दक्षिण की रामकथाओं और माता सीता के दिव्य स्वरूप एक विशद, प्रामाणिक, शोधपरक और ओजस्वी (आलेख)
दक्षिण की रामकथा और माता सीता: एक व्यापक एवं विशद विवेचन:: रामकथा की वैश्विक और देशव्यापी व्याप्ति;"कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥" महाकवि तुलसीदास की यह उक्ति रामकथा पर अक्षरशः खरी उतरती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और आदि-शक्ति स्वरूपा माता सीता का चरित्र किसी एक भौगोलिक सीमा, भाषा या कालखंड में आबद्ध नहीं है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर व सागर पार के देशों तक, रामकथा भारतीय संस्कृति की अंतरात्मा बनकर प्रवाहित हुई है।
अक्सर उत्तर भारत में यह धारणा रहती है कि रामकथा का अर्थ केवल महर्षि वाल्मीकि की 'रामायण' या गोस्वामी तुलसीदास की 'रामचरितमानस' है। किंतु जब हम विंध्याचल के दक्षिण में कदम रखते हैं, तो हमें बोध होता है कि दक्षिण भारत की धरती ने रामकथा को न केवल अपनी अनूठी सांस्कृतिक चेतना में ढाला, बल्कि उसे कला, संगीत, दर्शन और साहित्य के शिखर पर पहुँचाया।
दक्षिण की रामकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल उत्तर भारत के ग्रंथों के अनुवाद मात्र नहीं हैं। वे मौलिक महाकाव्य हैं, जिनकी रचना वहाँ के ऋषियों, संतों और महाकवियों ने अपनी माटी की सुगंध, अपने लोक-आचार और अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को समाहित करके की है। जहाँ उत्तर की रामकथाओं में 'मर्यादा' और 'भक्ति' का प्राधान्य है, वहीं दक्षिण की रामकथाओं में 'वीर रस', 'अध्यात्म', 'प्रकृति-चित्रण' और माता सीता के 'परम शक्ति स्वरूप' का अत्यंत ओजस्वी और क्रांतिकारी विवेचन मिलता है। यह आलेख दक्षिण की इसी समृद्ध रामकथा परंपरा और माता सीता के विशद स्वरूप का अन्वेषण करता है।
तमिल साहित्य का गौरव , महाकवि कम्ब और 'कम्ब रामायण'
दक्षिण भारत में रामकथा के प्रसार का सबसे सशक्त और प्राचीन माध्यम तमिल भाषा की 'कम्ब रामायण' (मूल नाम: रामावतारम्) है। इसकी रचना नौवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य महाकवि कम्ब ने की थी। तमिल साहित्य में कम्ब का वही स्थान है, जो संस्कृत में वाल्मीकि का या हिंदी में तुलसीदास का है।कम्ब रामायण की ओजस्वी विशेषताएँ:
शिल्प और भाषा का सौंदर्य: कम्ब ने राम को साक्षात नारायण का अवतार मानते हुए भी उन्हें एक ऐसे जननायक के रूप में प्रस्तुत किया है, जो मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत हैं। उनकी भाषा में जो ओज और प्रवाह है, वह पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है।रावण का चरित्र-चित्रण: कम्ब रामायण की एक अभूतपूर्व विशेषता यह है कि इसमें रावण के खलनायकत्व को सीधे क्रूरता के रूप में नहीं दिखाया गया। कम्ब का रावण परम विद्वान, कला-पारखी और वेदों का ज्ञाता है। उसका पतन अहंकार और वासना के कारण होता है, जिससे चरित्र में एक गहरा द्वंद्व पैदा होता है।
