संघ पर सवाल और कांग्रेस की वैचारिक पराजय
राजेंद्र नाथ तिवारी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रश्न उठाना कोई नई बात नहीं है। विडंबना यह है कि जिस संगठन को कभी कुछ लोग "कुछ वर्षों का अतिथि" मानते थे, वह आज अपने शताब्दी वर्ष की पूर्णता कर करहा और उसके विरोधी अभी भी उसी प्रश्न पर खड़े हैं कि आखिर संघ है क्या?1948 से लेकर 2026 तक का इतिहास उठाकर देख लीजिए। प्रतिबंध लगे, आरोप लगे, दुष्प्रचार हुआ, न्यायालयों में चुनौतियाँ दी गईं, संसद में आलोचना हुई, विश्वविद्यालयों में वैचारिक हमले हुए, मीडिया के एक बड़े वर्ग ने भी लगातार निशाना बनाया; लेकिन संघ न केवल जीवित रहा, बल्कि निरंतर विस्तारित होता गया। यह किसी राजनीतिक चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि समाज के भीतर उसकी गहरी जड़ों का प्रमाण है।
आज कुछ लोग पूछ रहे हैं कि संघ अपने आय-व्यय का विवरण क्यों नहीं देता? प्रश्न पूछना लोकतंत्र का अधिकार है। लेकिन प्रश्न का उद्देश्य सत्य की खोज होना चाहिए, पूर्वाग्रह की पुष्टि नहीं। यदि किसी संस्था पर भारतीय कानून के अंतर्गत कोई वैधानिक दायित्व है तो उसका पालन होना चाहिए। भारत में संविधान सर्वोपरि है और कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।किन्तु बिना किसी न्यायिक निर्णय, बिना किसी सरकारी निष्कर्ष और बिना किसी प्रमाण के किसी संगठन पर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगा देना राजनीतिक हताशा का परिचायक है। लोकतंत्र में आरोपों का नहीं, प्रमाणों का महत्व होता है।
वास्तविकता यह है कि संघ को समझने में कांग्रेस की कई पीढ़ियाँ असफल रही हैं। जवाहरलाल नेहरू के समय से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व तक संघ को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की दृष्टि से देखा गया। उन्होंने संघ को वोट की राजनीति के तराजू पर तौलने का प्रयास किया, जबकि संघ स्वयं को राष्ट्र जीवन के सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का माध्यम मानता रहा।
यही कारण है कि कांग्रेस संघ का विरोध तो कर सकी, पर उसका विकल्प नहीं बन सकी।आज देश के हजारों गाँवों, कस्बों और नगरों में संघ के स्वयंसेवक शिक्षा, सेवा, आपदा राहत, सामाजिक समरसता और राष्ट्रचेतना के कार्यों में लगे हुए हैं। करोड़ों भारतीय संघ को किसी राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि संघ पर जितने आक्रमण हुए, उसका विस्तार उतना ही बढ़ा।इतिहास साक्षी है कि विचारों को प्रतिबंधों से नहीं रोका जा सकता। यदि ऐसा होता तो भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन भी कभी सफल नहीं होता। संघ की शक्ति किसी सरकारी अनुदान, किसी विदेशी सहायता या किसी सत्ता केंद्र से नहीं, बल्कि उसके स्वयंसेवकों की निष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रभावना से आती है। इसी कारण उसका प्रभाव सत्ता परिवर्तन के साथ घटता-बढ़ता नहीं है।
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या संघ नहीं, बल्कि उसका अपना वैचारिक भ्रम है। जिस दल ने कभी स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था, वह आज अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा है। दूसरी ओर संघ, अपने समर्थकों की दृष्टि में, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक संगठन के प्रतीक के रूप में स्थापित है।इसलिए प्रश्न संघ पर नहीं, कांग्रेस की वैचारिक दृष्टि पर भी उठते हैं। सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यदि कोई राजनीतिक दल संघ को केवल आरोपों और आशंकाओं के माध्यम से ही देख रहा है, तो यह उसकी वैचारिक सीमाओं का प्रमाण है।
संघ का समर्थन या विरोध किया जा सकता है, लेकिन उसके प्रभाव और उसकी सामाजिक उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता। यही वह तथ्य है जिसने विरोधियों को बेचैन किया है और यही वह कारण है कि संघ पर बहस जितनी पुरानी होती जा रही है, संघ उतना ही अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।राष्ट्र जीवन में किसी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके भवनों, बैंकों या संसाधनों से नहीं मापी जाती; उसकी शक्ति उसके विचार, उसके कार्य और समाज में उसकी स्वीकार्यता से मापी जाती है। और यही वह कसौटी है जिस पर संघ को समझे बिना उसके विरोध की राजनीति बार-बार पराजित होती रही है।
कांग्रेस और उसकी संतति को संघ को आंख दिखाने के दिवास्वप्न से बचना चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें