कौटिल्य उवाच /सम्पादकीय
भारत के खाली क्लास रूम: स्कूल खड़े कर दिए, सिखाना भूल गए!भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ भवन हैं, योजनाएँ हैं, बजट हैं, लेकिन ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता दिख रहा है। दशकों तक यह माना गया कि यदि हर गाँव में स्कूल खोल दिए जाएँ, बच्चों का नामांकन बढ़ जाए और मध्याह्न भोजन जैसी योजनाएँ लागू हो जाएँ, तो शिक्षा अपने-आप मजबूत हो जाएगी। पर आज कठोर सत्य सामने है—विद्यालयों की संख्या बढ़ी, पर सीखने की क्षमता नहीं।ग्रामीण शिक्षा पर आधारित अनेक सर्वेक्षण और रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि कक्षा पाँच का विद्यार्थी कक्षा दो की पुस्तक सहजता से नहीं पढ़ पा रहा, सामान्य गणितीय प्रश्न हल नहीं कर पा रहा। यह केवल एक शैक्षिक कमजोरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की बौद्धिक संरचना पर गंभीर प्रश्न है। पाँच-छह वर्ष विद्यालय में बिताने के बाद भी यदि बच्चा मूलभूत भाषा और गणित नहीं सीख पा रहा, तो समस्या भवनों की कमी नहीं, व्यवस्था की दिशा में है।
वास्तविक शिक्षा वही जों बच्चों में विचार, विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास पैदा करे।
स्वतंत्रता के बाद भारत की सबसे बड़ी चिंता “शिक्षा तक पहुँच” थी। इसलिए सरकारों ने विद्यालय निर्माण को प्राथमिकता दी। यह आवश्यक भी था। दूरस्थ गाँवों तक स्कूल पहुँचे, गरीब परिवारों के बच्चे शिक्षा से जुड़े, बेटियों का नामांकन बढ़ा—ये उपलब्धियाँ छोटी नहीं हैं। परंतु इसी प्रक्रिया में शिक्षा का मूल उद्देश्य, अर्थात् “ज्ञान”, पीछे छूटता गया। व्यवस्था ने यह मान लिया कि बच्चा स्कूल पहुँच गया तो शिक्षा पूर्ण हो गई।राजनीतिक दृष्टि से भी स्कूल बनाना आसान और आकर्षक कार्य था। एक नया विद्यालय उद्घाटन का अवसर बनता है, नामांकन आँकड़े उपलब्धि बन जाते हैं, योजनाएँ वोट में परिवर्तित होती हैं। किंतु किसी बच्चे की समझ, उसकी तार्किक क्षमता, उसकी भाषा दक्षता या चिंतन शक्ति कैमरे में दिखाई नहीं देती। इसलिए शिक्षा का वास्तविक पक्ष राजनीतिक विमर्श में हाशिए पर चला गया।
शिक्षा का अधिकार कानून ने बच्चों को विद्यालय से बाहर होने से बचाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया, लेकिन “कक्षा आठ तक फेल न करने” जैसी नीतियों ने जवाबदेही को कमजोर भी किया। विद्यार्थी बिना बुनियादी समझ विकसित किए अगली कक्षाओं में पहुँचते गए। शिक्षक पर परिणाम का दबाव कम हुआ और अभिभावकों को भी वास्तविक स्थिति देर से समझ आई। शिक्षा प्रमाणपत्रों में आगे बढ़ती रही, पर ज्ञान पीछे रह गया। आज भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र कहा जाता है। यह हमारी सबसे बड़ी शक्ति हो सकती है, किंतु तभी जब यह युवा पीढ़ी शिक्षित, प्रशिक्षित और समस्या-समाधान में सक्षम हो। केवल बड़ी आबादी अपने-आप विकास नहीं लाती। यदि युवा कौशलहीन और कमजोर शिक्षा के साथ आगे बढ़ेंगे, तो वही जनसंख्या भविष्य में बेरोजगारी, सामाजिक असंतोष और आर्थिक दबाव का कारण भी बन सकती है।
दुनिया के अनेक देशों ने शिक्षा को केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण माना। दक्षिण कोरिया, वियतनाम और एस्टोनिया जैसे देशों ने शिक्षक गुणवत्ता, कठोर मूल्यांकन और वास्तविक सीखने को प्राथमिकता दी। वहाँ शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बनी। भारत को भी अब यही निर्णय लेना होगा कि वह शिक्षा को राजनीतिक उपलब्धि मानेगा या राष्ट्रीय पुनर्जागरण का साधन।
समाधान केवल नई तकनीक, टैबलेट या चमकदार पाठ्यक्रम में नहीं है। सबसे पहले आवश्यक है—प्राथमिक स्तर पर भाषा और गणित की मजबूत नींव,शिक्षक प्रशिक्षण और जवाबदेही,स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,रटने के स्थान पर समझ आधारित शिक्षण,और शिक्षा को राजनीतिक प्रचार से ऊपर उठाना।
विद्यालय केवल दीवारों का नाम नहीं। शिक्षा केवल उपस्थिति रजिस्टर नहीं। वास्तविक शिक्षा वह है जो बच्चे में विचार, विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास पैदा करे। यदि भारत आने वाले वर्षों में अपनी शिक्षा व्यवस्था को “संख्या आधारित मॉडल” से “गुणवत्ता आधारित मॉडल” में परिवर्तित नहीं करता, तो दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति एक अधूरी संभावना बनकर रह जाएगी।आज आवश्यकता नए स्कूलों से अधिक नए शैक्षिक दृष्टिकोण की है। भारत को अब यह स्वीकार करना होगा कि राष्ट्र का भविष्य केवल संसदों में नहीं, बल्कि उन कक्षाओं में तय होता है जहाँ एक शिक्षक और एक विद्यार्थी मिलकर भविष्य का निर्माण करते हैं।

अच्छा ज्ञान
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