भक्ति और वीर रस का समन्वय: कम्ब ने युद्ध के दृश्यों का ऐसा सजीव और ओजस्वी वर्णन किया है कि वीर रस अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। साथ ही, तमिल की 'भक्ति आंदोलन' (आलवार संतों की परंपरा) का प्रभाव इस ग्रंथ के कण-कण में झलकता है।
आंध्र की साहित्यिक थाती – 'रंगनाथ रामायण' और 'भास्कर रामायण',तेलुगु साहित्य में रामकथा की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। यहाँ की रामकथा परंपरा ने जनमानस को न केवल धार्मिक रूप से जोड़ा, बल्कि लोक-संगीत और नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से इसे घर-घर तक पहुँचाया।
1. रंगनाथ रामायण (कवि गोन बुद्धा रेड्डी):तेलुगु साहित्य में 13वीं शताब्दी में रचित 'रंगनाथ रामायण' को प्रथम और प्रामाणिक रामकाव्य माना जाता है।द्विपद शैली: यह ग्रंथ 'द्विपद' (दो पंक्तियों के छंद, जो गाने में सुगम होते हैं) शैली में लिखा गया है। इसकी ओजस्विता इसके गेय तत्व में है।लोक कथाओं का समावेश: गोन बुद्धा रेड्डी ने वाल्मीकि रामायण का अनुसरण करते हुए भी इसमें कई ऐसी अनूठी दक्षिण भारतीय लोक कथाओं को जोड़ा, जो उत्तर भारत के ग्रंथों में नहीं मिलतीं। जैसे, लक्ष्मण रेखा का विस्तृत प्रसंग और रावण के पाताल होम की कथा को इसमें विशेष स्थान मिला है।
भास्कर रामायण:
यह तेलुगु का एक और अत्यंत विशाल और शास्त्रीय ग्रंथ है। इसकी रचना महाकवि भास्कर और उनके सहयोगी कवियों ने की थी। यह ग्रंथ अपनी प्रौढ़ भाषा, गंभीर दार्शनिकता और युद्ध-वर्णन के ओजस्वी छंदों के लिए प्रसिद्ध है। राजाओं के दरबारों से लेकर आम जनता के कंठ तक इस रामायण ने अपनी पैठ बनाई।
कर्नाटक की धरा और कन्नड़ रामकथा – 'तोरवे रामायण' एवं 'पम्प रामायण'
कन्नड़ साहित्य ने रामकथा को दो सर्वथा भिन्न और समृद्ध दृष्टिकोंणों से देखा है – एक वैदिक-वैष्णव परंपरा और दूसरी जैन परंपरा।c1. तोरवे रामायण (कुमार वाल्मीकि):
तोरवे (कर्नाटक का एक गाँव) के निवासी कवि नरहरि, जिन्हें 'कुमार वाल्मीकि' कहा जाता है, ने 15वीं-16वीं शताब्दी में भामिनी षट्पदी छंद में इस महाकाव्य की रचना की।
ओजस्वी संवाद: तोरवे रामायण अपने नाटकीय संवादों और पात्रों के वैचारिक द्वंद्व के लिए जानी जाती है। राम और रावण के बीच के युद्ध, लक्ष्मण और मेघनाद के संवाद इसमें अत्यंत ओजपूर्ण शैली में लिखे गए हैं।
भक्ति मार्ग: यह ग्रंथ पूरी तरह विष्णु-भक्ति से सराबोर है और विजयनगर साम्राज्य के काल में इसने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य किया।2. पम्प रामायण (नागचन्द्र):
12वीं शताब्दी के कवि नागचन्द्र (जिन्हें 'अभिनव पम्प' भी कहा जाता है) ने 'रामचंद्र चरित पुराण' की रचना की, जो 'पम्प रामायण' के नाम से विख्यात है। जैन दृष्टिकोण: यह एक अनूठा ग्रंथ है जहाँ राम को अहिंसा के अवतार के रूप में दिखाया गया है। यहाँ रावण का वध राम नहीं, बल्कि लक्ष्मण करते हैं। इसमें रावण को एक दुष्ट राक्षस नहीं, बल्कि एक महान, गुणी और परिस्थिति का मारा 'प्रति-नारायण' दिखाया गया है, जो माता सीता के सौंदर्य पर मोहित होकर अपना विवेक खो बैठता है। इसका विवेचन अत्यंत बौद्धिक और गंभीर है।
