चित्रकूट उनकी दीक्षा, पंचवटी उनकी तपोभूमि, और अपहरण उनकी सबसे बड़ी परीक्षा का शंखनाद

 सीतायण शृंखला

अध्याय ७ —त्याग-पथ की आदि शक्ति




वनगमन, चित्रकूट, पंचवटी, शूर्पणखा-प्रसंग, खर-दूषण वध और सीता-अपहरण

(मारीच वध सहित)जहाँ राम, वहाँ अयोध्या , सीता के लिए वन भी अयोध्या था। यह अध्याय राम के वनगमन की कथा नहीं, अपितु सीता की उस निर्णायक तपस्या की कथा है जिसने त्याग को राष्ट्रधर्म में बदल दिया।


जनकपुर से जगद्गुरु भारत @2047सीता की दृष्टि से वनपथ


सीतायण शृंखला के इस अध्याय में हम रामायण के उस पर्व में प्रवेश करते हैं जिसे परंपरागत दृष्टि राम के वनवास के रूप में पढ़ती आई है। किन्तु सीतायण की केंद्रीय दृष्टि यह है कि यह पर्व वस्तुतः सीता की उस साधना का आरम्भ है जिसमें राजकुमारी अपनी वैभव-संपन्न मिथिला-अयोध्या पहचान को त्यागकर आदि शक्ति के तपस्विनी रूप में प्रकट होती हैं। वाल्मीकि, तुलसी, कम्बन और कालिदास — चारों परम्पराएँ इस बात पर एकमत हैं कि सीता का वन-प्रवेश स्वेच्छा और संकल्प का कार्य था, विवशता का नहीं। प्रत्येक ग्रंथ-परम्परा को यहाँ पृथक रूप से उद्धृत किया गया है — वाल्मीकि रामायण का मूल कथानक-आधार, तुलसीदास की भक्ति-दृष्टि, कम्बन के रामावतारम् की तमिल काव्य-चेतना, कालिदास के रघुवंश का संक्षिप्त संकेत, तथा जहाँ प्रसंगवश उपयुक्त हो वहाँ भवभूति के उत्तररामचरित और अद्भुत रामायण के विशिष्ट सन्दर्भ। किसी भी स्थल पर परम्पराओं को परस्पर मिलाया नहीं गया है।


सीता का वनगमन — संकल्प की प्रथम परीक्षा

जब दशरथ के वचन-पालन हेतु राम को चौदह वर्ष के वनवास की आज्ञा हुई, तब सीता के समक्ष प्रश्न था कि क्या राजमहल में सुरक्षित रहना श्रेयस्कर है अथवा पति के साथ वनगमन। वाल्मीकि रामायण में सीता स्वयं इस निर्णय का तर्क प्रस्तुत करती हैं यह पतिव्रता धर्म से भी आगे, स्वतंत्र सामर्थ्य-चेतना का उद्घोष है।नास्ति भर्तुर्गृहात्किञ्चित् स्त्रीणामाभरणं परम् ।

स तु मामद्य गच्छन्तं वनवासाय भारत ॥

अर्थ: पति के गृह के अतिरिक्त स्त्री का कोई श्रेष्ठ आभूषण नहीं होता , इसी विश्वास के साथ सीता वन जाने का संकल्प व्यक्त करती हैं।

वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग २७

तुलसीदास के रामचरितमानस में यही प्रसंग भक्ति और समर्पण के स्वर में प्रस्तुत होता है, जहाँ सीता वन को भी अयोध्या के समान मानने का भाव व्यक्त करती हैं ,जहँ जहँ राम तहाँ सुख साता । जहँ नहिं राम सोई दुख दाता ॥अर्थ: जहाँ राम हैं, वहीं सुख और शांति है; जहाँ राम नहीं, वही स्थान दुखदायी है।

तुलसीदास, रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड


कम्बन के रामावतारम् में सीता का यह निर्णय तमिल काव्य-परम्परा में और भी दृढ़ता से चित्रित हुआ है वहाँ सीता को केवल अनुगामिनी नहीं अपितु स्वतंत्र निर्णयकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो वन को अपनी तपस्या-भूमि के रूप में स्वीकार करती हैं। कालिदास के रघुवंश में यह प्रसंग संक्षिप्त संकेत मात्र से गुजरता है, जहाँ रघुकुल की मर्यादा-परम्परा के सन्दर्भ में सीता का त्याग कुल-धर्म की निरंतरता के रूप में रेखांकित होता है।

