अयोध्या, आस्था और उत्तरदायित्व : कौटिल्य दृष्टि से राम मंदिर प्रकरण का गहन विश्लेषण
प्रश्न राम पर नहीं, व्यवस्था पर है
राजेन्द्र नाथ तिवारी
अयोध्या केवल एक नगर नहीं है। वह भारतीय आत्मा का तीर्थ है। वह उस सभ्यता का प्रतीक है जिसने हजारों वर्षों तक आक्रमण, उपहास और संघर्ष सहकर भी अपनी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा। राम मंदिर का निर्माण केवल एक स्थापत्य परियोजना नहीं था, बल्कि वह भारतीय समाज के आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का महायज्ञ था।ऐसे में यदि राम मंदिर ट्रस्ट, दान प्रबंधन, भूमि खरीद अथवा वित्तीय लेन-देन को लेकर जांच की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न उठते हैं। इन प्रश्नों को न तो राष्ट्रविरोध कहा जा सकता है और न ही धर्मविरोध।
अयोध्या केवल एक नगर नहीं है। वह भारतीय आत्मा का तीर्थ है। वह उस सभ्यता का प्रतीक है जिसने हजारों वर्षों तक आक्रमण, उपहास और संघर्ष सहकर भी अपनी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा। राम मंदिर का निर्माण केवल एक स्थापत्य परियोजना नहीं था, बल्कि वह भारतीय समाज के आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का महायज्ञ था।ऐसे में यदि राम मंदिर ट्रस्ट, दान प्रबंधन, भूमि खरीद अथवा वित्तीय लेन-देन को लेकर जांच की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न उठते हैं। इन प्रश्नों को न तो राष्ट्रविरोध कहा जा सकता है और न ही धर्मविरोध।वास्तव में प्रश्न राम पर नहीं है, प्रश्न व्यवस्था पर है।राम भारतीय संस्कृति में सत्य, न्याय और मर्यादा के प्रतीक हैं। इसलिए राम के नाम पर संचालित किसी भी संस्था को स्वयं को सत्य और पारदर्शिता की कसौटी पर प्रस्तुत करने में कोई भय नहीं होना चाहिए।
राम मंदिर : पांच शताब्दियों के संघर्ष का परिणाम:राम मंदिर का इतिहास केवल एक भवन का इतिहास नहीं है। यह भारतीय समाज के धैर्य, संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृति का इतिहास है।1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा मंदिर ध्वंस के आरोपों से प्रारम्भ हुआ विवाद सदियों तक चलता रहा। लाखों लोगों ने संघर्ष किया। हजारों ने बलिदान दिए।स्वतंत्र भारत में भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।,न्यायालयों में मुकदमे चले।,राजनीतिक संघर्ष हुए।सामाजिक आंदोलन चले।अंततः सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।इसलिए यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है।यह करोड़ों भारतीयों की आस्था का राष्ट्रमंदिर है।जब आस्था से जुड़ा धन सार्वजनिक उत्तरदायित्व बन जाता है
राम मंदिर : पांच शताब्दियों के संघर्ष का परिणाम:राम मंदिर का इतिहास केवल एक भवन का इतिहास नहीं है। यह भारतीय समाज के धैर्य, संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृति का इतिहास है।1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा मंदिर ध्वंस के आरोपों से प्रारम्भ हुआ विवाद सदियों तक चलता रहा। लाखों लोगों ने संघर्ष किया। हजारों ने बलिदान दिए।स्वतंत्र भारत में भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।,न्यायालयों में मुकदमे चले।,राजनीतिक संघर्ष हुए।सामाजिक आंदोलन चले।अंततः सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।इसलिए यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है।यह करोड़ों भारतीयों की आस्था का राष्ट्रमंदिर है।जब आस्था से जुड़ा धन सार्वजनिक उत्तरदायित्व बन जाता है
भारत में मंदिरों में दिया जाने वाला दान केवल आर्थिक लेन-देन नहीं होता।वह श्रद्धा की अभिव्यक्ति होता है।
