आस्था की देहरी पर प्रश्नचिह्न, अब समीक्षा नहीं, उत्तरदायित्व तय करने का समय,राम जन्मभूमि केवल एक मंदिर नहीं है। यह उन असंख्य कारसेवकों के रक्त, संतों के तप, करोड़ों हिंदुओं की प्रतीक्षा और भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का जीवंत प्रतीक है। जिस स्थान के लिए पीढ़ियाँ संघर्ष करती रहीं, जहां पहुंचने के लिए अनेक लोगों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया, उस स्थान से यदि दान, प्रबंधन अथवा व्यवस्था संबंधी गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता,यह सीधे सनातन समाज की आत्मा को उद्वेलित करता है।
कहा जाता है कि जहां धन होता है, वहां फिसलन भी होती है। परंतु राम जन्मभूमि कोई सामान्य संस्था नहीं है। यहां दान देने वाला व्यक्ति केवल रुपये नहीं देता, वह अपना विश्वास समर्पित करता है। उसकी दक्षिणा में उसकी श्रद्धा, उसका प्रेम और उसकी भावनात्मक भागीदारी भी शामिल होती है। इसलिए यदि उस विश्वास पर किसी भी प्रकार का आघात होता है, तो उसका प्रभाव लेखा-पुस्तकों से कहीं अधिक व्यापक होता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि कथित अनियमितता हुई या नहीं हुई। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि कोई गड़बड़ी हुई, तो वह हुई कैसे? पर्यवेक्षण की व्यवस्था कहां थी? उत्तरदायी पदों पर बैठे लोग क्या कर रहे थे? क्या सब कुछ उनकी आंखों के सामने हुआ, या वे इतने निष्क्रिय थे कि उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दिया? दोनों स्थितियां गंभीर हैं।शास्त्र स्पष्ट कहते हैंकि
"राजा कालस्य कारणम्"
अर्थात व्यवस्था का स्वरूप उसके नेतृत्व से निर्धारित होता है।
यदि किसी संस्था में अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व नहीं है, तो उसके लिए केवल छोटे कर्मचारियों को दोषी ठहराकर दायित्व समाप्त नहीं किया जा सकता। किसी भी संस्थान में चोरी करने वाले से बड़ा दोष उस व्यवस्था का होता है जो चोरी को रोक नहीं सकी।आज करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में एक पीड़ा है। यह पीड़ा किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं, बल्कि उस संभावना के प्रति है कि कहीं वर्षों के संघर्ष से अर्जित नैतिक ऊंचाई को कुछ लोगों की लापरवाही अथवा स्वार्थ ने क्षति तो नहीं पहुंचाई। याद रखिए, अयोध्या का मंदिर न्यायालय के निर्णय से बना होगा, पर उसकी आत्मा जनविश्वास से बनी है। यदि जनविश्वास पर आघात हुआ तो पत्थर खड़े रहेंगे, लेकिन भावनाएं घायल हो जाएंगी।
इसलिए अब केवल बयान पर्याप्त नहीं हैं। केवल खंडन-मंडन पर्याप्त नहीं है। केवल जांच समितियां पर्याप्त नहीं हैं। यदि कहीं दोष है तो दोषी सामने आएं। यदि कहीं लापरवाही है तो उत्तरदायी चिन्हित हों। यदि कहीं मिलीभगत है तो कठोर कार्रवाई हो। और यदि प्रबंधन असफल सिद्ध हुआ है तो पुनर्गठन हो।
कबीर ने कहा था—
"निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।"
परंतु यहां स्थिति उससे आगे की है। यहां आलोचना नहीं, आत्ममंथन की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है कि सरकार, ट्रस्ट, संघ परिवार और सभी संबंधित संस्थाएं मिलकर यह संदेश दें कि राम के नाम पर बना कोई भी संस्थान संदेह से ऊपर रहेगा। पारदर्शिता केवल प्रशासनिक शब्द नहीं, बल्कि धार्मिक दायित्व होगी।क्योंकि इतिहास बहुत निर्मम होता है। वह यह नहीं पूछता कि दोषी कौन था; वह यह पूछता है कि जब दोष सामने आया तब संरक्षक क्या कर रहे थे।गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा—परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।"यदि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पीड़ित होती है, तो उससे बड़ी अधर्म की स्थिति क्या हो सकती है?
आज प्रश्न केवल दान राशि का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राम के नाम पर बनी व्यवस्था राम के आदर्शों के अनुरूप है? क्या वहां वह मर्यादा, वह शुचिता, वह उत्तरदायित्व है जिसकी अपेक्षा समाज करता है?और यदि नहीं है, तो फिर सुधार का समय कल नहीं, आज है।प्रधानमंत्री, सरकार, ट्रस्ट और समस्त संरक्षक तंत्र को यह समझना होगा कि राम मंदिर किसी संगठन, व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी उपलब्धि नहीं है। यह राष्ट्र की सामूहिक साधना का परिणाम है।
इसलिए यदि कहीं विषबेल उगी है तो केवल उसकी पत्तियां मत काटिए। जड़ तक जाइए। क्योंकि उपेक्षा से पनपा हुआ विष एक दिन फिर दंश देता है।और तब इतिहास यही पूछेगा"डूबती कश्ती को देखा तो पुकार उठी जनताऐ नाविक! तूफान से पहले तुझ पर बड़ा इल्जाम है।"राम मंदिर की रक्षा पत्थरों से नहीं होगी, विश्वास की रक्षा से होगी और विश्वास बचाने का एक ही मार्ग है—निर्भीक जांच, स्पष्ट उत्तरदायित्औ अपेक्षित निष्पक्ष कार्रवाई करिए महराज,!
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