सीता का वनगमन पलायन नहीं, प्रस्थान था lराजसिंहासन से तपोभूमि की ओर एक सुनिश्चित संक्रमण, जिसे स्वयं सीता ने चुना।



चित्रकूट निवास — मुनियों से भेंट,,चित्रकूट में राम-सीता-लक्ष्मण का निवास केवल भौगोलिक पड़ाव नहीं था, अपितु यह वह स्थल था जहाँ सीता का साक्षात्कार वन के ऋषि-मुनियों की तपस्या-परम्परा से हुआ। वाल्मीकि रामायण में चित्रकूट को अत्रि, अनसूया और अन्य मुनियों के आश्रम-समूह के केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है।

रम्यश्चित्रकूटोऽयं मम प्रीतिकरो गिरिः ।

उषितुं तत्र वत्स्यामो यावत्कालस्य पर्ययः ॥

अर्थ: यह चित्रकूट पर्वत रमणीय और मुझे प्रिय है यहीं हम काल-परिवर्तन तक निवास करेंगे, ऐसा राम कहते हैं।

वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग ९४



सीतायण की दृष्टि में विशेष महत्त्व का प्रसंग है सीता की माता अनसूया से भेंट, जहाँ अनसूया सीता को पातिव्रत्य और स्त्री-सामर्थ्य पर उपदेश देती हैं तथा दिव्य वस्त्राभूषण प्रदान करती हैं। यह भेंट सीता की आध्यात्मिक परम्परा को तपस्विनी मुनि-नारियों की शृंखला से जोड़ती है , जो आगे चलकर सीतायण के गार्गी-अपाला-अष्टावक्र सन्दर्भ (अध्याय ३ में विवेचित) से भी सामंजस्य रखता है। तुलसीदास इस प्रसंग को भक्ति-रस में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ अनसूया सीता को पतिव्रता धर्म की शिक्षा भक्तिपूर्वक देती हैं। कम्बन के रामावतारम् में चित्रकूट-वर्णन प्रकृति-सौंदर्य और सीता की मनःस्थिति के तमिळ काव्यात्मक चित्रण के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसी पर्व में भरत का चित्रकूट आगमन और राम से भेंट होती है, जहाँ सीता मौन साक्षी रहते हुए भी राजधर्म और भ्रातृ-प्रेम के इस संवाद की केंद्रीय अनुभूता बनती हैं।


पंचवटी — तपस्या और स्थायित्व का प्रतीक


अत्रि-आश्रम से आगे बढ़ते हुए राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकारण्य होते हुए पंचवटी पहुँचते हैं, जहाँ अगस्त्य मुनि के निर्देशानुसार वे दीर्घकालिक निवास स्थापित करते हैं। पंचवटी सीतायण-दृष्टि में सीता के जीवन का वह केंद्र-बिंदु है जहाँ वन्य जीवन एक स्थिर गृहस्थ-तपस्या में परिणत होता है।

इदं बहुफलं श्रीमन्मूलवद्दर्शनीयकम् ।

निर्वृत्तसन्ध्यः काकुत्स्थ रमणीयमिदं वनम् ॥

अर्थ: यह पंचवटी वन बहुफलों से युक्त, दर्शनीय और शोभासम्पन्न है — राम इसकी रमणीयता का वर्णन करते हैं।

वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग १५


यहीं पर्णशाला के निर्माण का प्रसंग आता है, जिसमें सीता की गृहस्थ-चेतना और अभावों में भी संतुलन बनाए रखने की क्षमता प्रकट होती है। तुलसीदास के अनुसार पंचवटी में सीता का जीवन तप और प्रेम के अद्वितीय संगम का उदाहरण प्रस्तुत करता है। कम्बन के रामावतारम् में पंचवटी के प्राकृतिक वर्णन के साथ सीता की मनोदशा का सूक्ष्म चित्रण तमिल रामायण-परम्परा की विशिष्टता है।

पंचवटी में सीता केवल निवासिनी नहीं, अपितु उस तपोभूमि की आत्मा हैं जो आगे चलकर लोकमाता की परीक्षा-स्थली बनने वाली है।



शूर्पणखा-प्रसंग — सीता के प्रति ईर्ष्या और सम्मान की प्रतिच्छाया

पंचवटी में ही शूर्पणखा का आगमन होता है, जो राम के समक्ष विवाह-प्रस्ताव रखती है और अस्वीकृत होने पर सीता को अपने मार्ग की बाधा मानकर आक्रमण करने का प्रयत्न करती है। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि शूर्पणखा का लक्ष्य सीता ही थी — यह प्रथम संकेत है कि सीता आगामी संघर्ष की केंद्रीय धुरी बनने वाली हैं।

इमामनार्यां दुर्भ्गां विवृद्धां त्वदपेक्षया ।

भार्यां वृद्धिं प्रविष्टां च कस्माल्लक्ष्मण मन्यसे ॥

अर्थ: लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा को उत्तर देने के प्रसंग में सीता के प्रति उसकी ईर्ष्या और आक्रामकता स्पष्ट होती है।

— वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग १८



लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नासिका-कर्ण-छेदन का प्रसंग सीतायण की दृष्टि में सीता की रक्षा हेतु उठाया गया सुरक्षा-कदम है, न कि केवल वीरता-प्रदर्शन। तुलसीदास इस प्रसंग को सीता के प्रति उत्पन्न संकट के प्रथम पूर्वाभास के रूप में प्रस्तुत करते हैं। कम्बन के रामावतारम् में शूर्पणखा-प्रसंग का नाटकीय विस्तार विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहाँ उसकी ईर्ष्या और सीता का शील परस्पर विरोधाभास में चित्रित होते हैं।


खर-दूषण वध — सीता की रक्षा हेतु प्रथम युद्ध


अपमानित शूर्पणखा अपने भ्राता खर और दूषण को उकसाती है, जो चौदह सहस्र राक्षस-सेना सहित पंचवटी पर आक्रमण करते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम अकेले ही इस सम्पूर्ण सेना का संहार करते हैं — यह प्रसंग सीतायण-दृष्टि में सीता की सुरक्षा हेतु राम के संकल्प की चरम अभिव्यक्ति है।

एकेन तु धनुष्पाणिः खरं हत्वा महाबलम् ।

दूषणं च त्रिशिरसं तथा राक्षसपुङ्गवौ ॥

अर्थ: धनुष धारण किए राम ने अकेले ही महाबली खर, दूषण और त्रिशिरा — तीनों राक्षस-वीरों का वध किया।

— वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ३०



इस युद्ध के दौरान सीता पर्णशाला में रहती हैं, किन्तु उनकी उपस्थिति ही इस संघर्ष का मूल कारण है ,सीतायण इसे राम के पराक्रम की कथा से आगे बढ़कर सीता के इर्द-गिर्द केंद्रित सुरक्षा-चक्र के रूप में पढ़ता है। तुलसीदास इस प्रसंग में राम की शक्ति और सीता की निश्चिंतता के मध्य विश्वास के सम्बन्ध को उजागर करते हैं।


मारीच वध और सीता-अपहरण — त्याग-पथ की चरम परीक्षा


खर-दूषण वध से क्षुब्ध रावण, शूर्पणखा के उकसावे पर सीता-हरण का संकल्प लेता है। इस हेतु वह मारीच को स्वर्ण-मृग का रूप धारण करने हेतु बाध्य करता है। वाल्मीकि रामायण में सीता स्वयं इस मायावी मृग को देखकर मुग्ध होती हैं और राम से उसे पकड़ने का आग्रह करती हैं — यह प्रसंग सीता की मानवीय सहजता को भी उजागर करता है।

एष वा नियतो राम मृगरूपेण राक्षसः ।

मारीचस्तु महामायो नानाकाराणि दर्शयन् ॥

अर्थ: यह मृग-रूपधारी मारीच नामक राक्षस अवश्य ही महामायावी है, जो नाना रूप दिखाकर छल करता है — लक्ष्मण की यह पूर्व-चेतावनी थी।

वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ४३



राम द्वारा मृग का पीछा किए जाने पर मारीच मरणासन्न अवस्था में राम की ही आवाज़ में 'हे लक्ष्मण! हे सीते!' पुकारता है, जिससे सीता व्याकुल होकर लक्ष्मण को राम की सहायता हेतु भेजती हैं। लक्ष्मणरेखा का प्रसंग — यद्यपि मूल वाल्मीकि रामायण में स्पष्टतः वर्णित नहीं है और परवर्ती परम्परा तथा अद्भुत रामायण एवं लोक-कथाओं में विशेष रूप से विकसित हुआ — सीतायण की दृष्टि में सीता की मर्यादा-चेतना और लक्ष्मण की भक्ति दोनों का प्रतीक है।