जब कोई गरीब किसान सौ रुपये चढ़ाता है, जब कोई महिला अपनी बचत का आभूषण समर्पित करती है, जब कोई प्रवासी भारतीय करोड़ों का दान देता है, तब वे केवल धन नहीं देते—वे विश्वास सौंपते हैं।यही कारण है कि धार्मिक संस्थाओं का उत्तरदायित्व सामान्य संस्थाओं से कहीं अधिक होता है।दान का प्रत्येक रुपया सार्वजनिक विश्वास का प्रतीक होता है।
इसलिए यदि उस धन के उपयोग को लेकर कोई प्रश्न उठता है, तो उसका उत्तर भी सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र क्या कहता है?कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कोष को राज्य की शक्ति का आधार माना है।
उन्होंने लिखा:"कोष मूलो दण्डः, दण्ड मूलं राज्यं।"अर्थात् आर्थिक शुचिता के बिना व्यवस्था टिक नहीं सकती।
कौटिल्य का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों पर निरंतर निगरानी आवश्यक है।उन्होंने अधिकारियों की जांच के लिए गुप्त परीक्षणों तक की व्यवस्था बताई थी।
क्यों?क्योंकि कौटिल्य मानव स्वभाव को समझते थे।वे जानते थे कि जहां धन है, वहां प्रलोभन भी होगा।इसीलिए वे पारदर्शिता को दंड नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुरक्षा मानते थे।आज यदि राम मंदिर ट्रस्ट के संबंध में कोई जांच हो रही है तो कौटिल्य की दृष्टि में यह व्यवस्था की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति का संकेत होना चाहिए।क्या जांच का अर्थ अपराध सिद्ध होना है?आज भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जांच शुरू होते ही समाज दो खेमों में बंट जाता है।
जब कोई गरीब किसान सौ रुपये चढ़ाता है, जब कोई महिला अपनी बचत का आभूषण समर्पित करती है, जब कोई प्रवासी भारतीय करोड़ों का दान देता है, तब वे केवल धन नहीं देते—वे विश्वास सौंपते हैं।यही कारण है कि धार्मिक संस्थाओं का उत्तरदायित्व सामान्य संस्थाओं से कहीं अधिक होता है।दान का प्रत्येक रुपया सार्वजनिक विश्वास का प्रतीक होता है।
इसलिए यदि उस धन के उपयोग को लेकर कोई प्रश्न उठता है, तो उसका उत्तर भी सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र क्या कहता है?कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कोष को राज्य की शक्ति का आधार माना है।
उन्होंने लिखा:"कोष मूलो दण्डः, दण्ड मूलं राज्यं।"अर्थात् आर्थिक शुचिता के बिना व्यवस्था टिक नहीं सकती।
कौटिल्य का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों पर निरंतर निगरानी आवश्यक है।उन्होंने अधिकारियों की जांच के लिए गुप्त परीक्षणों तक की व्यवस्था बताई थी।
क्यों?क्योंकि कौटिल्य मानव स्वभाव को समझते थे।वे जानते थे कि जहां धन है, वहां प्रलोभन भी होगा।इसीलिए वे पारदर्शिता को दंड नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुरक्षा मानते थे।आज यदि राम मंदिर ट्रस्ट के संबंध में कोई जांच हो रही है तो कौटिल्य की दृष्टि में यह व्यवस्था की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति का संकेत होना चाहिए।क्या जांच का अर्थ अपराध सिद्ध होना है?आज भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जांच शुरू होते ही समाज दो खेमों में बंट जाता है।
एक पक्ष कहता है कि आरोप सिद्ध हो गए।दूसरा पक्ष कहता है कि जांच ही नहीं होनी चाहिए।दोनों दृष्टिकोण लोकतांत्रिक नहीं हैं।जांच केवल सत्य तक पहुंचने का माध्यम है।कानून का मूल सिद्धांत है:"जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष है।"
इसलिए न तो किसी को पहले से दोषी घोषित किया जाना चाहिए और न ही किसी को जांच से ऊपर माना जाना चाहिए।
रामराज्य का वास्तविक अर्थ:रामराज्य का अर्थ केवल मंदिर निर्माण नहीं है।रामराज्य का अर्थ है,न्याय।पारदर्शिता।उत्तरदायित्व।समान कानून।लोकविश्वास।यदि रामराज्य में एक सामान्य नागरिक जांच के दायरे में आ सकता है, तो राम के नाम पर चलने वाली संस्था भी जांच से परे नहीं हो सकती।वास्तव में रामराज्य की अवधारणा यही कहती है कि सबसे अधिक नैतिक अपेक्षा उन्हीं से की जाएगी जो स्वयं को धर्म प्रतिनिधि बताते हैं।
