कौटिल्य उवाच
विषपान की राजनीति और विपक्ष की वैचारिक विडंबना
राजेन्द्र नाथ तिवारी 272001भारतीय राजनीति में प्रतीकों का हमेशा महत्व रहा है। कोई स्वयं को गांधी का उत्तराधिकारी बताता है, कोई लोहिया का, कोई अंबेडकर का और कोई शिवाजी का। किंतु लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां प्रतीकों से अधिक महत्व परिणामों का होता है। जनता अंततः यह नहीं देखती कि नेता स्वयं की तुलना किससे कर रहा है, बल्कि यह देखती है कि वह देश और समाज को किस दिशा में ले जाने की क्षमता रखता है।हाल के दिनों में राहुल गांधी द्वारा स्वयं को भगवान शिव की भांति "विषपान" करने वाला बताने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में व्यापक रूप से हुई। यह वक्तव्य केवल एक धार्मिक प्रतीक का प्रयोग नहीं था, बल्कि उसमें एक राजनीतिक संदेश भी छिपा था—यह संदेश कि वे संघर्ष कर रहे हैं, त्याग कर रहे हैं और विरोध का भार अपने ऊपर उठा रहे हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राजनीति में केवल पीड़ित होने का भाव नेतृत्व का प्रमाण बन सकता है?
राजनीति में संघर्ष का सम्मान होता है, लेकिन संघर्ष का अंतिम मूल्यांकन परिणामों से होता है। यदि कोई नेता वर्षों तक संघर्ष की ही कथा सुनाता रहे और जनता को यह न बता सके कि उसके पास भविष्य की क्या योजना है, तो धीरे-धीरे संघर्ष का आख्यान भी प्रभाव खोने लगता है। दरअसल आज विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं है। उसकी सबसे बड़ी समस्या उसका अपना वैचारिक और रणनीतिक भ्रम है। भारतीय जनता पार्टी के पास कम से कम एक स्पष्ट राजनीतिक कथा है,राष्ट्रवाद, विकास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मजबूत नेतृत्व। उससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है।
इसके विपरीत विपक्ष के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह जनता को यह समझाने में असफल रहा है कि वह सत्ता में आकर देश को किस नई दिशा में ले जाएगा। सरकार की आलोचना करना आसान है, लेकिन वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना कठिन। यही वह परीक्षा है जिसमें विपक्ष बार-बार कमजोर दिखाई देता है। यदि वास्तव में इंडिया गठबंधन की बैठकों में राहुल गांधी ने अपने सहयोगियों को यह सलाह दी कि "चुनाव इस तरह नहीं जीते जाते", तो यह कथन अपने आप में कई प्रश्नों को जन्म देता है। आखिर चुनाव जीतने का सही तरीका क्या है? क्या कांग्रेस ने पिछले एक दशक में ऐसा कोई मॉडल प्रस्तुत किया है जिसे अन्य दल अपनाना चाहें? क्या कांग्रेस स्वयं उन राज्यों में लगातार मजबूत हुई है जहां कभी उसका निर्विवाद वर्चस्व था?
राजनीति में सलाह वही प्रभावी होती है जिसके पीछे सफलता का अनुभव खड़ा हो। अन्यथा वह सलाह कम और असंतोष अधिक प्रतीत होती है। वास्तविकता यह है कि आज विपक्षी गठबंधन का प्रत्येक प्रमुख दल अपने राज्य में स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण मानता है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, बिहार में तेजस्वी यादव, तमिलनाडु में डीएमके—इन सभी की अपनीराजनीतिक जमीन है। ऐसे में कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व सभी स्वीकार कर लें, यह अब पहले जैसा सहज नहीं रह गया है।
यहीं से हताशा जन्म लेती है।जब कोई दल अपने ऐतिहासिक गौरव और वर्तमान राजनीतिक शक्ति के बीच बढ़ती दूरी को महसूस करता है, तब वह अक्सर आत्ममंथन के बजाय बाहरी कारणों की तलाश करने लगता है। कभी ईवीएम पर प्रश्न उठते हैं, कभी मीडिया पर, कभी संस्थाओं पर, कभी सहयोगियों पर। किंतु इतिहास बताता है कि कोई भी राजनीतिक दल केवल शिकायतों के आधार पर पुनर्जीवित नहीं हुआ। पुनर्जीवन का आधार संगठन, विचार और नेतृत्व होता है। भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने पराजय को भी अवसर में बदला। एक वोट से सरकार गिरने के बाद उन्होंने निराशा का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने भविष्य की संभावना देखी। उनके शब्दों में आत्मविश्वास था, शिकायत नहीं। यही कारण है कि पराजय की उस घटना को आज भी लोग स्मरण करते हैं।इसके विपरीत जो राजनीति स्वयं को लगातार पीड़ित सिद्ध करने में लगी रहती है, वह धीरे-धीरे जनता की संवेदना तो प्राप्त कर सकती है, लेकिन विश्वास नहीं। और लोकतंत्र में सत्ता संवेदना से नहीं, विश्वास से प्राप्त होती है।
आज भारत की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। मतदाता जातीय समीकरणों और पारंपरिक नारों से आगे बढ़कर नेतृत्व की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति और राष्ट्रीय दृष्टि को भी महत्व दे रहा है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों के लिए केवल विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं रह गई है। उन्हें वैकल्पिक भारत का खाका भी प्रस्तुत करना होगा।
राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता को पुनर्परिभाषित करने की है। जब तक कांग्रेस यह तय नहीं कर लेती कि वह 21वीं सदी के भारत में किस विचार का प्रतिनिधित्व करती है, तब तक उसके लिए राजनीतिक पुनरुत्थान का मार्ग कठिन रहेगा।लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना उतना ही आवश्यक है जितना सरकार का मजबूत होना। लेकिन मजबूत विपक्ष बनने के लिए केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि स्वयं को विश्वसनीय विकल्प सिद्ध करना पड़ता है। यही वह कसौटी है जिस पर आज भारतीय विपक्ष खड़ा है।
कौटिल्य उवाच :
"राज्य का शत्रु वह नहीं जो बाहर खड़ा है; राज्य का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है जब नेतृत्व अपनी दुर्बलताओं को पहचानना छोड़ देता है। जो सेनापति प्रत्येक पराजय का दोष दूसरों पर डालता है, वह अगली विजय की संभावना स्वयं समाप्त कर देता है।""विषपान का दावा करने से कोई नीलकंठ नहीं बन जाता। नीलकंठ वह है जो विष को शक्ति में बदल दे; जो विष से ही व्यथा का व्यापार करे, वह इतिहास नहीं, केवल शिकायत लिखता है।"

सुन्दर लेख गुरु जी
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