इसके पश्चात् रावण साधु-वेष में पर्णशाला पहुँचता है और भिक्षा के छल से सीता को लक्ष्मणरेखा लांघने हेतु प्रवृत्त करता है। सीता का भिक्षा-धर्म निभाना — आतिथ्य-धर्म के प्रति उनकी निष्ठा — ही रावण के छल का आधार बनता है। रावण द्वारा सीता का बलपूर्वक अपहरण और पुष्पक विमान से लंका ले जाना रामायण की केंद्रीय संकट-घटना है।

जानकी त्वपयातेति चुक्रोश करुणं भृशम् ।

हा राम हा लक्ष्मणेति सस्वरं रुरुदे तदा ॥

अर्थ: अपहृत होती हुई जानकी करुण स्वर में पुकार उठीं — "हे राम! हे लक्ष्मण!" — यह क्रन्दन रावण के रथ के साथ आकाश में गूँज उठा।

— वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ४९



इसी क्रम में जटायु का हस्तक्षेप और रावण से युद्ध, तथा जटायु का घायल होना — सीता-रक्षा हेतु प्रथम बलिदान का प्रतीक बनता है। तुलसीदास इस सम्पूर्ण प्रसंग को करुण रस में प्रस्तुत करते हुए सीता के विलाप और जटायु के त्याग को विशेष भक्ति-भाव से चित्रित करते हैं। कम्बन के रामावतारम् में सीता-हरण का प्रसंग तमिळ काव्य-परम्परा की सर्वाधिक मार्मिक रचनाओं में गिना जाता है, जहाँ सीता के मनोभावों का सूक्ष्म अंकन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भवभूति के उत्तररामचरित में — यद्यपि उसका मूल कथानक उत्तरकाण्ड-केंद्रित है — सीता की करुणा और त्याग की मार्मिकता की काव्यात्मक शैली इस प्रसंग की भावभूमि से भी अनुगुंजित होती प्रतीत होती है, यद्यपि यह एक पृथक रचनात्मक परम्परा है।

अद्भुत रामायण की परम्परा में सीता की शक्ति-स्वरूपता का सूत्र इसी अपहरण-प्रसंग से गहनतर अर्थ ग्रहण करता है — जहाँ अपहृत सीता वस्तुतः आदि शक्ति की छाया-प्रतिकृति (माया-सीता) मात्र मानी गई हैं, जबकि वास्तविक सीता अग्नि में सुरक्षित रहती हैं। यह अद्भुत रामायण की विशिष्ट अवधारणा है, जो वाल्मीकि की मूल कथा से भिन्न स्वतंत्र परम्परा के रूप में यहाँ पृथक उल्लिखित है, न कि उसमें विलीन।


उपसंहार — सीतायण की दृष्टि



वनगमन से अपहरण तक की यह सम्पूर्ण यात्रा सीता के जीवन की वह निर्णायक कड़ी है जहाँ त्याग तप में, तप परीक्षा में, और परीक्षा राष्ट्रधर्म की प्रस्तावना में रूपांतरित होती है। पाँचों परम्पराएँ — वाल्मीकि का मूल कथानक, तुलसी की भक्ति-दृष्टि, कम्बन की तमिळ काव्य-चेतना, कालिदास का संक्षिप्त कुल-सन्दर्भ, तथा अद्भुत रामायण की शक्ति-मीमांसा — प्रत्येक अपनी पृथक चेतना के साथ इस सत्य की पुष्टि करती हैं कि सीता इस सम्पूर्ण कथा-चक्र की निष्क्रिय पात्र नहीं, अपितु सक्रिय केंद्र हैं।

वनगमन सीता का प्रस्थान था, चित्रकूट उनकी दीक्षा, पंचवटी उनकी तपोभूमि, और अपहरण उनकी सबसे बड़ी परीक्षा का शंखनाद — प्रत्येक चरण आदि शक्ति के प्रकटीकरण की एक सीढ़ी है।



— राजेन्द्र नाथ तिवारी, सम्पादक

कौटिल्य का भारत दैनिक


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