इसलिए न तो किसी को पहले से दोषी घोषित किया जाना चाहिए और न ही किसी को जांच से ऊपर माना जाना चाहिए।
रामराज्य का वास्तविक अर्थ:रामराज्य का अर्थ केवल मंदिर निर्माण नहीं है।रामराज्य का अर्थ है,न्याय।पारदर्शिता।उत्तरदायित्व।समान कानून।लोकविश्वास।यदि रामराज्य में एक सामान्य नागरिक जांच के दायरे में आ सकता है, तो राम के नाम पर चलने वाली संस्था भी जांच से परे नहीं हो सकती।वास्तव में रामराज्य की अवधारणा यही कहती है कि सबसे अधिक नैतिक अपेक्षा उन्हीं से की जाएगी जो स्वयं को धर्म प्रतिनिधि बताते हैं।
विश्व के धार्मिक संस्थानों से सीख:दुनिया के बड़े धार्मिक संस्थान अपनी वित्तीय पारदर्शिता को प्रतिष्ठा का विषय मानते हैं।
चर्च, यहूदी संस्थान, बौद्ध संगठन और अनेक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक ट्रस्ट नियमित ऑडिट रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं।वे जानते हैं कि पारदर्शिता से विश्वास बढ़ता है।गोपनीयता से संदेह बढ़ता है।भारत की धार्मिक संस्थाओं को भी इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। आज का श्रद्धालु केवल भक्त नहीं है।वह जागरूक नागरिक भी है।वह प्रश्न पूछेगा।और उसे उत्तर भी चाहिए।राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र,दुर्भाग्य से भारत में हर मुद्दा राजनीति का विषय बन जाता है।यदि किसी मंदिर पर प्रश्न उठे तो कुछ लोग इसे हिंदुत्व पर हमला बताते हैं।यदि किसी अन्य धार्मिक संस्था पर प्रश्न उठे तो वही लोग पारदर्शिता की मांग करने लगते हैं।दूसरी ओर कुछ लोग केवल इसलिए मंदिरों को निशाना बनाते हैं क्योंकि उनका वैचारिक विरोध है।
दोनों पक्ष सत्य से दूर हैं,सत्य न तो अंधसमर्थन में है और न अंधविरोध में।सत्य केवल तथ्यों में है।
दोनों पक्ष सत्य से दूर हैं,सत्य न तो अंधसमर्थन में है और न अंधविरोध में।सत्य केवल तथ्यों में है।
सबसे बड़ा संकट : नैतिक नेतृत्व का अभाव:भारत की सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसके नेतृत्व में नैतिक बल था।राजा हरिश्चंद्र।राम।युधिष्ठिर।जनक।चाणक्य।इन सबकी सबसे बड़ी शक्ति चरित्र थी।आज भारत का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं है।नैतिक है।जब समाज के आदर्श संस्थान भी संदेह के घेरे में आते हैं, तब समाज की आत्मा आहत होती है।इसलिए आवश्यक है कि धार्मिक संस्थाएं स्वयं पारदर्शिता का मानक बनें।यदि आरोप झूठे हैं तो?यदि जांच में सभी आरोप निराधार सिद्ध होते हैं तो इससे राम मंदिर ट्रस्ट की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी।संदेह समाप्त होगा।विश्वास मजबूत होगा।
और यह संदेश जाएगा कि भारत की संस्थाएं जांच से डरती नहीं हैं।यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो?यदि कहीं अनियमितता सिद्ध होती है तो भी उसे छिपाने के बजाय सुधारना चाहिए।राम का नाम किसी व्यक्ति से बड़ा है।राम मंदिर किसी पदाधिकारी से बड़ा है।राष्ट्र किसी संगठन से बड़ा है।जो व्यक्ति या संस्था राम के नाम पर कार्य कर रही है, उसकी पहली निष्ठा राम के आदर्शों के प्रति होनी चाहिए।
कौटिल्य दृष्टि : आस्था की रक्षा का एकमात्र मार्ग:कौटिल्य कहते हैं कि राज्य और समाज का आधार विश्वास है।विश्वास का आधार सत्य है।और सत्य का आधार पारदर्शिता है।इसलिए जो लोग वास्तव में राम मंदिर की प्रतिष्ठा चाहते हैं, उन्हें जांच से भयभीत नहीं होना चाहिए।क्योंकि जांच मंदिर की नहीं, व्यवस्था की होती है।आस्था की नहीं, प्रशासन की होती है।राम की नहीं, मनुष्यों की होती है।राम सत्य में हैं, व्यक्ति में नहीं,अयोध्या का प्रश्न केवल एक ट्रस्ट या कुछ पदाधिकारियों का प्रश्न नहीं है।यह भारत के भविष्य का प्रश्न है।क्या हम ऐसी व्यवस्था बनाना चाहते हैं जहां आस्था और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें?
