अहो रूपम्! अहो ध्वनिः
वी के त्रिपाठी,संवाददाता
जब लोकतंत्र स्तुतिगान में बदल जाए
"उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः। परस्परं प्रशंसन्ति — अहो रूपम्! अहो ध्वनिः॥" भारतीय लोकबुद्धि ने हजारों वर्ष पूर्व एक ऐसा व्यंग्य रच दिया था, जो आज के राजनीतिक परिदृश्य का दर्पण प्रतीत होता है। ऊँटों के विवाह में गधे गीत गा रहे हैं और दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा में विभोर हैं। न किसी को अपने दोष दिखाई देते हैं, न दूसरे की सीमाएँ। सब कुछ अद्भुत है, सब कुछ ऐतिहासिक है, सब कुछ अभूतपूर्व है।
आज का सार्वजनिक जीवन भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।
राजनीति में विचारों का स्थान व्यक्तियों ने ले लिया है। संगठन का स्थान दरबारों ने ले लिया है। संवाद का स्थान घोषणाओं ने और आलोचना का स्थान जयघोष ने ले लिया है। जो जितना बड़ा स्तुतिगायक है, वह उतना ही बड़ा रणनीतिकार घोषित कर दिया जाता है। जो जितना बड़ा प्रश्नकर्ता है, वह उतना ही बड़ा संदिग्ध माना जाता है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति असहमति होती है, किंतु आज असहमति को विद्रोह समझा जा रहा है। दलों के भीतर नेतृत्व की समीक्षा लगभग समाप्त हो चुकी है। राजनीतिक दल विचार मंच कम और प्रशंसा मंच अधिक दिखाई देने लगे हैं। वहां नीति पर चर्चा से अधिक व्यक्तित्व की महिमा का वर्णन होता है।
विडंबना यह है कि यह रोग केवल सत्ता तक सीमित नहीं है। विपक्ष भी इससे अछूता नहीं। सत्ता अपने गुणगान में व्यस्त है तो विपक्ष अपने भ्रमों के महिमामंडन में। दोनों ओर ऐसे समूह सक्रिय हैं जो वास्तविकता की बजाय अपने-अपने आख्यानों के संरक्षण में लगे हुए हैं। परिणामस्वरूप जनता के प्रश्न पीछे छूटते जा रहे हैं।
बेरोजगारी पर चर्चा कम है, प्रचार अधिक है। कृषि संकट पर विमर्श कम है, नारे अधिक हैं। शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस कम है, आंकड़ों का प्रदर्शन अधिक है। प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्न कम हैं, उपलब्धियों के विज्ञापन अधिक हैं।दरसल किसी भी लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं होता। वह पहले विचारहीन होता है, फिर व्यक्तिपूजक होता है और अंततः आत्ममुग्ध हो जाता है। आत्ममुग्ध व्यवस्था अपनी गलतियाँ देखना बंद कर देती है। उसे हर निर्णय ऐतिहासिक, हर योजना क्रांतिकारी और हर आलोचक शत्रु दिखाई देने लगता है।
भारतीय परंपरा का वैभव इस बात में नहीं था कि यहाँ राजाओं की प्रशंसा होती थी। उसका वैभव इस बात में था कि यहाँ राजाओं को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया जाता था। जनक को अष्टावक्र चुनौती देते हैं, कृष्ण को अर्जुन प्रश्न करते हैं, बुद्ध स्थापित मान्यताओं से संवाद करते हैं और चाणक्य स्वयं सत्ता को नैतिक बंधनों में बाँधने की बात करते हैं।
आज आवश्यकता नए नारों की नहीं, नए साहस की है—सत्य सुनने का साहस, आलोचना स्वीकार करने का साहस और आत्ममंथन करने का साहस।
अन्यथा इतिहास फिर वही श्लोक दोहराएगा
"उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः। परस्परं प्रशंसन्ति — अहो रूपम्! अहो ध्वनिः॥"और तब लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट विपक्ष या सत्ता नहीं होगा, बल्कि वह सामूहिक आत्ममुग्धता होगी जिसमें समाज स्वयं अपनी विवेक-दृष्टि खो देता है।
क्योंकि राष्ट्रों का निर्माण जय-जयकार से नहीं, सत्य के प्रति निष्ठा से होता है।
"उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः। परस्परं प्रशंसन्ति — अहो रूपम्! अहो ध्वनिः॥" भारतीय लोकबुद्धि ने हजारों वर्ष पूर्व एक ऐसा व्यंग्य रच दिया था, जो आज के राजनीतिक परिदृश्य का दर्पण प्रतीत होता है। ऊँटों के विवाह में गधे गीत गा रहे हैं और दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा में विभोर हैं। न किसी को अपने दोष दिखाई देते हैं, न दूसरे की सीमाएँ। सब कुछ अद्भुत है, सब कुछ ऐतिहासिक है, सब कुछ अभूतपूर्व है।
आज का सार्वजनिक जीवन भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।
राजनीति में विचारों का स्थान व्यक्तियों ने ले लिया है। संगठन का स्थान दरबारों ने ले लिया है। संवाद का स्थान घोषणाओं ने और आलोचना का स्थान जयघोष ने ले लिया है। जो जितना बड़ा स्तुतिगायक है, वह उतना ही बड़ा रणनीतिकार घोषित कर दिया जाता है। जो जितना बड़ा प्रश्नकर्ता है, वह उतना ही बड़ा संदिग्ध माना जाता है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति असहमति होती है, किंतु आज असहमति को विद्रोह समझा जा रहा है। दलों के भीतर नेतृत्व की समीक्षा लगभग समाप्त हो चुकी है। राजनीतिक दल विचार मंच कम और प्रशंसा मंच अधिक दिखाई देने लगे हैं। वहां नीति पर चर्चा से अधिक व्यक्तित्व की महिमा का वर्णन होता है।
विडंबना यह है कि यह रोग केवल सत्ता तक सीमित नहीं है। विपक्ष भी इससे अछूता नहीं। सत्ता अपने गुणगान में व्यस्त है तो विपक्ष अपने भ्रमों के महिमामंडन में। दोनों ओर ऐसे समूह सक्रिय हैं जो वास्तविकता की बजाय अपने-अपने आख्यानों के संरक्षण में लगे हुए हैं। परिणामस्वरूप जनता के प्रश्न पीछे छूटते जा रहे हैं।
बेरोजगारी पर चर्चा कम है, प्रचार अधिक है। कृषि संकट पर विमर्श कम है, नारे अधिक हैं। शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस कम है, आंकड़ों का प्रदर्शन अधिक है। प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्न कम हैं, उपलब्धियों के विज्ञापन अधिक हैं।दरसल किसी भी लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं होता। वह पहले विचारहीन होता है, फिर व्यक्तिपूजक होता है और अंततः आत्ममुग्ध हो जाता है। आत्ममुग्ध व्यवस्था अपनी गलतियाँ देखना बंद कर देती है। उसे हर निर्णय ऐतिहासिक, हर योजना क्रांतिकारी और हर आलोचक शत्रु दिखाई देने लगता है।
भारतीय परंपरा का वैभव इस बात में नहीं था कि यहाँ राजाओं की प्रशंसा होती थी। उसका वैभव इस बात में था कि यहाँ राजाओं को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया जाता था। जनक को अष्टावक्र चुनौती देते हैं, कृष्ण को अर्जुन प्रश्न करते हैं, बुद्ध स्थापित मान्यताओं से संवाद करते हैं और चाणक्य स्वयं सत्ता को नैतिक बंधनों में बाँधने की बात करते हैं।
आज आवश्यकता नए नारों की नहीं, नए साहस की है—सत्य सुनने का साहस, आलोचना स्वीकार करने का साहस और आत्ममंथन करने का साहस।
अन्यथा इतिहास फिर वही श्लोक दोहराएगा
"उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः। परस्परं प्रशंसन्ति — अहो रूपम्! अहो ध्वनिः॥"और तब लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट विपक्ष या सत्ता नहीं होगा, बल्कि वह सामूहिक आत्ममुग्धता होगी जिसमें समाज स्वयं अपनी विवेक-दृष्टि खो देता है।
क्योंकि राष्ट्रों का निर्माण जय-जयकार से नहीं, सत्य के प्रति निष्ठा से होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें