अन्यथा, दे गाली, ले ताली!

 


संपादकीय

जंतर-मंतर पर गालियों का शोर: क्या यही लोकतंत्र की नई भाषा है?

बस्ती  से  राजेन्द्र  नाथ  तिवारी 

जंतर-मंतर लोकतंत्र का तीर्थ है, तिरस्कार का नहीं। यह वह स्थान है जहाँ देश का नागरिक सत्ता से प्रश्न पूछता है, अपनी पीड़ा व्यक्त करता है और संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करता है। लेकिन यदि इसी मंच पर अश्लील गालियाँ, अभद्र नारे और व्यक्तिगत अपमान गूंजने लगें, तो यह लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी गरिमा पर आघात है। विरोध लोकतंत्र का प्राण है, किंतु विरोध की भी मर्यादा होती है। असहमति का अर्थ अश्लीलता नहीं है। सरकार की आलोचना कीजिए, नीतियों का विरोध कीजिए, तीखे प्रश्न पूछिए—लेकिन यदि आंदोलन की पहचान गालियाँ बन जाएँ, तो वह जनजागरण नहीं, जनभावनाओं का प्रदूषण बन जाता है। यदि किसी प्रदर्शन में अभद्र और अशोभनीय नारे लगाए गए, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों की भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि नेतृत्व की जिम्मेदारी का भी विषय है। क्या आयोजकों ने ऐसे नारों का विरोध किया? क्या उन्होंने मंच से ऐसी भाषा को रोकने का प्रयास किया? यदि नहीं, तो यह मौन स्वयं एक संदेश बन जाता है।

आज देश का युवा नेतृत्व करना चाहता है। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन नेतृत्व का पहला संस्कार संयम है। जो युवा समाज को दिशा देना चाहता है, उसे यह भी समझना होगा कि इतिहास गाली देने वालों को नहीं, विचार देने वालों को याद रखता है। क्रांति की भाषा जितनी शालीन होगी, उसका प्रभाव उतना ही स्थायी होगा।सोशल मीडिया के दौर में कुछ लोगों ने यह भ्रम पाल लिया है कि जितनी अधिक उत्तेजक भाषा होगी, उतनी अधिक लोकप्रियता मिलेगी। हो सकता है कुछ समय के लिए सुर्खियाँ मिल जाएँ, लेकिन राष्ट्र का चरित्र ट्रेंड से नहीं, संस्कार से बनता है। लोकतंत्र की शक्ति भीड़ के शोर में नहीं, विचार की गंभीरता में होती है।

यह भी आवश्यक है कि किसी भी घटना के आधार पर पूरे संगठन, दल या विचारधारा को दोषी न ठहराया जाए। जिम्मेदारी उन्हीं व्यक्तियों पर तय होनी चाहिए जिन्होंने वास्तव में अशोभनीय व्यवहार किया हो। लोकतांत्रिक विमर्श तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, आरोपों पर नहीं।भारत की लोकतांत्रिक परंपरा हमें सिखाती है कि सबसे कठोर संघर्ष भी मर्यादा के भीतर लड़ा जा सकता है। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने व्यवस्था से तीखा मतभेद रखा, पर भाषा की गरिमा नहीं छोड़ी। यही लोकतंत्र की असली पहचान है।

जंतर-मंतर पर यदि गालियों का शोर लोकतंत्र की आवाज़ बन जाएगा, तो सबसे बड़ी हार किसी सरकार की नहीं, भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति की होगी। विरोध कीजिए, पर विचारों से। संघर्ष कीजिए, पर संयम के साथ। क्योंकि लोकतंत्र गाली से नहीं, संवाद से मजबूत होता है। अन्यथा  दे  गाली, ले  ताली!

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