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बुधवार, 13 मई 2026

“नेपाल की नई कूटनीति: चीन के छल की की छाया में भारत को संदेश?”

 राजेंद्र नाथ तिवारी, नेपाल में आरएसएस के पूर्व प्रचारक 

हिमालय की छाया में चीन का खेल: क्या नेपाल “ड्रैगन कार्ड” दिखाकर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहा है?

छवि, गूगल से साभार 

हिमालय केवल बर्फ की पर्वतमाला नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक परंपरा और सामरिक सुरक्षा का जीवंत प्रहरी है। इसी हिमालय की गोद में स्थित नेपाल आज दक्षिण एशिया की उस भू-राजनीतिक शतरंज का केंद्र बन गया है, जहाँ एक ओर भारत की सहस्राब्दियों पुरानी आत्मीयता है, तो दूसरी ओर चीन की विस्तारवादी कूटनीति। पिछले कुछ वर्षों में नेपाल की राजनीति, विदेश नीति और आर्थिक गतिविधियों में चीन की बढ़ती सक्रियता ने भारत के रणनीतिक चिंतकों को सोचने पर विवश किया है। प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या नेपाल सचमुच चीन की ओर झुक रहा है, अथवा वह चीन का भय दिखाकर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की नीति अपना रहा है? यह प्रश्न केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि भविष्य के दक्षिण एशिया की शक्ति-संरचना का प्रश्न है।नेपाल को समझने के लिए केवल वर्तमान राजनीति नहीं, बल्कि इतिहास, भूगोल, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामरिक वास्तविकताओं को भी समझना होगा। क्योंकि नेपाल न तो पूरी तरह चीन बन सकता है और न ही भारत से अलग होकर अपनी स्थिरता सुरक्षित रख सकता है।

नेपाल: भारत का पड़ोसी नहीं, सभ्यतागत सहोदर,भारत और नेपाल के संबंधों को केवल “डिप्लोमैटिक रिलेशन” कहना दोनों देशों के इतिहास के साथ अन्याय होगा।नेपाल और भारत के बीच न भाषा की दीवार है, न संस्कृति की दूरी, न धर्म का संघर्ष। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। करोड़ों परिवारों के वैवाहिक, धार्मिक और सामाजिक संबंध हैं।पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय श्रद्धालु उतनी ही सहजता से जाते हैं, जितनी सहजता से नेपाल के नागरिक वाराणसी , अयोध्या और प्रयाग आते हैं।जनकपुर माता सीता की जन्मभूमि है, तो अयोध्या भगवान राम की नगरी। यह रिश्ता राजनयिक नहीं, आत्मिक है।यही कारण है कि नेपाल में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत के लिए केवल सामरिक चिंता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक असहजता भी उत्पन्न करती है।

चीन की नेपाल नीति: मित्रता नहीं, रणनीतिक विस्तार,चीन का मूल लक्ष्य नेपाल का विकास नहीं, बल्कि अपने सामरिक हितों की सुरक्षा है।बीजिंग भलीभाँति जानता है कि नेपाल यदि भारत के प्रभाव क्षेत्र में मजबूत बना रहता है, तो हिमालय भारत की सुरक्षा दीवार बना रहेगा। लेकिन यदि नेपाल चीन के प्रभाव में आता है, तो वही हिमालय भारत के लिए सामरिक चुनौती बन सकता है। इसलिए चीन पिछले डेढ़ दशक से नेपाल में बहुस्तरीय घुसपैठ कर रहा है।

आर्थिक निवेश के माध्यम से प्रभाव,चीन नेपाल में सड़क, सुरंग, जलविद्युत, हवाई अड्डा और रेलवे परियोजनाओं में बड़े निवेश कर रहा है।विशेष रूप से बेल्ट एंड रोड इनीतिटिव के अंतर्गत नेपाल को जोड़ने का प्रयास किया गया।पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, काठमांडू रिंग रोड विस्तार और तिब्बत-नेपाल रेल परियोजना इसी रणनीति के उदाहरण हैं।चीन नेपाल को यह संदेश देना चाहता है कि “भारत के बिना भी विकास संभव है।”लेकिन यहाँ एक बड़ा प्रश्न है—क्या ये निवेश वास्तव में नेपाल के हित में हैं या ऋण-जाल की शुरुआत?श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ चीन के कर्ज ने राष्ट्रीय संप्रभुता को प्रभावित किया। नेपाल में भी यह आशंका समय-समय पर उठती रही है।