m केरल का आध्यात्मिक स्वर :: 'अध्यात्म रामायण किलीपाट्टू'
केरल (मलयालम साहित्य) में रामकथा का आगमन अध्यात्म की एक ऐसी लहर लेकर आया जिसने पूरे समाज को बदल दिया। 16वीं शताब्दी में तुंचतु रामानुज एळुत्तच्चन् ने 'अध्यात्म रामायण किलीपाट्टू' की रचना की। एळुत्तच्चन् को मलयालम भाषा का जनक माना जाता है।
ग्रंथ की अनूठी विशेषताएँ: किलीपाट्टू शैली: 'किलीपाट्टू' का अर्थ है 'तोते का गीत'। कवि ने इस महाकाव्य को एक शुक (तोते) के माध्यम से कहलवाया है, जो इसके संगीत और माधुर्य को अनूठा बनाता है।
ज्ञान और भक्ति का चरम: एळुत्तच्चन् की रामायण केवल एक कथा नहीं है, बल्कि वह अद्वैत वेदांत का साक्षात रूप है। इसमें रामकथा के माध्यम से जीव, जगत और माया के संबंधों की विशद व्याख्या की गई है। सांस्कृतिक प्रभाव: केरल में 'कर्कटकम' (सावन-भादों का महीना, जो भारी वर्षा और कठिनाइयों का समय होता है) को 'रामायण मास' के रूप में मनाया जाता है। इस पूरे महीने केरल के प्रत्येक हिंदू घर में इस ओजस्वी और शांत रस से युक्त ग्रंथ का पाठ अनिवार्य रूप से किया जाता है।
माता सीता का व्यापक स्वरूप – केवल अबला नहीं, आदिशक्ति
उत्तर भारत के लोकमानस में अक्सर माता सीता को त्याग, करुणा, सहनशीलता और मौन दुःख सहने वाली एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में देखा जाता है। किंतु जब हम दक्षिण की रामकथाओं और उपनिषदों के विशद विवेचन में उतरते हैं, तो सीता का एक अत्यंत ओजस्वी, प्रखर, निर्भीक और 'महाशक्ति' का स्वरूप सामने आता है।
दक्षिण की दृष्टि में सीता केवल राजा जनक की लाड़ली या राम की अनुगामिनी पत्नी नहीं हैं; वे सृष्टि की संचालिका, प्रकृति और साक्षात शक्ति हैं। कम्ब रामायण में सीता का चरित्र अत्यंत स्वाभिमानी है। वे रावण की लंका में बंदी रहकर भी तृण (तिनके) की ओट लेकर रावण के वैभव और अहंकार को तिनके के समान ही तुच्छ सिद्ध कर देती हैं। दक्षिण के दार्शनिक ग्रंथों में सीता को 'मूलप्रकृति' माना गया है। राम यदि 'पुरुष' (परमात्मा) हैं, तो सीता 'प्रकृति' (ऊर्जा) हैं। बिना प्रकृति के पुरुष निष्क्रिय है। लंका विजय और राक्षसों का संहार वास्तव में राम के माध्यम से सीता की ही शक्ति संपन्न करती है।
दार्शनिक शिखर – 'सीता उपनिषद' का विशद विवेचन::वेद और उपनिषदों की परंपरा में 'सीता उपनिषद' (जो अथर्ववेद के अंतर्गत आता है) माता सीता के स्वरूप पर किया गया संसार का सबसे गहन और दार्शनिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ सीता तत्व की व्यापक व्याख्या करता है।
सीता उपनिषद के मुख्य बिंदु: शब्दात्मिका सीता: इस उपनिषद में कहा गया है कि सीता साक्षात 'नाद' और 'शब्द' का स्वरूप हैं। संसार में जितनी भी विद्याएँ, भाषाएँ और ज्ञान हैं, वे सब सीता का ही विस्तार हैं। त्रिविध शक्ति: सीता को तीन मुख्य शक्तियों का पुंज बताया गया है:
इच्छा शक्ति: जिसके द्वारा सृष्टि की कामना होती है। ज्ञान शक्ति: जिसके द्वारा संपूर्ण ब्रह्मांड का नियमन और बोध होता है। और क्रिया शक्ति: जिसके द्वारा दुष्टों का संहार और जगत का पोषण होता है।
