बीमारी का बहाना, जमीन का खेल!
“दवा कराने” ले जाकर करा लिया एग्रीमेंट, अब दो लाख की रंगदारी और जान से मारने की धमकी का आरोप
वस्ती, वशिष्ठनगर संवाददाता
बस्ती में जमीन विवाद का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ग्रामीणों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भोले-भाले लोगों की संपत्ति पर कब्जे के लिए “एग्रीमेंट” अब नया हथियार बनता जा रहा है क्या? कोतवाली थाना क्षेत्र के जिगिना निवासी संतराम ने पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाते हुए गंभीर आरोप लगाया है कि बीमारी और इलाज का फायदा उठाकर उनसे धोखे से जमीन का एग्रीमेंट करा लिया गया, और अब उसी आधार पर उन पर दबाव बनाया जा रहा है।
पीड़ित के अनुसार वर्ष 2018 में जब उनकी तबीयत खराब थी, तभी मुण्डेरवा थाना क्षेत्र के पकरी नासिर निवासी सुनीत कुमार उन्हें दवा कराने के बहाने रजिस्ट्री कार्यालय ले गए। आरोप है कि वहां किसी अन्य काम का हवाला देकर उनसे हस्ताक्षर करा लिए गए और बाद में बताया गया कि जमीन का एग्रीमेंट हो चुका है। सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति कमजोर हो, तो क्या उस दौरान कराए गए दस्तावेजों की वैधानिकता की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए?
पीड़ित का दावा है कि उनसे कहा गया था कि “दो वर्ष छह माह बाद” रुपये देकर जमीन लिखवाई जाएगी, लेकिन न पैसा मिला और न ही जमीन के संबंध में कोई वैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। अब आरोप यह है कि वही व्यक्ति उल्टा दो लाख रुपये की मांग कर रहा है और न देने पर जान से मारने की धमकी दे रहा है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल धोखाधड़ी नहीं बल्कि ग्रामीणों में भय पैदा करने वाली संगठित प्रवृत्ति का संकेत माना जाएगा।मामले का सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला पक्ष वह है जिसे संतराम अपनी बेगुनाही का सबसे बड़ा प्रमाण बता रहे हैं। उनका कहना है कि जिस जमीन को बाद में उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति को बेचा, उसी बैनामे में कथित एग्रीमेंटधारी सुनीत कुमार स्वयं गवाह बने थे। कानूनी जानकारों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में यदि किसी व्यक्ति के पास वैध एग्रीमेंट हो, तो वह उसी जमीन की दूसरी बिक्री में गवाह बनने से बचता है, क्योंकि इससे उसके दावे पर प्रश्न उठ सकता है। यही बिंदु अब पूरे मामले को संदेहास्पद बना रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बढ़ते जमीन विवादों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। अक्सर देखने में आता है कि अशिक्षा, बीमारी, आर्थिक मजबूरी या कानूनी जानकारी के अभाव का फायदा उठाकर लोगों से स्टाम्प पेपर और रजिस्ट्री कार्यालय में हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं। बाद में वही कागज दबाव और वसूली का माध्यम बनते हैं। यह मामला भी उसी आशंका को बल देता दिखाई दे रहा है।
अब निगाहें उत्तर प्रदेश पुलिस और बस्ती पुलिस प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि शिकायत में दम है तो निष्पक्ष जांच के साथ दस्तावेजों की फोरेंसिक और कानूनी पड़ताल जरूरी होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में एग्रीमेंट वैध था या किसी बीमारी और भरोसे का फायदा उठाकर तैयार कराया गया कागजी जाल।पीड़ित ने पुलिस अधीक्षक से आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने, पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। अब यह प्रशासन के लिए केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि ग्रामीणों के भरोसे और कानून के भय की परीक्षा बनता जा रहा है।

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