नेपाल की राजनीति में चीन की सक्रियता,नेपाल में जब-जब राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, चीन की सक्रियता अचानक तेज हो जाती है।नेपाल के वामपंथी दलों के बीच समझौते करवाने से लेकर सत्ता-संतुलन प्रभावित करने तक, चीन ने खुलकर राजनीतिक भूमिका निभाई है।बीजिंग की चिंता केवल सत्ता नहीं, तिब्बत है। चीन नहीं चाहता कि नेपाल की भूमि तिब्बती विरोध गतिविधियों का केंद्र बने। इसलिए वह नेपाल की सत्ता-संरचना पर प्रभाव बनाए रखना चाहता है।कई बार नेपाली राजनीति में यह धारणा भी बनाई जाती है कि भारत “हस्तक्षेपकारी” है जबकि चीन “विकास साझेदार”। यही चीन की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत है।

सूचना और मनोवैज्ञानिक युद्ध,आज का युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता। वह मीडिया, सोशल मीडिया, नैरेटिव और जनमत में भी लड़ा जाता है।नेपाल में चीन समर्थित प्रचार लगातार यह स्थापित करने की कोशिश करता है कि—भारत नेपाल को “छोटा भाई” समझता है,भारत नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप करता हैचीन बिना शर्त विकास देता है,यहीं से “मनोवैज्ञानिक दबाव” की राजनीति शुरू होती है।नेपाल के कुछ राजनीतिक समूह समय-समय पर चीन के साथ निकटता दिखाकर भारत को संदेश देते हैं कि यदि भारत ने उनकी अपेक्षाएँ नहीं मानीं, तो नेपाल विकल्प बदल सकता है।लेकिन क्या नेपाल वास्तव में चीन पर टिक सकता है?यहीं वास्तविकता राजनीतिक बयानबाजी से अलग हो जाती है।नेपाल चीन का उपयोग कर सकता है, लेकिन चीन नेपाल का स्थायी विकल्प नहीं बन सकता।

भूगोल भारत के पक्ष में है,भूगोल किसी भी विदेश नीति का सबसे कठोर सत्य होता है।नेपाल तीन ओर से भारत से घिरा है। उसकी अधिकांश आर्थिक गतिविधियाँ भारत के रास्ते चलती हैं।नेपाल की समुद्र तक पहुँच भारतीय बंदरगाहों से है।उसकी ईंधन आपूर्ति भारत से आती है।दवाइयाँ, खाद्यान्न, उपभोक्ता वस्तुएँ—सबका प्रमुख मार्ग भारत है।चीन से जुड़ने के लिए नेपाल को हिमालय पार करना पड़ता है, जो न तो सस्ता है और न स्थायी रूप से सुगम।इसलिए चीन चाहे जितने सपने दिखाए, नेपाल की आर्थिक जीवनरेखा भारत ही है।

भारत-नेपाल खुली सीमा: दुनिया में अद्वितीय संबंध,भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है।लाखों नेपाली भारत में रोजगार प्राप्त करते हैं।हजारों नेपाली युवक भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट्स में सेवा देते हैं।यह संबंध किसी व्यापार समझौते से कहीं गहरा है।चीन नेपाल को सड़क दे सकता है, लेकिन सामाजिक आत्मीयता नहीं दे सकता।

 संस्कृति की शक्ति बनाम साम्यवाद की राजनीति,नेपाल मूलतः सनातन सांस्कृतिक चेतना वाला राष्ट्र है।वह दुनिया का एकमात्र आधिकारिक हिंदू राष्ट्र रहा है।चीन की राज्य-व्यवस्था साम्यवादी और केंद्रीकृत है। वहाँ धार्मिक स्वतंत्रता सीमित है। तिब्बत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।नेपाल की जनता भलीभाँति समझती है कि भारत के साथ उसका संबंध सांस्कृतिक सम्मान का है, जबकि चीन के साथ संबंध केवल रणनीतिक लाभ का।