और यह संदेश जाएगा कि भारत की संस्थाएं जांच से डरती नहीं हैं।यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो?यदि कहीं अनियमितता सिद्ध होती है तो भी उसे छिपाने के बजाय सुधारना चाहिए।राम का नाम किसी व्यक्ति से बड़ा है।राम मंदिर किसी पदाधिकारी से बड़ा है।राष्ट्र किसी संगठन से बड़ा है।जो व्यक्ति या संस्था राम के नाम पर कार्य कर रही है, उसकी पहली निष्ठा राम के आदर्शों के प्रति होनी चाहिए।
कौटिल्य दृष्टि : आस्था की रक्षा का एकमात्र मार्ग:कौटिल्य कहते हैं कि राज्य और समाज का आधार विश्वास है।विश्वास का आधार सत्य है।और सत्य का आधार पारदर्शिता है।इसलिए जो लोग वास्तव में राम मंदिर की प्रतिष्ठा चाहते हैं, उन्हें जांच से भयभीत नहीं होना चाहिए।क्योंकि जांच मंदिर की नहीं, व्यवस्था की होती है।आस्था की नहीं, प्रशासन की होती है।राम की नहीं, मनुष्यों की होती है।राम सत्य में हैं, व्यक्ति में नहीं,अयोध्या का प्रश्न केवल एक ट्रस्ट या कुछ पदाधिकारियों का प्रश्न नहीं है।यह भारत के भविष्य का प्रश्न है।क्या हम ऐसी व्यवस्था बनाना चाहते हैं जहां आस्था और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें?
या ऐसी व्यवस्था जहां प्रश्न पूछना अपराध माना जाए?राम का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता से बड़ा धर्म है और धर्म से बड़ा सत्य।यदि राम मंदिर भारत की आत्मा का प्रतीक है, तो उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसके स्वर्ण शिखर नहीं, बल्कि उसकी निष्कलंक प्रतिष्ठा होनी चाहिए।अंततः विजय किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की नहीं होगी।विजय सत्य की होगी।
विजय मर्यादा की होगी।विजय उस विश्वास की होगी जिसने पांच सौ वर्षों तक संघर्ष कर रामलला को पुनः उनके जन्मस्थान पर विराजमान किया।राम मंदिर की रक्षा पत्थरों से नहीं, पारदर्शिता से होगी।और यही कौटिल्य दृष्टि का अंतिम निष्कर्ष है।
कौटिल्य का भारत“जहाँ आस्था हो, वहाँ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए; क्योंकि विश्वास ही राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी है।”
विजय मर्यादा की होगी।विजय उस विश्वास की होगी जिसने पांच सौ वर्षों तक संघर्ष कर रामलला को पुनः उनके जन्मस्थान पर विराजमान किया।राम मंदिर की रक्षा पत्थरों से नहीं, पारदर्शिता से होगी।और यही कौटिल्य दृष्टि का अंतिम निष्कर्ष है।
कौटिल्य का भारत“जहाँ आस्था हो, वहाँ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए; क्योंकि विश्वास ही राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी है।”
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