मानदेय के साथ, न्याय का मूल्य भी बढ़ना चाहिए,योगी सरकार के निर्णय पर कौटिल्य दृष्टि!
बस्ती,वशिष्ठ नगर,मनोज यादव,संवाददाता,272001
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी अधिवक्ताओं के मानदेय और भत्तों में वृद्धि का निर्णय लिया है। प्रथम दृष्टया यह एक प्रशासनिक निर्णय प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर शासन, न्याय और राज्य की प्राथमिकताओं का एक गहरा संदेश भी छिपा है। किसी भी सभ्य राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना, सड़कें या भवन मात्र नहीं होते; उसकी वास्तविक शक्ति उसकी न्याय व्यवस्था होती है। न्यायालयों में राज्य का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता यदि सम्मानजनक पारिश्रमिक नहीं पाएँगे, तो उनसे उत्कृष्ट कार्य की अपेक्षा भी अधूरी रहेगी। इस दृष्टि से यह निर्णय स्वागत योग्य है।
किन्तु कौटिल्य का प्रश्न इससे आगे जाता है।क्या मानदेय बढ़ने से न्याय भी तेज होगा?क्या पीड़ित को समय पर न्याय मिलेगा? क्या अपराधियों के विरुद्ध मुकदमों की प्रभावी पैरवी होगी?यदि इन प्रश्नों का उत्तर "हाँ" नहीं है, तो बढ़ा हुआ मानदेय केवल सरकारी व्यय बनकर रह जाएगा।
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राज्य का मूल धर्म बताया था— दण्ड और न्याय की निष्पक्ष व्यवस्था। उनका मानना था कि जहाँ न्याय दुर्बल होता है, वहाँ अपराधी शक्तिशाली हो जाते हैं और प्रजा का राज्य पर विश्वास कम होने लगता है। आज भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि न्याय महँगा है, बल्कि यह है कि न्याय बहुत देर से मिलता है। लाखों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। कई बार पीड़ित न्याय मिलने से पहले ही जीवन की लड़ाई हार जाता है। ऐसे समय में यदि सरकार अधिवक्ताओं का मानदेय बढ़ा रही है, तो साथ ही उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि
मुकदमों की पैरवी समयबद्ध हो,दोषियों को शीघ्र दंड मिले,सरकारी मुकदमों में अनावश्यक विलंब समाप्त हो,और न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास और मजबूत हो।कौटिल्य शायद आज होते तो कहते"राजकोष से निकला धन तभी पुण्य है, जब वह प्रजा को सुरक्षा, न्याय और विश्वास लौटाए।"
सरकारी वकीलों की फीस बढ़ाना अच्छा कदम है, परंतु इतिहास इसे तभी याद रखेगा जब इसके परिणामस्वरूप न्यायालयों में लंबित फाइलों की संख्या घटेगी, अपराधियों को शीघ्र दंड मिलेगा और आम नागरिक यह महसूस करेगा कि राज्य केवल मुकदमे लड़ नहीं रहा, बल्कि न्याय दिला रहा है।क्योंकि अंततः मानदेय का नहीं, न्याय का मूल्य बढ़ना चाहिए।
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