साक्षात प्रकृति: यहाँ सीता को 'योगमाया' और 'मूल प्रकृति' कहा गया है। हल की नोंक (सीत) से प्रकट होना इस बात का प्रतीक है कि वे भूमि (धरती) की अनंत उर्वरा शक्ति और जीवन का आधार हैं। यह ग्रंथ सीता जी को राम से पृथक नहीं, बल्कि राम की अंतर्निहित चेतना के रूप में स्थापित करता है।
शक्ति का ओजस्वी अवतार – 'अद्भुत रामायण'::संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत विशिष्ट और क्रांतिकारी ग्रंथ है 'अद्भुत रामायण' (इसे कुछ विद्वान शाक्त परंपरा का ग्रंथ मानते हैं)। इस ग्रंथ में माता सीता के चरित्र का जो विवेचन है, वह परंपरागत धारणाओं को हिलाकर रख देता है।
सहस्रमुख रावण वध की ओजस्वी कथा:इस ग्रंथ के अनुसार, जिस रावण का वध श्रीराम ने किया था, वह 'दशमुख रावण' (दस सिरों वाला) था। किंतु एक और रावण था जो 'सहस्रमुख रावण' (हजार सिरों वाला) था, जो दशमुख रावण से भी हजार गुना शक्तिशाली था।
जब श्रीराम उस सहस्रमुख रावण से युद्ध करने जाते हैं, तो वे उसकी मायावी शक्तियों के सामने मूर्छित हो जाते हैं। उस समय युद्धभूमि में सन्नाटा छा जाता है। तब माता सीता मौन त्यागकर महाक्रोध में आ जाती हैं। वे साक्षात 'महाकाली' का रूप धारण करती हैं।"तत: सा जानकी देवी विकृताक्षी भयानकम्। रूपं कृत्वा महाकाली सहस्रशिरसं रणे॥"
महाकाली रूपी सीता रणचंडी बनकर युद्धभूमि में उतरती हैं और पलक झपकते ही सहस्रमुख रावण का वध कर देती हैं। वे देवताओं का भय दूर करती हैं और तब स्वयं भगवान शिव उनके क्रोध को शांत करने के लिए उनके चरणों के नीचे आते हैं। अद्भुत रामायण का यह प्रसंग सीता जी के भीतर छिपी उस 'रौद्र और ओजस्वी' शक्ति को प्रकट करता है, जो अधर्म के समूल नाश के लिए तत्पर रहती है।
सिंहली और संस्कृत का अनूठा संगम – 'जानकीहरणम्'
दक्षिण के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र और सुदूर दक्षिण (श्रीलंका) के महाकवि कुमारदास (छठी शताब्दी) द्वारा रचित 'जानकीहरणम्' माता सीता पर केंद्रित एक अत्यंत प्रौढ़ संस्कृत महाकाव्य है। कुमारदास राजा महासेन के पुत्र थे और महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र माने जाते थे।
इस ग्रंथ की विशिष्टता:
सीता के जन्म और सौंदर्य का भव्य वर्णन: कुमारदास ने सीता के जन्म, उनके मिथिला के वैभव और उनके दिव्य सौंदर्य का ऐसा विशद वर्णन किया है जो अद्वितीय है।हरण और विरह की ओजस्विता: 'जानकीहरणम्' का मुख्य केंद्र बिंदु रावण द्वारा सीता का हरण और लंका में सीता की मानसिक दृढ़ता है। कुमारदास ने दिखाया है कि रावण जैसा त्रिलोकविजेता भी सीता के सतीत्व और उनके आंतरिक तेज के सामने थर-थर काँपता था। सीता का विरह कोई रोना-धोना नहीं है, बल्कि वह एक तपे हुए सोने की तरह दैदीप्यमान तेज है, जो अंततः लंका के भस्म होने का कारण बनता है।
उत्तर और दक्षिण का महा-सांस्कृतिक सेतु:दक्षिण की रामकथा परंपरा और माता सीता के स्वरूप का यह विशद विवेचन हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि भारत की सांस्कृतिक चेतना कितनी समृद्ध और विविधता पूर्ण है।