओर झुकता है; माँ यदि सेवा करती है, बच्चा सेवा का मूल्य समझता है; माँ यदि संयम रखती है, बच्चा अनुशासन सीखता है। इसीलिए कहा जाता है कि माँ के संस्कार गर्भ से लेकर बचपन तक, मनुष्य के अंतःकरण में गहरे बैठ जाते हैं और जीवन भर साथ चलते हैं । यह शिक्षा विद्यालय की पाठ्य-पुस्तक से नहीं, जीवन के सीधे अनुभव से आती है। यही कारण है कि माँ का शिक्षण बाह्य नहीं, आंतरिक और स्थायी होता है।नीति-सम्मत विचार से भी माँ का स्थान सबसे ऊपर है। कोई समाज तभी श्रेष्ठ बनता है जब उसकी माताएँ श्रेष्ठ होती हैं। अच्छे नागरिक, श्रेष्ठ पुत्र, समर्पित सेवक, न्यायप्रिय नेता और संवेदनशील मनुष्य—सबकी जड़ें माँ के संस्कार में छिपी होती हैं । 

यदि माँ संतान को केवल सुख-सुविधा ही नहीं, बल्कि मर्यादा, श्रम, कर्तव्य और आत्मसंयम भी सिखाए, तो वह संतान परिवार ही नहीं, राष्ट्र के लिए भी मूल्यवान बनती है। जो माता अपने पुत्र को केवल अपना पुत्र नहीं, समाज का उपयोगी सदस्य बनाती है, वही वास्तव में राष्ट्रनिर्मात्री है। इसीलिए मातृत्व का सम्मान निजी कृतज्ञता नहीं, सार्वजनिक नीति भी है।भारतीय साहित्य ने माँ को करुणा, त्याग और तप का जीवंत रूप माना है। माँ अपने बच्चों के दुख को अपने भीतर समेटती है, उनकी भूख को पहले पहचानती है, और उनके लिए अपने सुख का त्याग करने में संकोच नहीं करती । वह देती है, पर अपने देने का प्रचार नहीं करती। वह सहती है, पर अपने सहने का ढोल नहीं पीटती। वह मौन रहती है, पर उसका मौन भी शिक्षा होता है। साहित्य की भाषा में माँ को केवल “जननी” कहना पर्याप्त नहीं; वह ममता, सुरक्षा, अनुशासन और संस्कार का अदृश्य विश्वविद्यालय है। यही कारण है कि अनेक रचनाकारों ने उसे प्रथम अध्यापिका, प्रथम प्रेरणा और प्रथम साधिका कहा है ।

आज के युग में जब बाहरी उपलब्धियाँ ही सफलता का मापदंड बनती जा रही हैं, माँ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक मनुष्य को सूचना दे सकती है, पर विवेक नहीं; ज्ञान दे सकती है, पर संस्कार नहीं; सुविधा दे सकती है, पर मर्यादा नहीं। ये सब माँ के निकट सान्निध्य से आते हैं। इसलिए आधुनिकता की दौड़ में भी यदि घर की नींव मजबूत रखनी है, तो माँ के शिक्षण को सर्वोच्च स्थान देना होगा। जिस घर में माँ का सम्मान नहीं, वहाँ संस्कार भी कमजोर पड़ते हैं; और जहाँ माँ का आदर है, वहाँ जीवन की दिशा भी उजली होती है ।इस प्रकार, माँ को प्रथम गुरु कहना कोई अलंकारिक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है। वह जन्म देती है, पोषण करती है, संस्कार देती है, और मनुष्य के भीतर मनुष्यता का बीज रोपती है ।

 गुरु यदि ज्ञान का प्रकाश है, तो माँ उस दीप की पहली लौ है। गुरु यदि दिशा है, तो माँ उस यात्रा का आरंभ है। गुरु यदि मोक्षमार्ग का संकेत है, तो माँ वह भूमि है जिस पर व्यक्ति का चरित्र खड़ा होता है। अतः माँ केवल गृह की शोभा नहीं, जीवन की मूल शिक्षा है। वह सचमुच प्रथम गुरु है,करुणा की, मर्यादा की, सेवा की और संस्कार की प्रथम अध्यापिका ।

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