राहुल गांधी ही नहीं, कांग्रेस की वंशवादी राजनीति भी कटघरे में है
बस्ती, राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001
राहुल गांधी की राजनीति को समझना हो तो केवल राहुल गांधी को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उस राजनीतिक संस्कृति को समझना होगा जिसकी नींव दशकों पहले रखी गई थी। कांग्रेस में नेतृत्व का प्रश्न योग्यता, संगठनात्मक क्षमता और जनाधार से अधिक एक परिवार के इर्द-गिर्द क्यों घूमता है, इसका उत्तर इतिहास में छिपा है।Rराजीव गांधीो अक्सर आधुनिक भारत, कंप्यूटर क्रांति और दूरसंचार विस्तार के लिए याद किया जाता है। लेकिन उनकी विरासत का दूसरा पक्ष भी है, जिस पर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। शाह बानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटना, बोफोर्स विवाद से सरकार की साख पर लगा दाग, और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद दिया गया उनका चर्चित बयान—ये सभी घटनाएँ आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं। प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस ने कभी अपने इतिहास की इन विवादित घटनाओं पर आत्ममंथन किया? क्या उसने नेतृत्व को परिवार से बाहर विकसित करने का प्रयास किया? यदि नहीं, तो राहुल गांधी की निरंतर उपस्थिति किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था की कहानी है।आज कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं है। उसकी सबसे बड़ी चुनौती यह धारणा है कि पार्टी में शीर्ष नेतृत्व परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि वंशानुगत परंपरा से तय होता है। जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाएगा, तब तक हर चुनावी हार के बाद बहस भाजपा की जीत पर नहीं, कांग्रेस की संरचना पर होगी।लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार जनता का होता है। जनता सरकारें बदल सकती है, मुख्यमंत्री बदल सकती है, प्रधानमंत्री बदल सकती है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक दल अपने भीतर नेतृत्व परिवर्तन की क्षमता ही खो दे, तो वह धीरे-धीरे एक आंदोलन या विचारधारा नहीं, बल्कि एक परिवार-केंद्रित संस्था बनकर रह जाता है।और यही प्रश्न आज राहुल गांधी से अधिक कांग्रेस के इतिहास, उसकी कार्यशैली और उसकी वंशवादी राजनीति के सामने खड़ा है।

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