समरसता का कलश: क्या महर्षि रविदास का संदेश विपक्ष की जातीय राजनीति पर पड़ेगा भारी?
महर्षि रविदास के विचारों का पुनर्जागरण या भारतीय राजनीति का नया अध्याय?
राजेंद्र नाथ तिवारी, बस्ती, उत्तर प्रदेश सम्पादक
भारतीय जनता पार्टी द्वारा संत शिरोमणि महर्षि रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर प्रारंभ किया जा रहा "समरसता संकल्प अभियान" केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं है। यह उस वैचारिक संघर्ष का नया अध्याय है, जिसमें एक ओर भारत की हजारों वर्षों पुरानी संत परंपरा से निकली सामाजिक समरसता की अवधारणा है और दूसरी ओर वह राजनीति, जिसने स्वतंत्रता के बाद से समाज को जातियों, वर्गों और वोट बैंकों में विभाजित कर अपनी राजनीतिक फसल काटी। 29 जुलाई से 20 फरवरी तक चलने वाला यह अभियान देश के हजारों गांवों, नगरों और महानगरों तक पहुंचेगा। कलश यात्राएं, संत संपर्क, मंदिरों में दीपदान, भजन, सत्संग, सामाजिक संवाद और विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से भाजपा समाज के उस वर्ग तक पहुंचने का प्रयास कर रही है, जिसे दशकों तक केवल वोट बैंक मानकर देखा गया।
महर्षि रविदास: जिन्होंने काशी के विद्वानों को भी झुकने पर विवश किया::महर्षि रविदास का जीवन भारतीय समाज में सामाजिक क्रांति का अद्भुत उदाहरण है। वह किसी सत्ता के बल पर नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, तप, विनम्रता और आचरण के बल पर युगपुरुष बने। काशी के प्रतिष्ठित पंडित, जो जन्म आधारित श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे थे, अंततः उनके आध्यात्मिक तेज और तर्क के सामने निरुत्तर हो गए। रविदास ने कभी विद्रोह की भाषा नहीं बोली, उन्होंने समरसता की भाषा बोली। उन्होंने समाज को तोड़ने का नहीं, जोड़ने का संदेश दिया। उनका प्रसिद्ध वाक्य,"मन चंगा तो कठौती में गंगा",केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का उद्घोष है। उन्होंने बताया कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग जन्म नहीं, कर्म और चरित्र तय करते हैं। उनका आदर्श 'बेगमपुरा' ऐसा समाज था जहां कोई ऊंच-नीच नहीं, कोई भेदभाव नहीं, कोई शोषण नहीं—सिर्फ सम्मान, समानता और आत्मगौरव हो। यही भारत की सनातन संस्कृति का मूल स्वर है।
भाजपा का अभियान: राजनीति से आगे वैचारिक विस्तार::भाजपा लंबे समय से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक न्याय, महात्मा गांधी के अंतिम व्यक्ति के उत्थान और संत परंपरा की सामाजिक समरसता को जोड़ने का प्रयास करती रही है। महर्षि रविदास जयंती पर यह अभियान उसी श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है वाराणसी से निकलने वाला समरसता कलश पूरे देश में जाएगा। संतों, महंतों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न समुदायों को जोड़ने का प्रयास होगा। यदि यह अभियान केवल राजनीतिक कार्यक्रम न रहकर सामाजिक संवाद का माध्यम बनता है, तो इसका प्रभाव चुनावी सीमाओं से कहीं आगे दिखाई दे सकता है।
विपक्ष की चुनौती क्यों बढ़ेगी?::::दशकों तक कांग्रेस और अनेक क्षेत्रीय दलों की राजनीति का आधार जातीय समीकरण रहा है। चुनाव आते ही सामाजिक न्याय, पिछड़े-दलित विमर्श और आरक्षण की बहस तेज हो जाती है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही समाज फिर अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है।यदि भाजपा महर्षि रविदास के संदेश को गांव-गांव तक पहुंचाने में सफल रहती है और सामाजिक समरसता को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना देती है, तो विपक्ष की जातीय गोलबंदी की राजनीति को गंभीर चुनौती मिल सकती है। क्योंकि समरसता की राजनीति लोगों को जोड़ती है, जबकि जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति उन्हें अलग-अलग खेमों में बांटती है।
सिर्फ दलित समाज नहीं, पूरे राष्ट्र के संत हैं रविदास:::महर्षि रविदास को किसी एक जाति या समुदाय की सीमा में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व का अपमान होगा। जिस प्रकार महर्षि वाल्मीकि, कबीर, गुरु नानक, नारायण गुरु और बाबा साहब आंबेडकर पूरे राष्ट्र की धरोहर हैं, उसी प्रकार रविदास भी भारतीय संस्कृति के ऐसे युगद्रष्टा हैं जिन्होंने सामाजिक सम्मान, आध्यात्मिक समानता और मानवीय गरिमा का मार्ग दिखाया।आज आवश्यकता इस बात की है कि उनके संदेश को चुनावी नारों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा बनाया जाए।
समरसता बनाम संघर्ष की राजनीति:::भारत का भविष्य संघर्ष में नहीं, समरसता में है। जिस समाज में परस्पर सम्मान होगा, वहां विकास भी होगा और राष्ट्रीय एकता भी मजबूत होगी। महर्षि रविदास ने समाज को जोड़ने की साधना की थी, इसलिए उनका स्मरण केवल जयंती मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि भाजपा का यह अभियान वास्तव में महर्षि रविदास के विचारो,समरसता, आत्मगौरव, समान सम्मान और सामाजिक एकता—को जन-जन तक पहुंचाने में सफल होता है, तो यह केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं रहेगा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण सिद्ध हो सकता है।
याद रखना होगा—महर्षि रविदास ने समाज को जातियों में नहीं, मानवता में देखा था। जो राजनीति उनके नाम पर समाज को जोड़ने का कार्य करेगी, वह दीर्घकाल में जनविश्वास अर्जित करेगी; और जो केवल उनके नाम का चुनावी उपयोग करेगी, उसे इतिहास कठोरता से परखेगा।