नेपाल क्यों दिखाता है “चीन कार्ड”?इस प्रश्न का उत्तर नेपाल की आंतरिक राजनीति में छिपा है।नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिर रही है। सरकारें बदलती रहती हैं। ऐसे में राजनीतिक दल बाहरी शक्तियों का उपयोग आंतरिक समर्थन जुटाने के लिए करते हैं।भारत-विरोध नेपाल की राजनीति में कई बार आसान लोकप्रियता का माध्यम बन जाता है।जब भी कोई दल राष्ट्रवाद दिखाना चाहता है, वह चीन से निकटता बढ़ाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता है।लेकिन यह दबाव अधिकतर प्रतीकात्मक होता है।नेपाल यह जानता है कि—भारत को पूरी तरह नाराज करना संभव नहीं,चीन पर पूर्ण निर्भरता खतरनाक हो सकती हैसंतुलन की राजनीति ही उसके लिए सुरक्षित मार्ग है,भारत की सबसे बड़ी भूल क्या रही?भारत ने लंबे समय तक नेपाल को “स्वाभाविक मित्र” मान लिया और जनभावनाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।कई बार भारतीय राजनीतिक वर्ग की भाषा में “बड़े भाई” का भाव दिखाई देता है, जिससे नेपाल में असंतोष पैदा होता है।2015 की नाकेबंदी जैसी घटनाओं ने चीन को नेपाल में अवसर दिया। चीन ने तुरंत स्वयं को “विकल्प” के रूप में प्रस्तुत किया।इससे यह स्पष्ट हुआ कि यदि भारत संवेदनशीलता नहीं दिखाएगा, तो चीन हर असंतोष का लाभ उठाएगा।भारत को क्या करना चाहिए? संबंधों को केवल सुरक्षा नहीं, संस्कृति के आधार पर मजबूत करना,भारत को नेपाल के साथ संबंधों को केवल सामरिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।रामायण सर्किट, धार्मिक पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवा आदान-प्रदान को बढ़ाना होगा।तेज और सम्मानजनक विकास सहयोग,भारत की परियोजनाएँ अक्सर धीमी गति से चलती हैं।चीन तेज निर्णय लेकर प्रभाव पैदा करता है।भारत को नेपाल में बुनियादी ढाँचा, रेलवे, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी परियोजनाओं को तेज करना होगा।नेपाल की संप्रभुता का सम्मान-भारत को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि वह नेपाल को “प्रभाव क्षेत्र” नहीं, बल्कि “साझेदार राष्ट्र” मानता है।सम्मान आधारित संबंध चीन की आक्रामक कूटनीति का सबसे प्रभावी उत्तर होंगे।

नेपाल की राजनीति और भारत की चुनौती,नेपाल आज चीन और भारत के बीच संतुलन की राजनीति खेल रहा है।वह चीन का भय दिखाकर भारत से अधिक महत्व और बेहतर व्यवहार चाहता है।यह मनोवैज्ञानिक दबाव आंशिक रूप से सफल भी होता है, क्योंकि भारत नेपाल को खोना नहीं चाहता।लेकिन वास्तविकता यह है कि नेपाल की आत्मा भारत से जुड़ी है और उसकी भौगोलिक-आर्थिक संरचना भी भारत पर आधारित है।चीन नेपाल में प्रभाव बढ़ा सकता है, निवेश कर सकता है, राजनीतिक समीकरण बदल सकता है; लेकिन वह भारत और नेपाल के बीच हजारों वर्षों की सांस्कृतिक आत्मीयता का विकल्प नहीं बन सकता।हिमालय की चोटियाँ आज भी यही कहती प्रतीत होती हैं-नेपाल चीन का रणनीतिक मित्र हो सकता है,किन्तु भारत उसका सभ्यतागत परिवार है।

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